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आज सोशल मीडिया पर खबरें पढ़ना हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा बन गया है. फोन खोलते ही राजनीति, सेहत, नौकरी, पढ़ाई, मनोरंजन और दुनिया भर की खबरें सामने आ जाती हैं. लेकिन परेशानी यह है कि हर तेजी से फैलने वाली खबर सच नहीं होती. कई बार झूठी या अधूरी जानकारी भी इतनी तेजी से फैलती है कि उसे पहचानना मुश्किल हो जाता है.
सबसे बड़ी बात यह है कि झूठी खबरों का शिकार सिर्फ कम पढ़े-लिखे लोग नहीं होते. रिसर्च से पता चलता है कि ज्यादा पढ़ाई करने से भी कोई व्यक्ति गलत जानकारी से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाता. हमारा दिमाग, हमारी भावनाएं, हमारी पसंद और किसी खबर को पहले देख चुके होने की बात भी इस पर असर डालती है कि हम किसी जानकारी को सच मानते हैं या झूठ.
मनोविज्ञान की प्रोफेसर नादिया ब्रेशियर का कहना है कि गलत जानकारी पर भरोसा करना सिर्फ दूसरे लोगों की समस्या नहीं है. उन्होंने खुद भी माना है कि वह कभी-कभी झूठी खबरों पर भरोसा कर चुकी हैं, जबकि उनका रिसर्च ही इस बात पर है कि लोग गलत बातों को सच क्यों मान लेते हैं.
उनकी बात से एक जरूरी बात समझ आती है कि झूठी खबरों से कोई भी व्यक्ति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. सोशल मीडिया पर हमारा ध्यान अक्सर ऐसी चीजों पर जाता है, जो मजेदार, चौंकाने वाली या भावनाओं से जुड़ी होती हैं. ऐसे समय में हम हमेशा यह नहीं सोचते, “क्या यह सच है?” कई बार हम पहले यह देखते हैं कि “क्या यह दिलचस्प है?”
इस रिसर्च को मुबाशिर सुल्तान और उनकी टीम ने किया. उनकी टीम में एलन एन. टम्प, नीना एहमैन, फिलिप लोरेंज-स्प्रीन, राल्फ हर्टविग, एंटोन गोलविट्जर और राल्फ एच. जे. एम. कुर्वर्स शामिल थे. मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट के इन रिसर्चकर्ताओं ने अमेरिका में 2006 से 2023 के बीच हुए 31 प्रयोगों के आंकड़ों का अध्ययन किया.
इसमें 11,561 लोगों के 2.56 लाख से ज्यादा जवाबों को देखा गया. रिसर्चकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि उम्र, पढ़ाई, राजनीतिक सोच, सोचने की क्षमता और किसी खबर को पहले देख चुके होने जैसी बातें सही और गलत खबरों में फर्क करने पर कितना असर डालती हैं.
रिसर्च में पाया गया कि ज्यादा पढ़ाई करने से किसी व्यक्ति की सही और गलत खबर में फर्क करने की क्षमता अपने आप बेहतर नहीं हो जाती.
इसका मतलब यह नहीं है कि पढ़ाई बेकार है. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि सिर्फ डिग्री होना काफी नहीं है. किसी खबर को जांचना और सोच-समझकर फैसला करना भी जरूरी है.
आमतौर पर युवा लोगों को इंटरनेट और सोशल मीडिया की अच्छी जानकारी रखने वाला माना जाता है. क्योंकि वे बचपन से ही मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल करते आए हैं. लेकिन इस रिसर्च में उम्र को लेकर एक दिलचस्प बात सामने आई.
रिसर्च में 18 से 31 साल, 32 से 47 साल और 48 से 88 साल के लोगों की तुलना की गई. इसमें 48 से 88 साल के लोगों ने सही और गलत खबरों में फर्क करने में युवा लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया.
लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बुजुर्ग लोग सोशल मीडिया पर झूठी खबरों से हमेशा सुरक्षित रहते हैं. असल जिंदगी में गलत जानकारी देखना, उस पर भरोसा करना और उसे आगे भेजना अलग-अलग बातें हैं. इसलिए सिर्फ उम्र के आधार पर किसी को झूठी खबरों के लिए ज्यादा कमजोर कहना सही नहीं होगा.
