UPSC की 100 सालों की ऐतिहासिक यात्रा: ब्रिटिश राज से हुई शुरुआत, कैसा रहा ली कमीशन से लेकर AI के दौर तक का सफर?
UPSC Turns 100: भारत के इतिहास, शासन-व्यवस्था और प्रशासनिक मजबूती की कहानी संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के 100 साल के सफर से गहराई से जुड़ी हुई है. ब्रिटिश हुकूमत के दौर से शुरू हुए इस आयोग ने समय-समय पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाने वाले अधिकारियों को गढ़ने का काम किया है.
UPSC Turns 100: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का नाम सुनते ही अक्सर लोग आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं से जुड़ जाते हैं. जिस आयोग को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ और अधिकारियों के गढ़ के रूप में जाना जाता है, उसकी शुरुआत का सफर उतना आसान नहीं था. देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षाओं का आयोजन करने वाले यूपीएससी ने आज अपने 100 साल पूरे कर लिए हैं. ब्रिटिश काल में इसे छोटे से बोर्ड के तौर पर शुरू किया गया और अब 100 साल के बाद का सफर एआई समेत नई टेक्नोलॉजी को अपनाने वाला है.
'UPSC' नाम कब पड़ा?
साल 1950 में जब 26 जनवरी को भारत का संविधान लागू हुआ था तब संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) नाम रखा गया. संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत इसे संवैधानिक स्वायत्तता दी गई थी. इससे पहले पब्लिक सर्विस कमीशन के नाम से जाना जाता था. इन दोनों नाम के अलावा फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन (FPSC) से भी जाना जाता था. हालांकि, 1950 के बाद से इसे यूपीएससी के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है.
कब हुई थी यूपीएससी की स्थापना?
1 अक्टूबर 1926 को ब्रिटिश काल में पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना हुई थी, जिसके पहले अध्यक्ष सर रोस बार्कर बने थे. इस आयोग की स्थापना की सिफारिश साल 1924 में ली कमीशन ने की थी. लॉर्ड ली की अध्यक्षता में गठित रॉयल कमीशन ऑन द सिविल सर्विसेज इन इंडिया ने भारत में एक स्वतंत्र लोक सेवा आयोग बनाने का सुझाव दिया था, जिसके बाद ये ऐतिहासिक संस्था की स्थापना हुई थी.
कब हुआ था 'फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन' का गठन?
भारत सरकार अधिनियम 1935 के प्रावधानों के तहत 1 अप्रैल 1937 को आयोग का पुनर्गठन किया गया और इसका नाम बदलकर फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन (FPSC) रखा गया. स्वतंत्रता के बाद एच. के. कृपलानी आयोग के पहले भारतीय अध्यक्ष बने थे.
सरदार पटेल का यूपीएससी से क्या संबंध?
सरदार वल्लभभाई पटेल का संघ लोक सेवा आयोग और आधुनिक ऑल इंडिया सर्विसेज से गहरा ऐतिहासिक रिश्ता है. वो स्वतंत्र भारत में सिविल सेवाओं के संरक्षक और मुख्य वास्तुकार माने जाते हैं. आजादी के बाद भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सिविल सेवाओं को 'स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया' की संज्ञा दी थी. उनका मानना था कि विविधता से भरे भारत को एकजुट, अखंड और प्रशासनिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए एक निष्पक्ष और सक्षम अखिल भारतीय सेवा (IAS, IPS, IFS) का होना जरूरी है.
शुरुआत में पब्लिक सर्विस कमीशन कौन-सी परीक्षाएं कराता था?
1926 में स्थापना के समय पब्लिक सर्विस कमीशन के अधिकार काफी सीमित थे. उस दौरान आयोग मुख्य तौर पर इंडियन सिविल सर्विस (ICS) और इंडियन पुलिस (IP) जैसी उच्च प्रशासनिक सेवाओं के लिए चयन प्रक्रिया आयोजित करता था. इसके अलावा आयोग द्वारा भारतीय लेखा परीक्षा एवं लेखा सेवा (IA&AS) और सीमा शुल्क (Customs) जैसी केंद्रीय सेवाओं के लिए भी परीक्षाएं और इंटरव्यू का आयोजन किया जाता था.
लंदन करता था यूपीएससी की परीक्षा को लेकर फैसले
जानकारी के लिए बता दें परीक्षा के अंतिम सिलेबस, सीटों की संख्या और भर्ती से जुड़े खास फैसल भारत द्वारा नहीं बल्कि लंदन स्थित भारत सचिव की ओर से तिया जाता था. 1922 से पहले ICS की मुख्य परीक्षा सिर्फ लंदन में होती थी, लेकिन बाद इसे लंदन के अलावा भारत के इलाहाबाद (प्रयागराज) में भी आयोजित किया जाने लगा. इसके बाद 1926 में गठित आयोग ने इसकी जिम्मेदारी आगे संभाली.
UPSC 2026: AI और फ्यूचर विजन
यूपीएससी के 100 साल का सफर पूरा हो चुका है और इसे लेकर नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में दो दिवसीय मंथन सम्मेलन का आयोजन किया गया है. यूपीएससी के चेयरमैन अजय कुमार ने तीन मुख्य सिद्धांतों भरोसा, पारदर्शिता और टेक्नोलॉजी को लेकर जोर दिया है. आज के समय में आयोग का फोकस सिर्फ पारंपरिक प्रशासनिक विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि AI, डेटा सिक्योरिटी और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के दौर में एक 'फ्यूचर-रेडी' प्रशासनिक तंत्र तैयार करना भी है.
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