SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

Explainer: प्लेटफॉर्म बदले, लेकिन फिल्म मार्केटिंग का मूल फॉर्मूला नहीं बदला; क्यूरियोसिटी जगाओ और ऑडियंस को स्क्रीन तक लाओ

आज फिल्मों की मार्केटिंग सोशल मीडिया, ट्रेलर और डिजिटल कैंपेन तक पहुंच चुकी है. लेकिन इसका मूल फॉर्मूला 130 साल पहले भी वही था. 1896 के पहले फिल्म विज्ञापन से लेकर आज तक, दर्शकों में जिज्ञासा जगाकर उन्हें स्क्रीन तक लाने की रणनीति लगातार कायम है.

Written By Swati Singh
Published: Sep 07, 2026, 06:19 PM IST | Updated: Sep 07, 2026, 06:47 PM IST
Join

आज भी किसी फिल्म के रिलीज से पहले उसका पोस्टर, टीजर और फिर ट्रेलर सामने आता है. इनसब की वजह से सोशल मीडिया पर कैंपेन चर्चा में आता है. लेकिन, क्या कभी ये सोचा है कि भारत में जब पहली बार सिनेमा आया था, तक के समय में मार्केटिंग कैसी होती थी. क्या उस दौर में भी सिनेमा का जादू ऐसा ही था. लगभग 130 साल पहले अखबार में छपे एक छोटे से विज्ञापन ने लोगों को ऐसी चीज देखने के लिए बुलाया था, जिसे 'दुनिया का अजूबा' बताया गया. तब न तो कोई बॉलीवुड स्टार था, न सोशल मीडिया और न ही डिजिटल प्रमोशन, फिर भी दर्शकों के बीच फिल्म देखने की उत्सुकता पैदा हो गई. इसमें सबसे खास बात ये है कि 1896 से आज तक फिल्म प्रमोशन के प्लेटफॉर्म भले ही बदल गए हों, लेकिन ऑडियंस को आकर्षित करने का मूल फॉर्मूला आज भी बिल्कुल वैसा ही हैं-क्यूरियोसिटी जगाओ, चर्चा पैदा करो और दर्शक को स्क्रीन तक लेकर आओ.

ऐसे में ये कहा जा सकता है कि फिल्म मार्केटिंग अब सिर्फ यह बताने तक सीमित नहीं है कि फिल्म कब रिलीज हो रही है. इसके साथ ही आज मार्केटिंग का बड़ा हिस्सा इस सवाल का जवाब खोजने में लगा रहता है कि दर्शक फिल्म देखने के लिए उत्सुक कैसे हो. लेकिन यह सवाल कोई नया नहीं है. लगभग डेढ़ सौ साल पहले भी सवाल यही था.

भारत में जब पहली बार चलती हुई तस्वीरें पर्दे पर दिखाई जाने वाली थीं, तब न सोशल मीडिया था, न ट्रेलर, न टेलीविजन, न ही रेडियो और प्रोमोशन करने वाले स्टार्स. दर्शकों को यह तक ठीक से पता नहीं था कि आखिर उन्हें देखने के लिए क्या मिलने वाला है. लेकिन तब भी उन्हें आकर्षित करने के लिए जो तरीका अपनाया गया, वो आज के फिल्म मार्केटिंग कैंपेन से काफी अलग था. लोगों को बुलाने के लिए कहा गया कि वे ऐसी चीज देखने आ रहे हैं, जैसी उन्होंने पहले कभी नहीं देखी. यानी भले मीडियम बदल गया, भाषा बदल गई और विज्ञापन का डिजाइन बदल गया. लेकिन आज भी फिल्म मार्केटिंग का सबसे पुराना हथियार वही है-क्यूरियोसिटी.

7 जुलाई 1896 का वो अखबार

भारत में चलती हुई तस्वीरों को पहली बार 7 जुलाई 1896 में बॉम्बे के वाटसन होटल में हुआ. इसे फ्रांस के लूमियर ब्रदर्स ने 200 भारतीयों को मुंबई के वॉटसन होटल में दिखाया. लुमिएर बंधुओं के सिनेमैटोग्राफ से दिखाया गया था और उनके प्रतिनिधि मारियस सेस्तिए भारत में इसे लेकर आए थे. ये तब का दौर था जब लोग सिनेमा शब्द से आज के लोगों की तरह परिचित नहीं थे. ऐसे में तब बसी चुनौती यह नहीं थी कि लोगों को फिल्म की कहानी बताई जाए. बल्कि ज्यादा बड़ी चुनौती यह थी कि उन्हें समझाया जाए कि आखिर यह चीज क्या है? और इसके बाद फिर भारत में फिल्म मार्केटिंग का पहला दिलचस्प प्रयोग शुरू हुआ.