रिसर्च में यह भी देखा गया कि हमारी राजनीतिक सोच किसी खबर को सच या झूठ मानने पर असर डाल सकती है.
आसान भाषा में कहें - अगर कोई खबर हमारी पहले से बनी सोच के मुताबिक होती है, तो हम उसे जल्दी सच मान सकते हैं. लेकिन अगर वही खबर हमारी सोच के खिलाफ हो, तो हम उस पर जल्दी शक कर सकते हैं.
इसे आसान शब्दों में ऐसे समझें. हम अक्सर वही बात जल्दी मान लेते हैं, जो हमें पहले से सही लगती है.
रिसर्च में अमेरिका की राजनीति के संदर्भ में भी ऐसा अंतर देखा गया. लेकिन इस नतीजे को सीधे भारत की राजनीति पर लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह रिसर्च अमेरिका के लोगों पर किया गया था.
जो लोग किसी बात को ध्यान से सोचकर और तर्क के साथ समझते हैं, वे आम तौर पर सही और गलत खबरों में बेहतर फर्क कर पाते हैं.
लेकिन कभी-कभी यही सोच हमारी पुरानी मान्यता को सही साबित करने में भी लग सकती है. यानी हम अपनी बात को सही साबित करने के लिए तर्क ढूंढने लगते हैं.
इसलिए सिर्फ ज्यादा सोचने की क्षमता होना काफी नहीं है. यह भी जरूरी है कि हम अपनी पसंद और अपनी सोच पर भी सवाल उठाएं.
रिसर्च में सबसे खास बात यह सामने आई कि जिस खबर को लोग पहले देख चुके थे, उसे सच मानने की संभावना ज्यादा थी.
इसे आसान उदाहरण से समझें. अगर आपको एक ही खबर बार-बार अलग-अलग जगह दिखाई देती है, तो कुछ समय बाद आपको लग सकता है कि “मैंने इसे पहले भी देखा है, इसलिए यह सही ही होगी.”
लेकिन किसी खबर को पहले देख लेना इस बात का सबूत नहीं है कि वह सच है.
हमारा दिमाग हर जानकारी की पूरी जांच नहीं करता. ऐसा करने में समय और मेहनत लगती है. इसलिए कई बार दिमाग आसान रास्ता अपनाता है.
जब कोई बात बार-बार सामने आती है, तो वह हमें जानी-पहचानी लगने लगती है. यही वजह है कि कभी-कभी झूठी बात भी सच जैसी लगने लगती है.

इसलिए किसी खबर को बार-बार देखने के बाद भी उसे सच मानने से पहले उसकी जांच करना जरूरी है.
डर, गुस्सा, खुशी, हैरानी या किसी बात को लेकर बहुत ज्यादा उत्सुकता हमारी सोच पर असर डाल सकती है. ऐसी खबरें हमारा ध्यान जल्दी खींचती हैं.
अगर कोई पोस्ट आपको बहुत ज्यादा गुस्सा दिला रही है या बहुत ज्यादा खुश कर रही है, तो उसे तुरंत आगे भेजने के बजाय थोड़ी देर रुकें.
खुद से पूछें, “मैं इसे सच इसलिए मान रहा हूं, क्योंकि यह सच है या इसलिए, क्योंकि इसने मेरी भावनाओं को छू लिया है?”
हर व्यक्ति की अपनी सोच और अपनी पसंद होती है. परेशानी तब होती है जब हम सिर्फ वही जानकारी देखते हैं, जो हमारी सोच को सही साबित करती है.
उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति किसी नेता या पार्टी को पसंद करता है, तो वह उसके पक्ष में आने वाली खबर को जल्दी सच मान सकता है. वहीं, उसके खिलाफ आने वाली खबर पर तुरंत शक कर सकता है.
इसलिए जरूरी है कि हम अपनी पसंद की खबर को भी उतनी ही सावधानी से जांचें, जितनी अपनी पसंद के खिलाफ आने वाली खबर को.
आज तकनीक की मदद से फोटो, वीडियो और आवाज में बदलाव करना आसान हो गया है. लेकिन हर नकली फोटो या वीडियो कंप्यूटर से बनाया गया हो, ऐसा जरूरी नहीं है.
