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आज के समय में जब सिनेमा पर मेगा बजट और बड़े स्टार्स का बोलबाला है, तब फिल्म ‘पायर’ एक बेहद सिंपल सी कहानी लेकर बड़े पर्दे पर दस्तक देती है. जाने-माने डायरेक्टर विनोद कापड़ी के डायरेक्शन में बनी ये फिल्म उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों में अकेले छूट गए एक बुजुर्ग पति-पत्नी की मुश्किल और अकेलेपन से भरी जिंदगी को दिखाती है. इस कहानी में रिश्तों की मिठास, गांवों से हो रहे पलायन की टीस और ढलती उम्र की लाचारी को बिना किसी तड़क-भड़क के पर्दे पर उतारा गया है. इस फिल्म ने कई इंटरनेशनल मंचों पर अपनी पहचान बनाई है.
इस पूरी फिल्म की सबसे खास बात इसकी दिल को छू जाने वाली कहानी है. ये कहानी सिर्फ दो इंसानों की नहीं है, बल्कि उन अनगिनत वीरान होते गांवों की हकीकत है, जो वक्त के साथ बिल्कुल खाली हो चुके हैं. बेटा बहुत साल पहले ही गांव छोड़कर दूर जा चुका है, जिसके बाद दोनों बुजुर्ग एक-दूसरे के सहारे बाकी जिंदगी बिता रहे हैं. दोनों के बीच की छोटी-मोटी नोकझोंक, हल्की तकरार और गहरा प्यार देखने वालों को गहराई से जोड़ लेता है. यही इंसानी जुड़ाव फिल्म को एक अलग पहचान दिलाता है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है.

थिएटर में आने के बाद इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की बड़ी भीड़ तो नहीं मिली, लेकिन जितने लोगों ने इसे देखा वे सोशल मीडिया पर इसकी तारीफ कर रहे हैं. सैकनिल्क के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, इस फिल्म ने रिलीज के पहले दिन लगभग 11 लाख रुपए की कमाई के साथ खाता खोला. किसी बहुत बड़ी कमर्शियल फिल्म के सामने ये कमाई काफी कम लग सकती है, लेकिन बहुत कम स्क्रीन और लिमिटेड ऑडियंस के लिहाज से ये शुरुआत ठीक-ठाक कही जा सकती है. अभी वीकेंड भी बाकी है, जिसके बाद असली पत्ते खुलेंगे.
भले ही टिकट काउंटर पर इसकी कमाई की रफ्तार बहुत तेज न दिख रही हो, मगर इसने जो मान-सम्मान हासिल किया है वो बहुत बड़ा है. तेलिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म का प्रीमियर हुआ था, जहां हॉल में मौजूद ऑडियंस ने इसे दिल खोलकर सराहा था. इसके अलावा भी दुनिया भर के कई जाने-माने और बड़े फिल्म फेस्टिवल्स में इसे खूब वाहवाही मिली है. ये फिल्म सिर्फ समय बिताने का जरिया नहीं है, बल्कि एक संवेदनशील आईना है, जो पहाड़ों से लोगों के लगातार बाहर जाने की समस्या को बड़ी गहराई से सामने रखती है.
फिल्म में काम करने वाले बुजुर्ग कलाकारों ने अपने-अपने किरदार में जैसी जान डाली कि देखने वाले देखते रह गए. पहाडों में अकेले जिंदगी बिता रहे बुजुर्ग दंपति के रोल को उन्होंने इतना नेचुरली निभाया कि देखने पर लगता ही नहीं कि वे एक्टिंग कर रहे हैं. उनकी आंखों की बेबसी, दिल का खालीपन और रोजमर्रा का संघर्ष एकदम असली लगता है. यही वजह है कि स्क्रीन पर दिखने वाले कई इमोशनल सीन हॉल से निकलने के बाद भी दिमाग में बसे रहते हैं. किसी मशहूर स्टार चेहरे के न होने के बाद भी ये फिल्म अपनी मजबूत छाप छोड़ने में पूरी तरह कामयाब रहती है.
अपनी कहानी और कलाकारों को लेकर ये एक ऐसी फिल्म साबित होती है, जो किसी बनावटी शोर से नहीं, बल्कि अपनी रूहानी गहराई से पहचान बनाती है. पहले दिन की आमदनी चाहे बहुत बड़ी न रही हो, पर इस सिनेमा का असली मोल इसकी सच्ची कहानी में छिपा है. दुनिया के तमाम मंचों पर मिले सम्मान ये साफ दिखाते हैं कि ये केवल एक इलाके की बात नहीं है, बल्कि इंसान के अकेलेपन और टूटे रिश्तों की ऐसी दास्तान है जिससे कोई भी इंसान आसानी से जुड़ सकता है. ये कहानी लंबे समय तक जेहन में अपनी छाप बनाए रखने का दम रखती है.