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Nana Patekar Iconic Dialogues: 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने...पर्दे पर जब दहाड़े नाना पाटेकर, थियेटर में नहीं रुकीं सीटियां!

Nana Patekar Death: हिंदी सिनेमा से एक बेहद दुखद खबर आई है. हिंदी सिनेमा के दिग्गज कलाकार नाना पाटेकर का 75 साल की उम्र में देहांत हो गया, जिससे उनके फैंस और पूरी इंडस्ट्री गहरे सदमे में हैं. उनके लंबे सफर को याद करते हुए उनके शानदार अभिनय, यादगार फिल्मों और उन सदाबहार आइकॉनिक डायलॉग्स के बारे में बताएंगे, जो हमेशा हमारे दिलों में अमर रहेंगे.

Nana Patekar Iconic Dialogues: 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने...पर्दे पर जब दहाड़े नाना पाटेकर, थियेटर में नहीं रुकीं सीटियां!
Image Credit: नाना पाटेकर के डायलॉग

यूं तो हिंदी सिनेमा में कई हीरो आए और गए, लेकिन जब बात बिना किसी लाग-लपेट के सीधे दिल पर चोट करने वाली एक्टिंग की आती है, तो एक ही नाम हम सभी के जहन में आता है और वो कोई और नहीं, बल्कि दिग्गज कलाकार नाना पाटेकर का है. कड़क मिजाज, बिना ब्रेक वाली तेज-तर्रार आवाज और डायलॉग्स के बीच का वो जादुई पॉज, नाना पाटेकर का स्टाइल बिल्कुल अलग और अनोखा रहा. मुंबई की सड़कों पर पोस्टर पेंट करने से लेकर देश का सबसे बड़ा एक्टर बनने तक, नाना जी की कहानी किसी सुपरहाट मूवी से कम नहीं है. 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने... 'जैसे आइकॉनिक डायलॉग देने वाले नाना पाटेकर का आज 75 साल की उम्र में गोवा में हार्टअटैक के कारण देहांत हो गया, जिससे बॉलीवुड और उनके लाखों फैंस गहरे सदमें में हैं. 

हिंदी सिनेमा के सबसे बेबाक और जानदार कलाकारों में शुमार नाना पाटेकर ने करीब चार दशकों तक अपनी एक्टिंग से लोगों के दिलों पर राज किया. उनकी कड़क आवाज, डायलॉग्स के बीच का वो जादुई पॉज और बिना किसी झिझक के सीधी बात करने का अंदाज उन्हें सबसे अलग बनाता रहा.महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्म लेने वाले नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था. हिंदी सिनेमा के ज्यादातर कलाकारों की तरह उनका करियर भी बेहद तंगहाली में शुरू हुआ. पेट पालने के लिए उन्होंने सड़कों और दीवारों पर पोस्टर तक पेंट किए.

कारगिल में भी दिखी नाना की बहादुरी

नाना पाटेकर ने सिर्फ हिंदी सिनेमा में ही झंड़े नहीं गाड़े, कारगिल युद्ध का मैदान उनकी बारूद और बहादुरी का गवाह भी बना. साल 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना में अपनी सेवा देने वाले नाना ने दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया. युद्ध के बाद, देश सेवा का यही जज्बा और अनुशासन उनके साथ रहा, जब उन्होंने मायानगरी की ओर रुख किया. सेना के कड़े डिसिप्लिन ने उनकी कला में गहराई भर दी. कारगिल के वार एरिया से बॉलीवुड के जगमगाते पर्दे तक का ये सफर अनुशासन, साहस और नए सपनों को सच करने की एक मिसाल रहा.

'अन्ना' के किरदार से फैलाई दिहशत

नाना पाटेकर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत साल 1978 में की और फिल्म 'गमन' से बड़े पर्दे पर एंट्री मारी. लेकिन इंडस्ट्री और ऑडियंस का ध्यान उनपर तब गया, जब साल 1989 में विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'परिंदा' रिलीज हुई. इस फिल्म में अंडरवर्ल्ड डॉन 'अन्ना' के रोल में नाना ने ऐसी दहशत फैलाई कि हर कोई उनकी एक्टिंग का कायल हो गया.

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इसके बाद साल  1991 में नाना ने फिल्म 'प्रहार' से डायरेक्शन में हाथ आजमाया और एक सख्त फौजी के रोल को परफेक्ट बनाने के लिए बाकायदा भारतीय सेना से ट्रेनिंग भी ली. कड़ी मेहनत और अपने बेबाक अंदाज के चलते नाना ने 'क्रांतिवीर', 'तिरंगा', 'अग्निसाक्षी और अपहरण' जैसी फिल्में दीं और बॉलीवुड के बड़े-बड़े कलाकरों के बीच लाकर खड़ा कर दिया.