7 जुलाई की सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया और बॉम्बे गजट में इस शो का विज्ञापन छपा. इसी दिन बॉम्बे में लूमियर ब्रदर्स की फिल्मों की पहली सार्वजनिक स्क्रीनिंग होने वाली थी और लोगों को इसकी जानकारी एक विज्ञापन के जरिए दी गई. विज्ञापन में इस नए अनुभव को 'The Marvel of the Century' और 'The Wonder of the World' जैसे शब्दों में पेश किया गया था.

इसके बाद लिखा था कि दर्शकों को 'लिविंग फोटोग्राफिक पिक्चर्स' यानी जीवंत फोटोग्राफिक तस्वीरें दिखाई जाएंगी, जिन्हें जीवन के आकार के करीब प्रस्तुत किया जाएगा. इसमें ध्यान देने वाले वाली ये थी कि उस ऐड में किसी स्टार का नाम नहीं था. न ही कोई फिल्मी कहानी थी. बिना रोमांस, एक्शन, इमोशनल डायलॉग के. लेकिन एक चीज बेहद साफ कही गईं थी. आपने ऐसा पहले कभी नहीं देखा होगा. यही उस विज्ञापन की सबसे बड़ी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी थी.

आखिर विज्ञापन में लिखा क्या था?

यह सवाल इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. आज जब कोई फिल्म आने वाली होती है तो उसका मार्केटिंग कैंपेन आम तौर पर कई चीजें बेचता है. इसमें स्टार की पॉपुलैरिटी, फिल्म की कहानी, जॉनर, गाना, विजुअल स्केल, कॉमेडी, एक्शन, रोमांस या किसी खास फ्रेंचाइजी का हिस्सा होने का फायदा मिलता है. लेकिन तब बेचने के लिए इन चीजों में से लगभग कुछ भी मौजूद नहीं था. ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म का कॉन्सेप्ट ही नया था. इसलिए मार्केटिंग को प्रोडक्ट से पहले अनुभव बेचना पड़ा.

इन विज्ञापनों में यह नहीं कहा जा रहा था कि आइए एक फिल्म देखिए. बल्कि इस बात का दावा किया जा रहा था कि आइए दुनिया का एक अद्भुत नया अनुभव देखिए. क्योंकि अगर विज्ञापन सिर्फ ये कहता कि 'चलती तस्वीरों का प्रदर्शन होगा', तो शायद दर्शकों को यह समझ नहीं आता. लेकिन जब उन्हें बताया गया कि यह 'सदी का चमत्कार' और 'दुनिया का आश्चर्य' है, तो विज्ञापन ने जानकारी के साथ कल्पना भी पैदा कर दी. यही क्यूरियोसिटी मार्केटिंग है.आपको पूरी चीज नहीं बतानी. आपको इतना बताना है कि सामने वाला बाकी चीज खुद देखने के लिए मजबूर हो जाए. आज फिल्म का टीजर भी यही करता है. टीजर कहानी पूरी नहीं बताता. ट्रेलर भी कई बार क्लाइमेक्स छिपाकर रखता है.

उस समय सिनेमा को क्या कहा जाता था?

आज 'फिल्म', 'मूवी' और 'सिनेमा' जैसे शब्द इतने कॉमन है कि हमारे दिमाग में कभी इनके पीछे की तकनीकी क्रांति महसूस ही नहीं हुई. लेकिन 1896 में 'चलती तस्वीर' अपने आप में एक नई अवधारणा थी. भारत में लुमिएर मशीन को 'सिनेमैटोग्राफ' कहा गया. उस समय न्यूजपेपर ने इसे समझाने के लिए 'लिविंग फोटोग्राफी' और 'लिविंग फोटोग्राफिक पिक्चर्स' जैसे शब्द इस्तेमाल किए. यह भी अपने आप में एक मार्केटिंग स्ट्रेटजी थी. क्योंकि लोगों को नए मीडियम के लिए नई भाषा चाहिए थी. इसलिए शुरुआती विज्ञापनों ने सिनेमा को उसके तकनीकी नाम से ज्यादा उसके अनुभव के जरिए समझाया. जैसे-चलती हुई तस्वीर, जीवंत फोटोग्राफ, जीवन के आकार की तस्वीर, दुनिया का आश्चर्य यानी विज्ञापन ने पहले उत्पाद की उपयोगिता नहीं समझाई और उसने उसका जादू समझाया.

