Success Story of Rajesh Sharma: 'बीस घटा अठारह... कितना हुआ?' दिल्ली के एक फ्लाईओवर के नीचे जब ये सवाल गूंजता है, तो दर्जन भर मासूमों की आवाजें एक साथ जवाब देती हैं. 'दो' मगर क्या आप कभी सोच सकते हैं कि कोई इंसान बिना किसी फायदे या फीस लिए मुफ्त में एक दो साल नहीं, बल्कि 20 सालों तक दूसरों के भविष्य पर न्योछावर कर सकता है? जानकर थोड़ा अजीब लग रहा होगा लेकिन ऐसा है.
दरअसल, उत्तर प्रदेश के एटा से आए राजेश शर्मा की कहानी कुछ ऐसी ही है जो कई साल से गरीब बच्चों के लिए 'मसीहा' बनकर खड़े हैं. आइए जानते हैं कि ऐसा क्या हुआ कि उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद भी किसी भी बच्चे से फीस न लेने का फैसला लिया?
यमुना बैंक के पास एक पुल के नीचे राजेश शर्मा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को पढ़ा रहे हैं. उनका ये सफर साल 2006 से एक पेड़ के नीचे सिर्फ दो बच्चों से शुरू हुआ था, लेकिन 20 सालों में ऐसा बदलाव हुआ कि उनकी क्लास में अब सैकड़ों बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई जारी रखने में राजेश मदद कर रहे हैं.
राजेश पढ़ाने से पहले खुद बीएससी के छात्र थे, लेकिन जब आर्थिक स्थिति अच्छी न हो, तो कई बार जिंदगी में कुछ ऐसे फैसले लेने पड़ जाते हैं, जो शायद भविष्य के लिए सही न हो. कुछ ऐसा ही राजेश के साथ हुआ उन्होंने आर्थिक तंगी के कारण अपनी बीएससी की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ दिया, लेकिन उनकी किस्मत में सैकड़ों बच्चों के लिए मसीहा बनना लिखा था. उन्होंने अपनी पढ़ाई आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण छोड़ी और आज वो कई सारे बच्चों की मदद कर रहे हैं, जो पढ़ाई के लिए पैसे नहीं दे सकते हैं.
2006 में राजेश शकरपुर में एक जनरल स्टोर चलाते थे और उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि वो कोई पाठशाला खोलेंगे. बस वो नियमित रूप से यमुना बैंक इलाके में जाया करते थे. वहां चल रहे निर्माण कार्य में वो जब गरीब परिवारों के कई बच्चों को काम करते देखते थे, तो अक्सर उनके मन में पढ़ाई को लेकर सवाल घूमता था. वहीं, एक दिन उन्होंने पूछ ही लिया कि तुम लोग स्कूल क्यों नहीं जाते हो, तब एक बच्चा उनके पास अपने पिता को लेकर आ गया. इसके बाद जब उन्हें ये ही सवाल बच्चे के पिता से पूछा, तो उनका जवाब रहा कि अगर उनके बच्चों को कोई पढ़ाने के लिए तैयार है, तो स्कूल भेज देंगे.
इसके बाद राजेश ने कहा कि वो बच्चों को पढ़ाएंगे लेकिन एक शर्त है कि वो कोई फीस नहीं लेंगे. इसके बाद उन्होंने एक गड्ढे की सफाई की और उस पर मिट्टी बिछवाई और वही एक सफेदे का पेड़ था, जिसके नीचे शुरुआत में दो बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. इसके बाद तीन सालों में करीब 140 बच्चे हो गए, जिनमें से 70 बच्चों का एडमिशन सरकारी स्कूल में कराया.
2009 में जब बाढ़ आई, तो पेड़ के नीचे चल रही क्लासरूम को छोड़, एक नई जगह ढूंढनी पड़ गई. फिर उन्हें एक फ्लाईओवर के नीचे जगह मिली. यहां पर बारिश, कड़ी धूप में भी बच्चे आराम से पढ़ पाते थे जिसके बाद ये ही राजेश की पाठशाला बन गई. राजेश के अनुसार किसी भी बच्चे के लिए आर्थिक तंगी पढ़ाई में बहुत आसानी से रुकावट डाल सकती है. यहां तक कि उन्हें खुद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में चल रही BSc की पढ़ाई को छोड़ना पड़ा था, क्योंकि उनके घर वाले आने-जाने का खर्च नहीं उठा सकते थे.
राजेश को यकीन नहीं होता कि उनकी ये मेहनत ऐसा रंग ले आएगी कि यहां से पढ़ने के बाद छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बन सकेंगे. बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने के लिए उनके इस स्कूल में और भी शिक्षक शामिल हुए जिन्होंने कोई सैलरी नहीं ली, बस अपना समय दिया. इस स्कूल में कोई नकद दान नहीं लिया जाता, यहां पर कॉपी-किताबें, बैग, यूनिफॉर्म और खानपान स्वीकार किया जाता है.
उनकी सफलता इस चीज से ही देखी जा सकती है कि जो बच्चे आर्थिक तंगी के कारण कभी पढ़ने का सोच नहीं सकते थे, बस उनके सपनों में ही पुलिस, डॉक्टर आदि बनना था, उसे राजेश शर्मा ने सच किया. उनके इस स्कूल से कई छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बने हैं और उन्हीं में से एक छात्रा अमृता भी हैं जिन्होंने करीब 16 साल पहले यहां से पढ़ाई की थी और वो BPSC परीक्षा में सफल होने के बाद बिहार के एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैं.