जब भी हिंदी सिनेमा के सबसे भारी और असरदार डायलॉग्स की बात होती है, तो लोगों के जहन में गुलजार, सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे राइटर्स का नाम ही आता है या फिर उन डायलॉग्स को बोलने वाले स्टार्स का चेहरे आंखों के सामने घूमता रहता है. कोई अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन वाले तेवरों को याद करता है, तो कोई धर्मेंद्र के रौबदार अंदाज का मुरीद दिखता है. 90 के दौर में आने वाले दर्शक गोविंदा के कॉमेडी डायलॉग्स पर ठहाके लगता है और शक्ति कपूर की कॉमिक टाइमिंग पर तालियां बजाते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे का सच किसी को पता नहीं होता.
आज हम आपको उस नायाब शख्सियत के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके लिखे डायलॉग्स ने इन तमाम कलाकारों को सुपरस्टार बना दिया और वो कोई और नहीं, बल्कि कादर खान थे. सिनेमा के शौकीन कादर को एक बेजोड़ एक्टर, कॉमेडियन और स्क्रीनराइटर के तौर पर पहचानते हैं, लेकिन असल में उनकी सबसे बड़ी ताकत वो कलम थी, जिसने हिंदी ऑडियंस की धड़कनों को समझा. उन्होंने एक या दो नहीं, बल्कि दर्जनों सितारों के करियर की नींव अपने लिखे पन्नों पर खड़ी की. कई फिल्मों को अमर बना दिया और ऐसे डायलॉग्स लिखे, जो करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए.

बावजूद इसके उनका नाम पर्दे पर चमकती रोशनी के पीछे ही रहा. यही वजह है कि जानकार उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा ‘घोस्ट राइटर’ मानते हैं. सिनेमाघरों की अंधेरी दुनिया में जब कोई हीरो अपनी भारी आवाज में एक लंबा-चौड़ा डायलॉग बोलता है, तो पूरा थिएटर सीटियों और तालियों से गूंज उठता है. दर्शक टिकट की पाई-पाई वसूल समझकर सिर्फ उस चमकते चेहरे को मसीहा मान लेते हैं.
‘घोस्ट राइटर’ वो लेखक होता है, जो किसी बुक, स्पीच, आर्टिकल, डायलॉग, गाने या दूसरे क्रिएटिव कंटेंट लिखता है, लेकिन उसका नाम कभी पब्लिक के सामने नहीं आता. श्रेय किसी और को मिलता है, जबकि असली कहानी पर्दे के पीछे पीछा राइटर लिखता है. एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में कई स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स राइटर ऐसे रहे हैं, जिनके लिखे शब्द स्टार्स बड़े पर्दे पर बोलकर खूब वाहवाही और तालियां बटोर लेते हैं, लेकिन उनके पीछे कलम चलाने वाले हमेशा गुमनाम ही रह जाते हैं. ऐसे ही फनाकार, कलम के कदरदान और कलाकार थे कादर खान, जिन्हें सिर्फ फिल्मों में उनके साइट रोल्स के लिए क्रेडिट मिला था. उनकी राइटिंग के लिए नहीं.
किसी भी फिल्म के हिट होने पर वाहवाही और तालियों की सारी मलाई हमेशा हीरो के हिस्से चली जाती है, पर उस किरदार की आत्मा रचने वाले कादर खान का पसीना किसी को नजर नहीं आता था. 70 के दौर से लेकर 90 के दौर तक बॉलीवुड में जो भी सबसे बड़ी हलचल हुई, उसके मूल में कादर खान की ही स्याही फैली हुई थी. फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’ और ‘अग्निपथ’ जैसी फिल्मों के तेवर सीधे उनकी सोच से निकले थे.
जब बच्चन साहब पर्दे पर मौत से बात करते थे या जिंदगी का फलसफा समझाते थे, तो वो किसी फिलोसोफर की तरह सोचने वाले राइटर कादर खान के अपने शब्द हुआ करते थे. उनकी सबसे नायाब खूबी यही थी कि वे किसी दफ्तर में बैठकर किताबी बातें नहीं लिखते थे, बल्कि हर किरदार की जमीनी हकीकत को उसकी भाषा बना देते थे.
वो इस कला के उस्ताद थे कि कौन सी बात सिर्फ पढ़ने में भारी है और कौन सी सुनने वाले के दिल को सीधे छू लेगी. इसी समझदारी की वजह से उनके लिखे डायलॉग्स सिनेमाघरों की चारदीवारी फांदकर सीधे आम घरों के ड्राइंग रूम और चौराहों पर गूंजने लगे.
कई फिल्म क्रिटिक्स को ये बात सुनने में थोड़ी अजीब या बढ़ा-चढ़ाकर कही गई लग सकती है, लेकिन 90 के दौर की पीढ़ी ने जिस तरह से बात करना सीखा, उसमें कादर खान की कलम का ही कमाल था. उस दौर के बच्चों और यंग जनरेशन के पास आज की तरह इंटरनेट का दायरा नहीं था, उनकी दुनिया सिनेमा के किरदारों से चलती थी. उस पीढ़ी ने दोस्तों से बात करने के सारे नुस्खे और तेवर इन्हीं फिल्मों से सीखे थे.