टिकट सिर्फ एक रुपये का था

आज एक रुपया बेहद मामूली लगता है, लेकिन 1896 में यह सामान्य दर्शक के लिए काफी महंगा टिकट था. इसके बावजूद नई तकनीक देखने के लिए लोग पहुंचे. 7 जुलाई को चार शो हुए और शुरुआती प्रदर्शन को जबरदस्त उत्सुकता मिली. इस आयोजन को केवल एक मनोरंजन कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत में नए तरह के दर्शक अनुभव की शुरुआत माना जाता है. आज के दर्शक जिन फिल्मों को 'शॉर्ट फिल्म' कहेंगे, उस समय वे अपने आप में अविश्वसनीय दृश्य थे. एक ट्रेन स्टेशन पर आती दिखाई देती थी, फैक्ट्री से मजदूर बाहर निकलते थे, समुद्र की लहरें दिखाई देती थीं और एक दीवार को गिरते हुए दिखाया जाता था. खास तौर पर Arrival of a Train जैसे दृश्य उस दौर के दर्शकों के लिए बिल्कुल नया अनुभव थे. पर्दे पर वास्तविक दुनिया को चलते हुए देखना ही अपने आप में सबसे बड़ा आकर्षण था.

पहले शो के बाद क्या हुआ?

इसमें खास बात यह है कि प्रचार केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं रहा. अगले दिन द एडवोकेट ऑफ इंडिया में इस प्रदर्शन की समीक्षा आई. 9 जुलाई को द बॉम्बे गैजेट ने भी शो पर लिखा. यानी अखबारों ने अनजाने में सिनेमा के लिए पहला प्रमोशन, पहला रिव्यू, पहला पब्लिक डिस्कशन तैयार कर दिया था. 9, 10 और 11 जुलाई को भी Watson’s Hotel में शो हुए. जबकि 14 जुलाई को कार्यक्रम Novelty Theatre पहुंच गया, जहां बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया. 130 साल पहले भी मार्केटिंग का बेसिक फॉर्मूला वही था. यहीं इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा छिपा है. आज फिल्म मार्केटिंग में कहा जाता है-पहले curiosity पैदा करो, फिर   एक्सपीरियंस का वादा करो और आखिर में दर्शक को टिकट खरीदने के लिए प्रेरित करो.

पहले शो के बाद ही सिनेमा का पहला वर्ड ऑफ माउथ कैसे बना?

आज किसी फिल्म के लिए वर्ड ऑफ माउथ का मतलब है, दर्शक फिल्म देखकर बाहर निकले और दोस्तों, परिवार या सोशल मीडिया पर उसके बारे में बात करने लगे. 1896 में सोशल मीडिया तो दूर, रेडियो और टीवी भी नहीं थे. लेकिन अखबार उस दौर का सबसे बड़ा प्लेटफार्म था.इस वर्ड ऑफ माउथ की एक खास बात थी, दर्शक सिर्फ 'फिल्म' नहीं देख रहे थे, वे एक नई तकनीक का अनुभव कर रहे थे. ट्रेन का स्टेशन पर आना, फैक्ट्री से मजदूरों का निकलना और समुद्र की लहरों जैसी वास्तविक जिंदगी की तस्वीरें पर्दे पर चलती हुई देखना अपने आप में चर्चा का विषय था.

मीडियम बदला, लेकिन क्या फिल्म मार्केटिंग का फॉर्मूला बदला?