तीखे डायलॉग, बेबाक अंदाज और कॉमेडी का तड़का

नाना पाटेकर सिर्फ गंभीर या गुस्से वाले किरदारों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि फिल्म 'खामोशी' में एक गूंगे और बहरे पिता का सेंससिटिव कैरेक्टर प्ले किया. उनके इस किरदार को क्रिटिक्स के साथ-साथ फैंस ने भी काफी सराहना मिली.'वेलकम' के मजेदार 'उदय शेट्टी' किरदार में नाना ने एक नई जान फूंक दी, जिसके डायलॉग आज भी लोग अपनी रोजाना जिंदगी में कई बार दोहराया करते हैं. वहीं मराठी सिनेमा की मास्टरपीस 'नटसम्राट' में उनका काम देखकर ऑडियंस की आंखें नम हो गईं.

nana patekar

वो डायलॉग्स, जो आज भी हर किसी की जुबान पर हैं

जब नाना पाटेकर स्क्रीन पर आते थे, तो सिनेमा हॉल में सन्नाटा छा जाता था और डायलॉग खत्म होते ही सीटियों की गूंज सुनाई देने लगती थीं. आइए एक नजर डालते हैं उनके फेमस डायलॉग्स पर, जो आज भी लोगों की जुबां पर बैठे हुए हैं.

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क्रांतिवीर (1994): 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने... ये हिंदू का खून, ये मुसलमान का खून... बताओ इसमें कौन सा हिंदू का है, कौन सा मुसलमान का?'

यशवंत (1997): 'एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है!'

तिरंगा (1993): 'पंद्रह सौ की नौकरी करने वाला... एक दिन तुझे डेढ़ सौ का कफन पहनाएगा'

वेलकम (2007): 'भगवान का दिया हुआ सब कुछ है... दौलत है, शोहरत है, इज्जत है...'

ब्लफमास्टर (2005): 'भाई मत बोल... इमोशनल हो जाता हूं मैं!'

nata patekar awards

अवॉर्ड्स

नाना पाटेकर की एक्टिंग का लोहा ऑडियंस के साथ-साथ क्रिटिक्स और सिनेमा के बड़े-बड़े लोगों ने भी माना है, जिसके चलते उन्हें कई बड़े- बड़े अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया था. नाना ने अपने फिल्मी सफर में एक या दो नहीं, बल्कि तीन बार नेशनल अवॉर्ड जीता.

3 नेशनल अवॉर्ड्स (National Film Awards)

परिंदा (1989) — बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर

क्रांतिवीर (1994) — बेस्ट एक्टर

अग्निसाक्षी (1996) — बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर

पद्म श्री और फिल्मफेयर का अनोखा रिकॉर्ड

नाना पाटेकर हिंदी सिनेमा के अकेले ऐसे एक्टर थे, जिन्होंने फिल्मफेयर में बेस्ट एक्टर (क्रांतिवीर), बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (परिंदा), और बेस्ट विलेन (अंगार और अपहरण) तीनों कैटेगरी में अवॉर्ड्स जीते थे. इतना ही नहीं, साल 2013 में भारत सरकार ने सिनेमा में उनके बेमिसाल योगदान के लिए 'पद्म श्री' से सम्मानित किया.

nana patekar foundation

पर्दे के बाहर असली जिंदगी के मसीहा

नाना पाटेकर केवल पर्दे तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने कलाकार मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' (NAAM Foundation) की शुरुआत की, जिससे वो महाराष्ट्र के सूखे इलाकों में किसानों और उनके परिवारों की मदद करते हैं. सिनेमा में उनके शानदार योगदान और असल जिंदगी में उनकी दरियादिली लोगों को हमेशा याद रहेगी. भारतीय सिनेमा के इतिहास में नाना पाटेकर का नाम एक ऐसे कलाकार के रूप में हमेशा दर्ज रहेगा, जिनकी जगह कोई और नहीं ले सकता.


 

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About the Author

Jyoti Rajput

Jyoti Rajput

ज्योति सिंह राजपूत जी न्यूज में सब एडिटर हैं और पिछले 1 साल से ज्यादा से डिजिटल मीडिया में काम कर रही हैं. दैनिक जागरण प्रिंट और सहारा न्यूज नेटवर्क में ट्रेनिंग लेने के बाद अब Zee News में काम कर रही हैं. कुछ समय तक लाइफस्टाइल की खबरों में काम करने के बाद अब एंटरटेनमेंट में काम कर रही हैं. वहीं हॉलीवुड की खबरों और फिल्मों पर पैनी नजर रखती हैं. उन्होंने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी (MCU) से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर डिग्री हासिल की है. आप Jyoti.Rajput@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं.
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