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सिनेमा जगत में ऐसे कई कलाकार हैं, जिन्होंने अपनी किस्मत खुद लिखी है. अदालत के कमरों से निकलकर फिल्मी दुनिया के सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचने की कहानी सच में हैरान करने वाली है. शुरुआत में जिस शख्स ने कोर्ट रूम में वकालत की और कानून की बारीकियां समझीं, उसने बाद में पर्दे पर अपनी अदाकारी से लोगों के दिलों पर राज किया. करीब पांच दशक से ज्यादा वक्त में उन्होंने कई भाषाओं और सैकड़ों फिल्मों में काम किया. आज उनकी गिनती देश के उन चुनिंदा कलाकारों में होती है, जिनके बिना सिनेमा जगत अधूरा सा लगता है.
हम यहां आज अपना 75वां जन्मदिन मना रहे मेगास्टार ममूटी की बात कर रहे हैं, जिनका असली नाम मुहम्मद कुट्टी पनापरम्बिल इस्माइल है. उनका जन्म 7 सितंबर 1951 को केरल में हुआ था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से बाकायदा वकालत की डिग्री ली और कोर्ट में केस लड़ने लगे. हालांकि, उनके दिल में एक्टिंग का शौक कॉलेज के दिनों से ही बसा हुआ था. पढ़ाई के दौरान ही उन्हें कुछ छोटे-मोटे रोल मिलने लगे थे. यही थी कि कोर्ट रूम की गहमागहमी के बीच भी उनका ध्यान हमेशा फिल्मों और अभिनय की दुनिया की तरफ खिंचा रहा.

ममूटी ने साल 1971 में फिल्म ‘अनुभवंगल पालिचाकल’ से पहली बार बड़े पर्दे पर कदम रखा था. उस वक्त उन्हें बहुत छोटा रोल मिला था, लेकिन उनके अंदर सीखने की भूख लगातार बढ़ती चली गई. इसके बाद भी उन्होंने कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल करना जारी रखा. साल 1980 में आई फिल्म ‘विल्क्कनुंडु स्वप्नंगल’ से आखिरकार उन्हें असली पहचान मिली. इसी मोड़ से उनके फिल्मी सफर ने सही मायने में रफ्तार पकड़ी. उन्हें लीड रोल ऑफर होने लगें और लोगों ने भी इस नए चेहरे को खुले दिल से अपनाया. देखते ही देखते वे सिनेमा के मुख्यधारा के मजबूत चेहरे बन गए.
80 का दशक ममूटी के लिए मील का पत्थर साबित हुआ. इस दौर में उन्होंने ‘अहिंसा’, ‘संध्याक्कु विरिंजा पूवु’, ‘अथिरात्रम’, ‘यात्रा’, ‘निराकूट्टू’ और ‘न्यू दिल्ली’ जैसी एक से बढ़कर एक हिट फिल्में दीं. उनकी सबसे बड़ी खासियत ये थी कि वे कभी किसी खास इमेज में कैद नहीं हुए. जहां एक तरफ उन्होंने गंभीर किरदारों में जान फूंकी, वहीं दूसरी तरफ एक्शन और ड्रामा में भी अपना दम दिखाया. दर्शकों को हर बार उनका नया अंदाज देखने को मिला. उनकी यही विविधता उन्हें दूसरे सितारों की भीड़ से पूरी तरह अलग और बेहद खास बनाती चली गई.

स्टारडम मिलने के बाद भी उन्होंने हमेशा मुश्किल रोल को प्रायोरिटी दी. ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘मथिलुकल’, ‘विदेयन’ और ‘पोंथन माडा’ जैसी फिल्मों में उनके काम को आज भी सराहा जाता है. उन्होंने अंग्रेजी और हिंदी में बनी फिल्म ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’ में बाबासाहेब का रोल इतनी खूबसूरती से निभाया कि देखने वाले दंग रह गए. अपने करियर में उन्होंने तीन बार बेस्ट एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड हासिल किया. इसके अलावा केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड और फिल्मफेयर साउथ जैसे ढेरों सम्मान उनके नाम रहे. साल 1998 में भारत सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित पद्म श्री से नवाजा था.
ममूटी ने अपने करियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है और मलयालम के अलावा हिंदी, तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी. 70 की उम्र पार कर जाने के बाद भी आज उनका जज्बा बिल्कुल नए कलाकारों जैसा है. वे आज भी नए डायरेक्टर्स और लीक से हटकर कहानियों में काम करना पसंद करते हैं. उन्होंने साबित किया कि स्टारडम उम्र से नहीं बल्कि लगातार मेहनत और खुद को बदलते रहने से कायम रहता है. वकालत से शुरू हुआ उनका सफर आज भी कलाकारों के लिए सबसे बड़ी इंस्पिरेशन हैं. उन्होंने अपने दम पर 340 करोड़ का साम्राज्य खड़ा किया है.

ममूटी एक्टिंग के साथ-साथ गाड़ियों के भी बड़े शौकीन हैं. उनके पास 80 के दशक से लेकर अब तक की तमाम मॉर्डन गाड़ियां मौजूद हैं. मेगास्टार ममूटी के गैराज में रोल्स-रॉयस घोस्ट से लेकर बीएमडब्ल्यू 7 सीरीज, मर्सिडीज-बेंज एस-क्लास, जगुआर XJ, पोर्शे पनामेरा, ऑडी Q7, रेंज रोवर, टोयोटा लैंड क्रूजर के साथ-साथ क्लासिक BMW E46 M3, Mercedes-Benz W124 E-Class अलावा कुछ और विंटेज कलेक्टर कारें भी हैं.
ममूटी के बेटे दुलकर सलमान भी मलयालम सुपरस्टार हैं और भारतीय सिनेमा के फेमस अभिनेताओं में गिने जाते हैं. उनका जन्म कोच्चि, केरल में हुआ और उन्होंने अमेरिका की पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की. एक्टिंग में आने से पहले वे दुबई में नौकरी करते थे. 2012 में फिल्म ‘सेकंड शो’ से करियर शुरू करने वाले दुलकर ने ‘बैंगलोर डेज’, ‘चार्ली’, ‘सीता रामम’, ‘कुरुप’ और ‘लकी भास्कर’ जैसी हिट फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई. वे अभिनेता होने के साथ प्रोड्यूसर भी हैं और मलयालम, तमिल, तेलुगु तथा हिंदी फिल्मों में काम कर चुके हैं.