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Natural Disaster: भूटान से भारत में घुसा खतरा ग्लेशियर झील फटने से पैदा हुआ और बद्रीनाथ के ऊपर ग्लेशियर टूटने का खतरा मंडरा रहा है, जिसे लेकर वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है. ग्लेशियर झील फटने से नेपाल में आई त्रासदी की तस्वीरें आपको याद होंगी. इस बार पहाड़ों के बीच बर्फ पिघलने से भूटान में बनी प्राकृतिक झील फटी है, जिसके बाद पानी भूटान से होता हुआ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की तरफ आने लगा. भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में इस ग्लेशियर झील के फटने से किस तरह का खतरा पैदा हुआ? जिन राज्यों में इस प्राकृतिक आपदा का प्रभाव पड़
भूटान के उत्तरी गासा जिले में पहाड़ों पर बनी शिंताफू तशो ग्लेशियल झील अचानक फट गई, जिसके बाद चौहत्तर लाख घन मीटर पानी के साथ मलबा तेजी से नीचे की ओर बहने लगा. इस सैलाब में कई सड़के और हाइवे क्षतिग्रस्त हो गईं. गासा त्साचु के प्रसिद्ध गर्म पानी के कुंड के पास मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर भी बह गया. पुनाखा में सोलर इरिगेशन सिस्टम भी क्षतिग्रस्त हुआ है. इस झील के कभी भी फटने की आशंका वैज्ञानिकों ने पहले ही दे दी थी इसलिए अलर्ट मिलने से इलाका खाली करा लिया गया था और किसी की जान नहीं गई, लेकिन खतरा भारत की तरफ बढ़ने लगा. भूटान से पानी संकोश नदी के जरिए पश्चिम बंगाल और असम सीमा की तरफ बढ़ा. अलीपुरद्वार और उत्तरी बंगाल के इलाकों के साथ साथ असम के धुबरी में अलर्ट जारी किया. प्रशासन रात में ही एक्टिव हो गया. अलीपुरद्वार से 10 हजार लोगों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया.
भूटान में जो कुछ हुआ वो ग्लेशियर झील के फटने से हुआ. पहाड़ों के बीच मौजूद घाटी में ग्लेशियर की बर्फ पिघलने से पानी इकट्ठा होता है. कई बार ये पानी मलबे और चट्टानों की वजह से रुककर एक झील की शक्ल ले लेता है. जब पानी के दबाव से चट्टानों और मलबे की दीवार टूटती है तो पानी तेजी से नीचे आता है. इसे ही ग्लेशियर झील का फटना कहते हैं. भूटान में ग्लेशियर झील फटने की सूचना सही वक्त पर मिलने से तबाही नहीं हुई. अब वैज्ञानिकों ने बद्रीनाथ को लेकर एक और रिपोर्ट दी है, जो चिंता बढ़ाने वाली है. इस बार भी खतरा ग्लेशियर यानी पहाडों पर जमा बड़े बड़े बर्फ के बड़े टुकड़े हैं.
प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका 'Landslides' में बद्रीनाथ को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. इस रिपोर्ट को भारतीय विज्ञान संस्थान, ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और DRDO के शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक बद्रीनाथ के ऊपर पहाड़ों की खड़ी ढलानों पर बर्फ के विशाल टुकड़े यानी ग्लेशियर लटके हुए हैं. जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण इनकी पकड़ कमजोर हो रही है. रिपोर्ट के मुताबिक ये ग्लेशियर कभी भी टूटकर नीचे गिर सकते हैं. इसके गिरने से भयानक एवलॉन्च आ सकता है, जो अपने साथ बड़ी मात्रा में पानी, चट्टानें और मलबा बहाकर लाएगा. इस एवलॉन्च से बद्रीनाथ क्षेत्र में बड़ी तबाही भी हो सकती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक इसकी चपेट में लगभग क्षेत्र की 400 इमारतें आ सकती हैं. ढाई किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़क क्षतिग्रस्त हो सकती है. 2 पुल और 1 हेलीपैड नष्ट हो सकते हैं. इसके अलावा एक बड़ा पार्किंग क्षेत्र भी इसकी जद में आ सकता है. राहत की बात ये है कि बद्रीनाथ मंदिर पर सीधे नुकसान की आशंका नहीं है, लेकिन मलबे और चट्टानों के कारण मंदिर प्रभावित हो सकता है.
इस शोध के मुताबिक बद्रीनाथ धाम के ऊपर पहाड़ों पर मौजूद तीन ग्लेशियर में दूसरा ग्लेशियर सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक विधियों से नजर रखकर किसी एवलॉन्च जैसी स्थिति में नुकसान को कम किया जा सकता है. इस रिसर्च में तबाही के आंकड़ों में 400 घरों, 2 पुल, सड़क और हैलीपैड का जिक्र है, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता बद्रीनाथ धाम में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को लेकर है. वर्ष 2025 में चारधाम यात्रा के दौरान करीब 17 लाख श्रद्धालु बद्रीनाथ पहुंचे थे. ऐसे में ग्लेशियरों से जुड़े जोखिम को तीर्थयात्रियों, स्थानीय निवासियों और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.