अबतक गलत जन्मदिन मना रहे थे 'कालीन भैया' के फैंस, 5 सितंबर नहीं... इस दिन पैदा हुए थे पंकज त्रिपाठी; फिर क्यों मशहूर हुई ये तारीख?
Mirzapur Pankaj Tripathi: किसी एक्टर की पहचान आमतौर पर उसकी फिल्मों, किरदारों और डायलॉग से बनती है, लेकिन बॉलीवुड एक्टर पंकज त्रिपाठी की कहानी थोड़ी अलग है. यहां एक तारीख भी उनकी पहचान का हिस्सा बन गई है, जो 5 सितंबर है. हर साल इस दिन सोशल मीडिया पर 'मिर्जापुर' के 'कालीन भैया' के फैंस उन्हें जन्मदिन की बधाइयां देते हैं. मगर खुद पंकज त्रिपाठी ने एक पॉडकास्ट में बताया कि कहानी इतनी सीधी नहीं है.
बॉलीवुड एक्टर पंकज त्रिपाठी अपनी वर्सेटाइल एक्टिंग के चलते नई जनरेशन के फेवरेट बन चुके हैं, जिसमें फैंस ने सबसे ज्यादा प्यार 'कालीन भैया' के किरदार को दिया. वहीं हाल ही में इस सीरीज के मेकर्स ने कहानी को फिल्म का रूप देकर 4 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज किया था, जिसे देशभर की ऑडियंस से अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. इसी बीच एक्टर से जुड़े कई पुराने किस्से और अनोखी बाते सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें सबसे ज्यादा जिक्र उनकी जन्मदिन की तारीख को लेकर किया ज रहा है. दरअसल पंकज त्रिपाठी ने समदीश के पॉडकास्ट 'अनफिल्टर बाय समदीश' में एक ऐसे किस्से का जिक्र किया, जिससे उनके फैंस अब तक अनजान थे.
पंकज ने इस बातचीत में बताया कि उनका असली जिन्मदिन 5 सितंबर को नहीं होता है, बल्कि किसी अन्य तारीख को वो पैदा हुए थे. एक्टर की इस बात को सुनने के बात लोगों के मन में ये सवाल उठता है कि फिर क्यों इस तारीख को उनका जन्मदिन सेलिब्रेट किया जाता है और उनका असली बर्थडे किस दिन मनाया जाता है. आईए बताते हैं.
क्यों बदल गई कालीन भैया की बर्थडेट?
'कालीन भैया' ने बातों ही बातों में बताया कि जब उनका गांव के स्कूल में दाखिला कराया जा रहा था, तब उनके भाई से टीचर ने जन्मदिन की तारीख पूछी, तो भाई को सटीक तारीख याद नहीं थी. ऐसे में टीचर ने 5 सितंबर लिखने का सुझाव दिया यानी टीचर्स डे की डेट. पंकज के मुताबिक, टीचर ने इसे शुभ दिन बताते हुए कहा था कि ये अच्छा दिन है, बड़ा आदमी बनेगा. यही तारीख आगे चलकर स्कूल रिकॉर्ड और दस्तावेजों में चलती रही. दूसरी तरफ पंकज बताते हैं कि उनका रियल जन्म 28 सितंबर, 1976 को हुआ था. दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने इस उलझन को समस्या बनाने के बजाय दोनों तारीखों को अपना लिया.
कैसे शुरू हुई एक्टिंग की जर्नी?
पंकज त्रिपाठी की असली कहानी तारीख से कहीं बड़ी है. बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गांव से निकलने वाला ये लड़का किसान परिवार से आया था. उनके पिता खेती करने के साथ पुजारी का काम भी करते थे. एक्टिंग का बीज भी किसी फिल्मी माहौल में नहीं, बल्कि गांव के लोकल नाटकों में पड़ा. त्योहारों के दौरान वो नाटकों में हिस्सा लेते थे और कई बार लड़की का किरदार भी निभाते थे. बाद में पटना पहुंचे, होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की और फिर थिएटर की तरफ खिंचते चले गए. दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लेना उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बना और साल 2004 में वहां से ट्रैनिंग पूरा करने के बाद मुंबई की राह खुली.
