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जब भी कभी पहाड़ों का जिक्र होता है तो आंखों के सामने बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां, देवदार के घने जंगल और टूरिस्टों से गुलजार खूबसूरत वादियां घूमने लगती हैं. हिंदी सिनेमा ने भी दशकों से उत्तराखंड को सिर्फ एक रोमांटिक बैकड्रॉप या छुट्टी बिताने वाली जगह के तौर पर ही पर्दे पर दिखाया है, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसा दर्द छिपा है, जिस पर मुख्यधारा कभी नजर नहीं जाती. नेशनल अवॉर्ड विनर डायरेक्टर विनोद कापड़ी की की नई फिल्म ‘पायर’ (Pyre) इसी अनदेखे सच से पर्दा उठाती है. ये फिल्म उन आंसुओं की कहानी है, जो पलायन की वजह से वीरान हुए घरों के कोनों में बहते-बहते सूख चुके हैं.
30 अक्टूबर को ये फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है, जिसको लेकर लोग काफी एक्साइटेड हैं, लेकिन इसको देखने से पहले आपको इसके पीछे की सच्चाई को समझना और जानना जरुरी है, तबही आप इस फिल्म को बड़े पर्दे पर महसूस कर पाएंगे. ये उन हजारों पहाड़ी गांवों की कहानी है, जो अब सिर्फ नक्शों पर रह गए हैं. जिन्हें आज पूरी दुनिया ‘घोस्ट विलेज’ (Ghost Villages) के नाम से जानती है. रिलीज होने से पहले ही दुनिया भर के कई बड़े मंचों पर अपनी पहचान बना चुकी ये फिल्म एक ऐसे बुजुर्ग पति-पत्नी और माता-पिता के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी आंखें अपने बेटे के लौटने की आस में पथरा चुकी हैं.
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ये महज एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज की एक ऐसी टीस है, जो हर दिल को झकझोर कर रख देती है. फिल्म ‘पायर’ की सबसे यूनिक और अलग बात इसके कलाकार हैं, जिनका अभिनय से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं. फिल्म में लीज रोल निभाने वाले पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी कोई प्रोफेशनल आर्टिस्ट नहीं हैं. उत्तराखंड के सुदूर इलाके में रहने वाले इन दोनों बुजुर्गों ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी कैमरा देखा तक नहीं था.
बावजूद इसके जब वे पर्दे पर आते हैं, तो उनका हर इमोशन, उनकी धीमी चाल और चेहरे की झुर्रियां बिना कुछ बोले ही पहाड़ की पूरी दास्तान कह जाती हैं, जो सीधा दिल में उतर जाती है. करीब 80 साल के पदम सिंह कापड़ी भारतीय सेना से रिटायर जवान हैं, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा देश की सेवा में बिताया. वहीं, 70 साल की हीरा देवी गांव में रहकर खेती-बाड़ी और घर-गृहस्थी संभालने वाली एक सिंपल सी पहाड़ी महिला हैं.
डायरेक्टर विनोद कापड़ी का मानना था कि मुंबई का कोई भी बड़ा कलाकार उस दर्द को पर्दे पर नहीं जी सकता, जिसे इन दोनों ने दशकों से अपनी आंखों से देखा और महसूस किया है. अपनी ही पहाड़ी मिट्टी से जुड़े लोगों को लीड रोल में लेकर डायरेक्टर विनोद कापड़ी ने कहानी में वो जान फूंक दी है, जो सिनेमाघरों में ऑडियंस को अंदर तक हिला देती है. फिल्म क्रिटिक्स का भी यही मानना है कि इन दोनों कलाकारों की सादगी ही इस पूरी फिल्म की असली जान है.
आज जब बड़े बजट का सिनेमा भारी भरकम स्टारडम, वीएफएक्स और बनावटी चमक के सहारे ऑडियंस को खींचने की कोशिश करता है, तब ये फिल्म बिना किसी तामझाम के दिल जीत ले जाती है. इनकी आंखों में तैरता सूनापन और आपस की चुप बातचीत ऑडियंस को फिल्म के आखिर हिस्से तक बांधकर रखती है. इन दोनों ने अपने किरदारों को निभाया नहीं है, बल्कि पहाड़ के उस कड़वे सच को पर्दे पर जीकर दिखाया है, जिसे वे दशकों से रोज अपनी आंखों से देखते आए हैं.