उस दौर की सुपरहिट कॉमेडी फिल्मों में बोली जाने वाली भाषा न तो बहुत भारी-भरकम या किताबी हिंदी थी और न ही वो किसी तरह की फूहड़ सड़कछाप बोली थी. वो मुंबई की लोकल ट्रेनों, चौराहों और छोटे शहरों के मोहल्लों में बोली जाने वाली ठेठ हिंदुस्तानी थी. उसमें लखनऊ की उर्दू वाली नजाकत भी घुलती थी और बंबईया जिंदगी की बेबाक मस्ती भी, जिसने हर तबके के दर्शक को अपना दीवाना बना दिया.
गोविंदा, कादर खान और शक्ति कपूर की तिगड़ी ने ‘कुली नंबर 1’ और ‘दूल्हे राजा’ जैसी फिल्मों से पूरे देश के चेहरों पर खिलखिलाहट बिखेर दी थी. इन फिल्मों के एक-एक पंच इतने नेचुरल हुआ करते थे कि स्कूल के बस्तों से लेकर कॉलेज की कैंटीन तक हर जगह बच्चे और नौजवान उनकी नकल उतारते दिखते थे. अगर आज की बोलचाल पर कोई ईमानदार अध्ययन हो, तो पता चलेगा कि उस दौर की भाषा कादर खान की ही देन थी.

वक्त का पहिया तेजी से घूमा और कादर खान इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनके रचे शब्दों की उम्र आज भी जस की तस बनी हुई है. आज का दौर इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब शॉर्ट्स का है, जहां इंसान की तवज्जो कुछ सेकंड की मोहताज है. हैरान करने वाली बात ये है कि इस दौर में भी 90 के दौर के उनके वही पुराने डायलॉग्स सबसे ज्यादा ट्रेंड करते दिखाई देते हैं.
आज की यंग जनरेशन, जिसने शायद कादर खान का वो दौर पर्दे पर नहीं देखा, वो भी उनकी छोटी-छोटी क्लिप्स पर रील्स बनाकर लाखों व्यूज बटोर रही है. लोगों को उनके लिखे पलों में एक गजब का भोलापन और शुद्ध देसी कॉमेडी मिलती है. वो ऐसा दौर था जब बिना किसी अश्लीलता के भी पूरे परिवार को हंसाया जा सकता था और यही मासूमियत आज के शोर-शराबे वाले डिजिटल दौर में सबसे ज्यादा सुकून देती है.
तकनीक पूरी तरह बदल चुकी है और पुराने सिनेमा हॉल की जगह लोगों की हथेलियों पर सजी पांच इंच की स्क्रीन ने ले ली है. पहले जो डायलॉग सुनकर बालकनी से अठन्नी-चवन्नी उछाली जाती थी, आज उसी लाइन को ऑडियो बनाकर सोशल मीडिया पर फॉरवर्ड किया जा रहा है. प्लेटफॉर्म बदल जाने के बाद भी अगर बात वही चल रही है, तो ये उस राइटर की अमर कलम का सबसे बड़ा सुबूत है.
ये सोचना अपने आप में बेहद दिलचस्प और रोमांचक है कि अगर कादर खान आज के इस डिजिटल और सोशल मीडिया के दौर में कलम चलाते, तो क्या कमाल करते. वो एक ऐसे फनकार थे, जो बदलते वक्त की नब्ज को सबसे पहले पहचानते थे. पूरी उम्मीद है कि आज की 15 सेकंड की रील के लिए भी वो ऐसा सॉलिड पंच लिख देते, जो किसी भी ट्रेंडिंग वीडियो को रातों-रात वायरल कर देता.
शायद आज के दौर में इंटरनेट पर जितने भी मशहूर मीम टेम्पलेट घूमते हैं, उनमें से आधे सीधे कादर खान की कलम से ही निकल रहे होते. वो जिस सादगी से ह्यूमन इमोशंस के उतार-चढ़ाव को पकड़ते थे, वो हुनर आज की ओटीटी वेब सीरीज की दुनिया में सबसे ज्यादा महंगा और दुर्लभ है. वो लंबे भाषणों के बजाय दो टूक बात कहने में यकीन रखते थे, जो डिजिटल मीडिया की पहली डिमांड है.
उनकी सबसे बड़ी ताकत हमेशा से ये रही कि वो आम हिंदुस्तानी ऑडियंस के दिल की धड़कन को बहुत करीब से महसूस करते थे. उन्हें पक्का पता होता था कि मिडिल क्लास आदमी किस बात पर खिलखिलाकर हंसेगा और किस चोट पर उसकी आंख भर आएगी. यह खूबी किसी भी दौर के राइटर को हमेशा जिंदा रखती है, इसलिए वो आज भी देश के सबसे बड़े कंटेंट किंग कहे जाते.