1896 में फिल्म के पास न स्टार इंटरव्यू थे, न Instagram, न यूट्यूब और न ही ट्रेलर. फिर भी विज्ञापन ने तीन चीजें बहुत साफ तरीके से कीं. इसमें जिज्ञासा पैदा करना, अनुभव का वादा किया और दर्शक को शो तक पहुंचने की वजह दी.'मार्वल ऑफ द सेंचुरी' कहकर उत्सुकता जगाई गई. 'लिविंग फोटोग्रफिक पिक्चर' कहकर बताया गया कि अनुभव कैसा होगा. छह फिल्मों के नाम और शो का समय देकर दर्शक को यह भी बताया गया कि उसे मिलेगा क्या और कब मिलेगा. आज यही काम अलग-अलग मीडियम से होता है. पहले पोस्टर और अखबार थे, फिर रेडियो और टीवी आए, उसके बाद ट्रेलर और म्यूजिक लॉन्च और अब सोशल मीडिया, मीम और वायरल कैपेन हैं.

विज्ञापन का इतिहास सिनेमा से भी पुराना है

फिल्म मार्केटिंग को समझने के लिए विज्ञापन के इतिहास को थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा. भारत में मंदसौर का प्रसिद्ध रेशम बुनकरों से जुड़ा शिलालेख इस संदर्भ में खास उदाहरण है. यह गुप्तकालीन संस्कृत शिलालेख रेशम बुनकरों के एक गिल्ड से जुड़ा था. इसमें उस समुदाय, उनके कौशल, उनके बनाए रेशमी वस्त्र और उनके सामाजिक योगदान का उल्लेख मिलता है. लोकप्रिय इतिहास और प्रतियोगी परीक्षाओं में इसे अक्सर दुनिया का पहला विज्ञापन कहा जाता है. आधुनिक अर्थ में यह किसी दुकान का विज्ञापन नहीं था जिसमें कीमत, दुकान का पता या खरीदने की सीधी अपील लिखी हो. यह एक सार्वजनिक शिलालेख था, जिसमें बुनकर समुदाय की प्रतिष्ठा, उनके काम और उनके बनाए वस्त्रों की प्रशंसा दिखाई देती है.

इसी वजह से इसे विज्ञापन की शुरुआती परंपरा से जोड़ा जाता है. मूल शिलालेख में उस रेशमी वस्त्र को लेकर अत्यंत अलंकारिक भाषा इस्तेमाल की गई है और उसके प्रभाव का वर्णन किया गया है. यानी यहां भी एक चीज दिखाई देती है. उत्पाद से पहले उसकी प्रतिष्ठा बनाई जा रही है. आज ब्रांड कहता है कि हमारा उत्पाद प्रीमियम है. तब शिलालेख अपने शिल्प और वस्त्र की श्रेष्ठता को प्रतिष्ठा के साथ जोड़ रहा था. यानी विज्ञापन का एक मूल सिद्धांत यहां भी मौजूद है. लोगों को सिर्फ यह मत बताइए कि आप क्या बनाते हैं. उन्हें यह महसूस कराइए कि आपका बनाया हुआ खास क्यों है.

दुनिया का सबसे पुराना विज्ञापन भी यही कहानी बताता है

दुनिया में विज्ञापन की शुरुआत को लेकर भी एक ही निश्चित तारीख या एक ही वस्तु पर सहमति नहीं है. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार पोम्पेई में मलबे के बीच एक किताब बेचने वाले का विज्ञापन मिला था, जिसे पहली सदी के आसपास का माना जाता है. वहीं कुछ इतिहासकार इससे भी पुराने बेबीलोनियाई व्यापारिक संकेतों को लिखित विज्ञापन की शुरुआती शक्ल मानते हैं.

इससे एक दिलचस्प बात सामने आती है. विज्ञापन की शुरुआत अखबार से नहीं हुई. विज्ञापन की शुरुआत डिजिटल स्क्रीन से नहीं हुई. विज्ञापन की जरूरत तब पैदा हुई जब किसी व्यक्ति को अपनी चीज, अपनी सेवा, अपना हुनर या अपनी पहचान दूसरे व्यक्ति से अलग दिखानी थी. यानी विज्ञापन का मूल उद्देश्य हमेशा एक ही रहा-ध्यान खींचना, पहचान बनाना.

फिर फिल्म विज्ञापन कैसे बदलता गया?