मुंबई में स्टारडम नहीं, छोटे कमरे और छोटे रोल मिले
मुंबई पहुंचकर पंकज त्रिपाठी को वो दुनिया नहीं मिली जिसकी उम्मीद आमतौर पर फिल्मी सपने देखने वाला इंसान करता है. शुरुआती दौर में छोटे-छोटे किरदार, एड और स्ट्रगल उनके हिस्से आए. फिल्म 'रन' में उनका शुरुआती, छोटा रोल रहा, जबकि ओमकारा, अग्निपथ जैसी फिल्मों और टीवी के काम ने उन्हें धीरे-धीरे इंडस्ट्री में जगह दिलाई. लेकिन पंकज अपने स्ट्रगल को कभी बेहद दुखद कहानी की तरह पेश नहीं करते. उन्होंने एक बातचीत में कहा था कि एक दौर में उनके पास काम नहीं था और उनकी पत्नी की नौकरी से घर चलता था, लेकिन वो उन दिनों को भी जिंदगी का हिस्सा और खूबसूरत समय मानते हैं.
आठ घंटे का ऑडिशन और फिर बदल गई जर्नी
साल 2012 में Gangs of Wasseypur पंकज त्रिपाठी के करियर का बड़ा मोड़ बनी. फिल्म में उनका काम इतना शानदार रहा कि इंडस्ट्री ने इस एक्टर को सिर्फ छोटे किरदारों वाला चेहरा मानना बंद कर दिया. इसके बाद फुकरे, मसान, निल बट्टे सन्नाटे, बरेली की बर्फी और न्यूटन जैसी फिल्मों में उनके एक्टिंग की रेंज दिखाई दी. Newton के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में स्पेशल मेंशन मिला. यहां से पंकज की पहचान किसी एक तरह के किरदार से नहीं, बल्कि ऐसे एक्टर की बनने लगी जो कुछ मिनट के स्क्रीन टाइम में भी किरदार को यादगार बना सकता है.
फिर हुई 'कालीन भैया' की एंट्री
साल 2018 में 'मिर्जापुर' के साथ पंकज त्रिपाठी की पॉपुलैरिटी ने नया रूप लिया. अखंडानंद त्रिपाठी उर्फ ‘कालीन भैया’ सिर्फ एक किरदार नहीं रहा, बल्कि पॉप कल्चर का हिस्सा बन गया. शांत आवाज, ठहरा हुआ चेहरा, गर्दन का खास अंदाज और बिना चीखे डर पैदा करने वाली मौजूदगी. इन सबने किरदार को अलग पहचान दी. यही वो मुकाम था जहां ऑडियंस एक्टर का नाम भूलकर किरदार के नाम से उन्हें पहचानने लगे.
‘नाट्यशास्त्र’ को बनाया इंस्पिरेशन
पंकज त्रिपाठी की एक्टिंग-समझ का एक और दिलचस्प पहलू उनका नाट्यशास्त्र की तरफ झुकाव है. उन्होंने एक्टिंग को सिर्फ डायलॉग बोलने की कला नहीं माना, बल्कि शरीर, कपड़े, भाषा और भीतर की भावनाओं के मेल के रूप में समझाया है. एक इंटरव्यू में उन्होंने नाट्यशास्त्र के आधार पर एक्टिंग की चार व्यापक धाराओं, आंगिक, आहार्य, वाचिक और सात्त्विक का जिक्र किया था.
एक्टर के मुताबिक, आंगिक में शरीर ले भाव व्यक्त होते हैं, आहार्य में कॉस्ट्यूम और लाइटिंग की भूमिका आती है, वाचिक में भाषा और संवाद महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि सात्त्विक एक्टिंग की भीतरी भावनाओं से निकलता है. उन्होंने ये भी बताया था कि उन्होंने एक एड में सात्त्विक तरीके से एक्टिंग करने का प्रयोग किया और उसे बेहद तरीके से स्क्रिन पर प्रजेंट किया.