आज का हिंदी सिनेमा तकनीक के मामले में बहुत आगे निकल चुका है, बजट सैकड़ों करोड़ के पार हैं और विजुअल इफेक्ट्स देखकर आंखें चौंधिया जाती हैं. इंटरनेशनल लेवल की शूटिंग और चमचमाते कैमरे होने के बावजूद आम ऑडियंस के मन में हमेशा एक खालीपन सा बना रहता है. सिनेमाघरों के बाहर निकलते ही लोग अक्सर ये शिकायत करते हैं कि आज के गानों और डायलॉग्स में पहले जैसी वो बात नहीं रही.
इसका कतई ये मतलब नहीं है कि आज की पीढ़ी में अच्छे राइटर्स की कमी हो गई है, बल्कि पूरा सिस्टम ही बदल चुका है. आज एक ही फिल्म की कहानी को पांच अलग-अलग लोग मिलकर टुकड़ों में लिखते हैं, जिसे कॉरपोरेट भाषा में राइटर्स रूम कहा जाता है. इस बिखराव के चलते फिल्म की ओरिजनल आत्मा खो जाती है, जबकि कादर खान पूरी कहानी को अपने दिल में बसाकर एक सूत्र में पिरोते थे.
कादर खान सिर्फ कागजों पर खाली लाइनें नहीं भरते थे, बल्कि वो उस माहौल और मिट्टी की खुशबू को पन्नों पर उतारते थे, जिसमें वो किरदार सांस लेता था. यही वजह है कि चार दशक पुराने डायलॉग आज भी लोगों को जबानी याद हैं, जबकि आज की कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों के डायलॉग्स थिएटर की खिड़की बंद होते ही दिमाग से पूरी तरह उतर जाते हैं.
कादर खान का फिल्मी सफर सिर्फ कॉमिक रोल करने या पर्दे पर विलेन बनकर चीखने तक कतई सीमित नहीं था, वो तो उनका सिर्फ एक पहलू था. उन्होंने असल मायने में हिंदी सिनेमा को बोलना सिखाया और ये हुनर दिया कि कैसे कम शब्दों में पूरी जिंदगी का फलसफा बयां किया जाता है. उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को हंसना, रोना और जिंदगी के गमों को भुलाकर खुलकर जीना सिखाया था.
ये हमारे सिनेमाई इतिहास का एक बहुत बड़ा और कड़वा सच है कि जिन हीरोज ने उनके शब्द बोले, वो देखते ही देखते भगवान का दर्जा पा गए. सितारे शोहरत की बुलंदियों पर चढ़ते गए, मगर जिस इंसान ने उनके मुंह में वो जादू भरा था, उसे सिर्फ एक सपोर्टिंग एक्टर के टैग में समेट दिया गया. राइटर का नाम पोस्टरों के किसी कोने में छोटा सा छपकर हमेशा के लिए गुमनाम रह गया.
आज जब पूरी दुनिया में कंटेंट, कहानी और ओरिजनल राइटर की अहमियत पर गंभीर बहसें छिड़ रही हैं, तो ये सही वक्त है कि कादर खान को उनका असली हक मिले. उन्हें सिर्फ हंसाने वाले एक एक्टर की तरह नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की भाषा गढ़ने वाले एक लीजेंडरी फाइटर के तौर पर देखा जाना चाहिए. चेहरे वक्त की धूल में धुंधले पड़ सकते हैं, लेकिन कादर खान की स्याही से लिखी वो अमर आवाज हमेशा हिंदुस्तान के सीने में गूंजती रहेगी.
1. शहंशाह (1988)
‘रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं, नाम है शहंशाह’
2. शहंशाह (1988)
‘दुनिया की कोई जगह इतनी दूर नहीं है, जहां जुर्म के पांव में कानून अपनी फौलादी जंजीरें पहना न सके’
3. कुली (1983)
‘बचपन से सर पर अल्लाह का हाथ और अल्लाहरक्खा है अपने साथ... नाम है इकबाल’
4. हम (1991)
‘मोहब्बत को समझना है तो प्यारे खुद मोहब्बत कर, किनारे से कभी अंदाज-ए-तूफां नहीं होता’
5. नसीब (1981)
‘जिंदगी तो खुदा की रहमत है, जो नहीं समझा उसकी जिंदगी पे लानत है’
6. मुकद्दर का सिकंदर (1978)
‘जिंदा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं, मुर्दों से बदतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं’
7. मुकद्दर का सिकंदर (1978)
‘जिंदगी का अगर सही लुत्फ उठाना है ना, तो मौत से खेलो’
8. दूल्हे राजा (1998)
‘दौलत का क्या है, वो तो आती-जाती रहती है, मगर बेटी तो घर की इज्जत है’
9. हीरो नं. 1 (1997)
‘दुनिया में आदमी की नहीं, उसके कपड़ों की, उसकी दौलत की कदर होती है’
10. आतिश (1994)
‘जब जिंदगी की गाड़ी इश्क के प्लेटफॉर्म पर अटक जाए, तो उसमें शादी का पेट्रोल डाल देना चाहिए’