फिल्म की कहानी कुमाऊं एरिया के एक बेहद वीरान और अलग-थलग पड़े गांव से शुरू होती है. यहां रहने वाले इस बूढ़े कपल का बेटा हरिया आज से 28 साल पहले घर छोड़कर गया था. शहर की चकाचौंध, रोजगार की तलाश और एक बेहतर जिंदगी का सपना देखकर निकला वो बेटा फिर कभी अपने गांव की दहलीज पर वापस नहीं लौटा. बूढ़े मां-बाप हर सुबह इस उम्मीद के साथ अपनी आंखें खोलते हैं कि शायद आज उनके आंगन में बेटे के कदमों की आहट सुनाई देगी, लेकिन शाम ढलते ही उनकी ये उम्मीद फिर सन्नाटे में डूब जाती है.
समय बीतने के साथ-साथ पूरा गांव धीरे-धीरे खाली होता चला जाता है, जिन नौजवानों के कंधों पर गांव की संस्कृति संभालने और इन बुजुर्गों के आखिरी दिनों का सहारा बनने की जिम्मेदारी थी, वे सब पेट की आग बुझाने के लिए मैदानों की तरफ चले गए. गांव के घर एक-एक करके खंडहर में बदलने लगे और खेतों में जंगली घास उग आई. अब इस पूरे सन्नाटे में सिर्फ ये कपल, उनकी पुरानी यादें और एक-दूसरे का हाथ थामे जीने की मजबूरी बची है. उनके बीच होने वाली छोटी-छोटी बातें भी इस अकेलेपन के भारी बोझ को बयां करती हैं.
फिल्म का नाम ‘पायर’ यानी ‘चिता’ रखा गया है, जो इस ह्यूमन ट्रेजेडी की सबसे खौफनाक हकीकत की ओर इशारा करता है. ये कहानी केवल जिंदगी के संघर्ष और बेटे के इंतजार की नहीं है, बल्कि उस लाचारी की भी है जहां दिमाग में सिर्फ एक सवाल आता है कि मरने के बाद इस वीरान गांव में उनकी चिता को आग कौन देगा. क्या उनके शवों को कंधा देने के लिए भी कोई इंसान मौजूद होगा या वे यूं ही इस सूने घर में पड़े रह जाएंगे. ये सवाल फिल्म को सिर्फ इमोशनल नहीं बनाती, बल्कि देखने वाले की रूह को अंदर तक कंपा देती है.

उत्तराखंड के लिए पलायन कोई नई बात नहीं है, बल्कि ये एक ऐसा नासूर बन चुका है, जो पिछले कई दशकों से पहाड़ों को अंदर से खोखला कर रहा है. रोजगार के सोर्सेस की भारी कमी, खराब हेल्थकेयर सेवाएं और बेहतर एजुकेशन का अभाव लोगों को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने पर मजबूर कर देता है. यंग जनरेशन पहाड़ों से नीचे उतरकर दिल्ली, मुंबई या चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों की चकाचौंध में गुम हो जाती है. पीछे छूट जाते हैं सिर्फ वीरान मकान, सूनी गलियां और बूढ़े मां-बाप, जो अपनी जड़ों को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते.
‘पायर’ इन्हीं वीरान हो चुके गांवों की कड़वी और खौफनाकर सच्चाई को बिना किसी लाग-लपेट के पर्दे पर दिखाती है. डायरेक्टर विनोद कापड़ी ने पहाड़ों की इन खूबसूरती का कोई आर्टिफिशियल ग्लासेस नहीं पहनाया, बल्कि उस बंजर होते सामाजिक ताने-बाने को दिखाया है, जहां अब कोई त्योहार नहीं मनता. जब गांव से जवान बच्चे निकल जाते हैं, तो वहां की पूरी संस्कृति और परंपराएं भी धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती हैं. फिल्म दिखाती है कि कैसे विकास की अंधी दौड़ में हमारे पारंपरिक गांव इतिहास के पन्नों में खो रहे हैं.
यही वजह है कि इस फिल्म को सिर्फ एक देखे जाने वाला इमोशनल सिनेमैटिक ड्रामा नहीं कहा जा सकता, बल्कि ये मॉर्डन इंडिया के बदलते भूगोल का एक जरूरी दस्तावेज है. ये उन पॉलिसी-मेकर्स और समाज के मुंह पर एक तमाचा है, जो सिर्फ टूरिज्म को ही पहाड़ों का भविष्य मानते हैं. फिल्म हर देखने वाले से ये सवाल पूछती है कि आखिर इस मॉडर्निटी और तरक्की की ये भारी कीमत कौन चुका रहा है. क्या अपने ही घर में बेगाने हो जाना ही इन बुजुर्गों की किस्मत बन चुकी है? जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं.