भारत में शुरुआती फिल्मों की पब्लिसिटी भी अखबारों, हैंडबिल और छोटे प्रचार पत्रों से शुरू हुई. जब दादासाहेब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ आई, तब भी फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने में अखबार और हैंडबिल जैसे माध्यम महत्वपूर्ण थे. इसके बाद धीरे-धीरे पोस्टर फिल्म प्रचार का सबसे शक्तिशाली माध्यम बन गया. हाथ से बनाए गए पोस्टर सिर्फ फिल्म का नाम नहीं बताते थे. वे फिल्म का मूड बनाते थे. हीरो को बड़ा दिखाया जाता था. हीरोइन की छवि को आकर्षक बनाया जाता था. खलनायक को डरावना बनाया जाता था. एक्शन फिल्म में हिंसा और गति दिखाई जाती थी.रोमांटिक फिल्म में चेहरे और भावनाओं पर जोर होता था. यानी पोस्टर ने वही काम किया जो आज का थंबनेल करता है.

आज फिल्म का प्रमोशन फिल्म से पहले शुरू हो जाता है

आज किसी बड़े प्रोजेक्ट का प्रचार कई बार फिल्म की शूटिंग पूरी होने से पहले शुरू हो जाता है. पहले घोषणा होती है. फिर फर्स्ट लुक आता है. फिर पोस्टर. फिर किरदार का लुक. फिर टीजर. फिर ट्रेलर. फिर गाना. फिर सोशल मीडिया चैलेंज.फिर इंटरव्यू.

 

फिर शहरों का दौरा. फिर प्रीमियर.और रिलीज के बाद रिव्यू, पब्लिक रिएक्शन और बॉक्स ऑफिस चर्चा भी मार्केटिंग का हिस्सा बन जाती है.इसका मतलब यह है कि फिल्म अब सिर्फ एक उत्पाद नहीं रही.यह एक लंबा मीडिया इवेंट बन गई है.हर चरण का उद्देश्य एक ही है. दर्शक के दिमाग में फिल्म को जिंदा रखना.


लेकिन क्या सिर्फ क्यूरियोसिटी से फिल्म हिट हो सकती है?

नहीं. यही इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष है. मार्केटिंग दर्शक को थिएटर तक ला सकती है. लेकिन थिएटर से बाहर निकलने के बाद दर्शक क्या कहेगा, यह फिल्म तय करती है. अगर फिल्म अच्छी लगी, तो वर्ड ऑफ माउथ मार्केटिंग को कई गुना बढ़ा सकता है. अगर फिल्म खराब लगी, तो वही वर्ड ऑफ माउथ मार्केटिंग के खिलाफ जा सकता है. इसलिए फिल्म मार्केटिंग का पहला काम है ध्यान खींचना.

दूसरा काम है उम्मीद बनाना. और तीसरा काम है उस उम्मीद को फिल्म के अनुभव से पूरा करना. आज की मार्केटिंग और अतीत की मार्केटिंग एक दूसरे से जुड़ती है. लुमिएर के शुरुआती शो ने एक नई तकनीक के लिए जिज्ञासा पैदा की.फिर दर्शकों के अनुभव ने उसकी मांग को आगे बढ़ाया.आज भी किसी फिल्म के लिए यही चक्र काम करता है.टीजर जिज्ञासा पैदा करता है.ट्रेलर उम्मीद बनाता है.स्टार प्रमोशन चर्चा बढ़ाता है.रिलीज दर्शक को अनुभव देती है. और फिर दर्शक की प्रतिक्रिया अगली ऑडियंस को प्रभावित करती है.

 

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

स्वाति सिंह एक वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें न्यूज़ मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह Zee News Hindi की डिजिटल टीम के एंटरटेनमेंट (मनोरंजन) सेक्शन में काम कर रही हैं. स्वाति की एक्सपर्टीज बॉलीवुड न्यूज़, सिनेमा, एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के ट्रेंड्स और सेलेब्स की इन-डेप्थ रिपोर्टिंग में है.अपने करियर के दौरान स्वाति ने आयुष्मान खुराना, नीना गुप्ता, गजराज राव और ध्वनि भानुशाली जैसी कई जानी-मानी बॉलीवुड और म्यूजिक इंडस्ट्री की हस्तियों के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किए हैं. Zee News से पहले उन्होंने अमर उजाला, लाइव हिंदुस्तान और लोकमत जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं, जहां काम के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया है.माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) से मास कम्युनिकेशन और सुरेश ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (MBA) की डिग्री हासिल करने वाली स्वाति, मनोरंजन जगत की खबरों को पाठकों तक रोचक और सटीक ढंग से पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं.आप स्वाति सिंह से swati.kumari@india.com पर सीधे ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES