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भारतीय सिनेमा के बेबाक और दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को 75 साल की उम्र में निधन हो गया. उनके जाने से हिंदी और मराठी सिनेमा ने एक ऐसा फनकार खो दिया, जिसकी आवाज और डायलॉग बोलने का अंदाज सबसे जुदा था. सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक नाना को गोवा में अपने घर पर अचानक सीने में दर्द उठा, जिसके बाद उनको आनन-फानन में नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी सांसें लौट न सकीं. उनके जाने के बाद उनकी सादगी और शर्तों पर जीने की कहानियां फिर ताजा हो गई हैं.
नाना पाटेकर का करोड़ों की फीस तक पहुंचने का ये सफर बहुत तंगहाली और आंसुओं से होकर गुजरा था. उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में अपने बीते दिनों का दर्द बयां किया था. कम उम्र में परिवार की खराब माली हालत के चलते उन्हें सड़कों पर उतरना पड़ा. वे फिल्मों के पोस्टर पेंट करने का काम करते थे और महीने के केवल 35 रुपये कमाते थे. नाना के 1998 के रेडिफ वाले इंटरव्यू का हवाला देते हुए एक मीडिया हाउस ने बताया कि वे काम के लिए रोजाना करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर चूनाभट्टी जाते थे. वहां दिन भर की कड़ी धूप के बदले उन्हें एक वक्त का खाना और महीने के 35 रुपये मिले थे.
थिएटर के मजबूत मंच से निकलकर नाना ने 1978 में फिल्म ‘गमन' से बड़े पर्दे पर कदम रखा था. शुरुआती दौर में पहचान धीमी रही, मगर फिल्म ‘अंकुश' ने ऑडियंस और फिल्ममेकर्स को उनकी अदाकारी का कायल बना दिया. इसके बाद ‘परिंदा’ ने उन्हें सिनेमा के सबसे धाकड़ कलाकारों की कतार में ला खड़ा किया. फिर तो ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्नि साक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’, ‘यशवंत’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘टैक्सी नंबर 9211’, ‘राजनीति’, ‘वेलकम’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों ने इतिहास रचा. ‘परिंदा’ के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर और ‘क्रांतिवीर’ के लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला.
90 का दौर आते-आते नाना पाटेकर फिल्म इंडस्ट्री का एक बड़ा और असरदार चेहरा बन चुके थे. लोग केवल उनके डायलॉग और अंदाज को देखने सिनेमाघरों में खिंचे चले आते थे. साल 1993 की सुपरहिट फिल्म ‘तिरंगा’ के लिए नाना को करीब 45 लाख रुपये की भारी फीस मिली थी. इसके बाद ‘क्रांतिवीर’ और ‘अग्नि साक्षी’ की जबरदस्त सक्सेस ने उनकी मार्केट में कीमत कई गुना बढ़ा दी. न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबकि, ‘अग्नि साक्षी’ के बाद 90 के दशक के बीच में नाना की मांग करीब 1.25 करोड़ पर मूवी पहुंच गई थी. ये उस लड़के की ऐतिहासिक जीत थी, जिसने कभी चंद रुपयों के लिए पोस्टर रंगे थे.

बॉलीवुड के गलियारों में सबसे ज्यादा मशहूर किस्सा नाना पाटेकर के एक करोड़ रुपये फीस मांगने का है. जाने-माने अभिनेता परेश रावल ने द लल्लनटॉप को दिए एक इंटरव्यू में ये मजेदार बात बताई थी. उनके मुताबिक नाना पहले ऐसे एक्टर थे, जिन्होंने किसी फिल्म के लिए सीधे 1 करोड़ रुपये की बड़ी रकम मांग ली थी. उस जमाने में कई बड़े हीरो भी इतनी मोटी रकम मांगने से कतराते थे. परेश ने बताया कि नाना ने ये रकम केवल मांगी ही नहीं, बल्कि मेकर्स ने उन्हें खुशी-खुशी दी भी. द इकोनॉमिक टाइम्स ने भी परेश के हवाले से लिखा कि उस दौर में किसी सपोर्टिंग या कैरेक्टर एक्टर के लिए ये कदम वाकई बहुत ऐतिहासिक था.
इस 1 करोड़ रुपये की मांग का असली मतलब सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि कलाकारों के मान-सम्मान से जुड़ा था. उस दौर में मेन हीरो और बाकी कलाकारों के पैसों में जमीन-आसमान का फर्क हुआ करता था. परेश रावल के मुताबिक जब नाना ने एक करोड़ रुपये वसूले, तो पूरी बिरादरी के साथी कलाकारों को अंदर से बहुत खुशी हुई. सबको लगा कि एक मंझे हुए एक्टर ने अपने टैलेंट की सही कीमत वसूली है. जनसत्ता की रिपोर्ट में भी इसका जिक्र मिलता है कि इस पर इंडस्ट्री में खूब चर्चा हुई. नाना खुद हमेशा कलाकारों को कम पैसे मिलने पर खुलकर बोलते थे, इसलिए ये कदम उनके स्वाभिमान का बड़ा सबूत था.
परेश रावल ने नाना के अलबेले मिजाज से जुड़ा एक और जबरदस्त किस्सा साझा किया था. उन्होंने बताया कि एक बार नाना ने अपनी फिल्म के निर्माता को घर पर दावत दी और बड़े प्यार से मटन खिलाया. खाना खत्म होते ही नाना ने उसी निर्माता के हाथ में जूठे बर्तन थमा दिए और खुद साफ करने को कह दिया. नाना का मिजाज ऐसा था कि वे किसी के आगे झुकते नहीं थे. परेश ने कहा कि नाना के लिए पैसा कभी सबसे ऊपर नहीं रहा. अगर रोल और कहानी उनके दिल को छू जाती तो वे बहुत मामूली पैसों में काम कर लेते थे, लेकिन कहानी पसंद न आए तो दुनिया की कोई दौलत उन्हें नहीं खरीद सकती थी.
नाना पाटेकर की 1 करोड़ वाली कहानी आज इसलिए अमर है, क्योंकि एक तरफ 35 रुपये की तंगहाली थी, तो दूसरी तरफ अपने दम पर करोड़ों रुपये फीस लेने का स्वाभिमान. इतने ऊंचे मुकाम पर पहुंचकर भी नाना ने कभी दिखावा नहीं किया. वे हमेशा किसानों की मदद और सादगी भरी जिंदगी के लिए जाने गए. आगे चलकर उनकी फीस 2 से 3 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी, लेकिन नाना की असली पहचान उनका बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि उनका अभिनय था. ‘परिंदा’ का खौफनाक अन्ना हो, ‘क्रांतिवीर’ का बागी प्रताप, ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी या ‘नटसम्राट’ का गणपत, नाना ने साबित किया कि दिल जीतने के लिए सिर्फ एक सच्चा कलाकार होना काफी है.