सिनेमाघरों में आने से पहले ही ‘पायर’ ने दुनिया भर के बड़े-बड़े फिल्म फेस्टिवल्स में अपनी एक अलग और मजबूत पहचान बना चुकी है. फिल्म ने अलग-अलग देशों में 18 से ज्यादा इंटरनेशनल अवॉर्ड्स जीतकर इंडियन इंडिपेंडेंस सिनेमा का परचम लहराया है, जिनमें 15 बेस्ट फिल्म के बड़े सम्मान शामिल हैं. जर्मनी, स्पेन, लंदन, बोस्टन और बर्मिंघम जैसे बड़े इंटरनेशनल मंचों पर इस साधारण सी फिल्म को स्टैंडिंग ओवेशन मिला. इसके साथ ही विनोद कापड़ी को बोस्टन और सर्बिया में बेस्ट डायरेक्टर के खिताब से नवाजा गया.
इस फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर दुनिया के सबसे बड़े और नामी फिल्म फेस्टिवल्स में से एक ‘ताल्लिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल’ (Tallinn Black Nights Film Festival) में हुआ था. इस बेहद खास मंच पर फिल्म को दुनिया भर के सिनेप्रेमियों का बेपनाह प्यार मिला और इसने वहां के नामी ‘ऑडियंस अवॉर्ड’ अपने नाम किया. वहां मौजूद विदेशी ऑडियंन और क्रिटिक्स ने माना कि भले ही फिल्म की भाषा और संस्कृति उनके लिए नई थी, लेकिन इसमें दिखाया गया बुजुर्गों का अकेलापन और बिछोह का दर्द पूरी दुनिया के इमोशन हैं.
भारतीय सिनेमा जगत की कई जानी-मानी हस्तियों और नामी फिल्म क्रिटिक्स ने भी इस फिल्म की सादगी और डायरेक्शन की खुलकर तारीफ की है. फिल्म का कैमरा जिस तरह से कुमाऊं के वीरान घरों की खामोशी और दोनों बुजुर्गों के चेहरों की लाचारी को कैद करता है, वो सीधे दिल पर असर करता है. यही वजह है कि आज बिना किसी भारी भरकम प्रमोशन और बड़े स्टार्स के भी ‘पायर’ यानी ‘चिता’ देश और दुनिया भर के इंडिपेंडेंस सिनेमा के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा बटोरने वाली फिल्म बन चुकी है, जिसे खूब पसंद किया गया.

‘पायर’ सिर्फ एक फिल्म या एंटरटेनमेंट का सोर्स नहीं, बल्कि ये पहाड़ों की उस पीढ़ी की तरफ से एक मैसेज है, जो अब आखिरी सांसें ले रही है. ये बताती है कि पलायन सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह चले जाना नहीं होता, बल्कि ये अपने पीछे रिश्तों का जो बिखराव छोड़ जाता है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती. फिल्म उन बूढ़े मां-बाप के उस दर्द को दिखाती है, जो अपने बच्चे की खुशहाली के लिए उसे दूर जाने की इजाजत तो दे देते हैं, लेकिन सारी उम्र उस जुदाई के कांटे को अपने सीने में दबाए रखते हैं.
विनोद कापड़ी ने खुद कई मौकों पर ये बताया है कि ये फिल्म उनके होमटाउन उत्तराखंड और उनकी जड़ों के लिए उनके गहरे लगाव की उपज है. उनके लिए ये कोई बिजनेस या पैसे कमाने वाला प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उन बुजुर्गों के लिए एक श्रद्धांजलि है, जो आज भी अपने सूने आशियानों में बैठकर अपने बच्चों की राह तक रहे हैं. वे चाहते हैं कि जो लोग शहरों में जाकर बस गए हैं, वे कम से कम एक बार पीछे मुड़कर अपने उन खाली होते गांवों और बेसहारा बुजुर्गों की सुध जरूर लें, जिन्हें वे पीछे छोड़ आए.
सिनेमाघरों का रुख करने वाली ये फिल्म ऑडियंस को अंदर तक झकझोरने का माद्दा रखती है. ये हमें बताती है कि कैसे पहाड़ की बर्फीली हवाओं से भी ज्यादा ठंडी वो तन्हाई होती है, जो अपनों के दूर चले जाने के बाद मिलती है. ‘पायर’ की कहानी शायद हर उस इंसान की आंखें नम कर देगी, जिसने कभी जिंदगी में अपने गांव, अपने घर या अपने बूढ़े माता-पिता को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की लाचारी को महसूस किया हो. ये फिल्म सिनेमाघरों से बाहर निकलने के बाद भी लंबे समय तक दिलो-दिमाग में बनी रहेगी.