कई बार पुरानी फोटो को किसी नई घटना से जोड़ दिया जाता है. पुरानी वीडियो को नए शब्दों के साथ चलाया जाता है. कभी फोटो को काट-छांटकर उसका मतलब बदल दिया जाता है.
इसलिए किसी फोटो या वीडियो को देखकर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए.
सोशल मीडिया पर कई लोग पूरी खबर पढ़ने के बजाय सिर्फ हेडलाइन देखकर ही फैसला कर लेते हैं. यह आदत गलत जानकारी फैलाने में मदद कर सकती है.
किसी खबर को पढ़ते समय देखें कि खबर किस जगह से आई है, कब प्रकाशित हुई है और उसमें जानकारी किसके आधार पर दी गई है.

सोशल मीडिया पर कुछ नकली खाते भी गलत जानकारी फैलाने का काम कर सकते हैं. किसी अनजान खाते की बात पर भरोसा करने से पहले उसकी जानकारी जरूर देखें.
देखें कि खाता कब बनाया गया है, उसमें किस तरह की पोस्ट हैं और क्या वह लगातार एक ही तरह की विवादित बातें फैला रहा है.
लेकिन केवल इन बातों के आधार पर किसी खाते को नकली नहीं कहा जा सकता. ये सिर्फ सावधान होने के संकेत हैं.
बुजुर्ग लोगों के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया को सही तरीके से समझना भी जरूरी है. उन्हें यह पता होना चाहिए कि किसी फोटो का असली स्रोत कैसे खोजें, किसी खबर की दूसरी जगह से पुष्टि कैसे करें और किसी वेबसाइट की जानकारी पर तुरंत भरोसा क्यों नहीं करना चाहिए.
अगर लोगों को ये आसान तरीके सिखाए जाएं, तो वे गलत जानकारी को पहचानने में बेहतर हो सकते हैं.
नहीं. अगर कोई खबर हमारी सोच के खिलाफ है, तो सिर्फ इस वजह से उसे झूठी खबर नहीं कहा जा सकता.
किसी खबर को गलत कहने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसमें कौन-से तथ्य दिए गए हैं, जानकारी कहां से आई है और क्या दूसरी भरोसेमंद जगहों पर भी इसकी पुष्टि होती है.
झूठी खबर पहचानने के लिए क्या देखें?
क्या यह खबर सही जगह से आई है?
क्या मैंने पूरी खबर पढ़ी है?
क्या दूसरी जगह भी यही जानकारी मिल रही है?
क्या फोटो या वीडियो सही है?
क्या हेडलाइन बहुत ज्यादा चौंकाने वाली है?
क्या खबर मेरी भावनाओं का फायदा उठा रही है?
क्या मैं इसे इसलिए सच मान रहा हूं क्योंकि इसे पहले भी देख चुका हूं?
क्या तुरंत खबर आगे भेजनी चाहिए?

अगर कोई खबर बहुत तेजी से फैल रही है, तो उसे तुरंत आगे भेजने की जरूरत नहीं है. खासकर बड़ी घटनाओं में शुरुआत में पूरी जानकारी सामने नहीं आई होती.
थोड़ा इंतजार करें. नई जानकारी आने दें. फिर देखें कि भरोसेमंद समाचार संस्थान भी वही बात बता रहे हैं या नहीं.
रुकें → पूरी खबर पढ़ें → स्रोत देखें → तारीख देखें → दूसरी जगह जांचें → फोटो या वीडियो का संदर्भ देखें → फिर आगे भेजें.
सबसे जरूरी बात यह है कि कोई भी व्यक्ति गलत जानकारी से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. न ज्यादा पढ़ाई इसकी गारंटी देती है, न ज्यादा उम्र और न ही खुद को बहुत समझदार मानना.
इसलिए अगली बार कोई खबर आपको बहुत ज्यादा गुस्सा दिलाए, आपकी सोच को सही साबित करे या बार-बार दिखाई दे, तो तुरंत उसे आगे भेजने के बजाय खुद से एक सवाल जरूर पूछें “क्या यह सच है, या मुझे सिर्फ सच लग रहा है?”