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Success Story: एक पेड़, दो बच्चे और पढ़ाने का जुनून… 20 साल में ऐसे बदली राजेश शर्मा की पाठशाला

Success Story of Rajesh Sharma: किसी ने कहा सोचा होगा कि पेड़ के नीचे एक-दो बच्चों के साथ शुरू हुआ स्कूल कई छात्रों की जिंदगी बदल देने वाला होगा. राजेश शर्मा की कहानी कुछ ऐसी ही है, जिन्होंने सैकड़ों बच्चों की जिंदगी बदली है और वो भी मुफ्त में.

Written BySimran Singh
Published: Oct 10, 2026, 08:58 AM IST|Updated: Oct 10, 2026, 01:35 PM IST
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Success Story: एक पेड़, दो बच्चे और पढ़ाने का जुनून… 20 साल में ऐसे बदली राजेश शर्मा की पाठशाला

About the Author

Simran Singh

Simran Singh

सिमरन सिंह को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है. उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई हिमालयन यूनिवर्सिटी से की है. साल 2016 में उन्होंने मीडिया जगत में कदम रखा. इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक से लेकर डिजिटल मीडिया से जुड़ी रहीं. पिछले 3 साल से News24 में थी और वहां बतौर फीचर लीड कई सेक्शन को संभाला. फिलहाल, Zee News में शिक्षा, रोजगार और करियर सेक्शन संभाल रही हैं.
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Success Story of Rajesh Sharma: 'बीस घटा अठारह... कितना हुआ?' दिल्ली के एक फ्लाईओवर के नीचे जब ये सवाल गूंजता है, तो दर्जन भर मासूमों की आवाजें एक साथ जवाब देती हैं. 'दो' मगर क्या आप कभी सोच सकते हैं कि कोई इंसान बिना किसी फायदे या फीस लिए मुफ्त में एक दो साल नहीं, बल्कि 20 सालों तक दूसरों के भविष्य पर न्योछावर कर सकता है? जानकर थोड़ा अजीब लग रहा होगा लेकिन ऐसा है. 

दरअसल, उत्तर प्रदेश के एटा से आए राजेश शर्मा की कहानी कुछ ऐसी ही है जो कई साल से गरीब बच्चों के लिए 'मसीहा' बनकर खड़े हैं. आइए जानते हैं कि ऐसा क्या हुआ कि उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद भी किसी भी बच्चे से फीस न लेने का फैसला लिया?

एक पुल बनी राजेश शर्मा की पाठशाला

यमुना बैंक के पास एक पुल के नीचे राजेश शर्मा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को पढ़ा रहे हैं. उनका ये सफर साल 2006 से एक पेड़ के नीचे सिर्फ दो बच्चों से शुरू हुआ था, लेकिन 20 सालों में ऐसा बदलाव हुआ कि उनकी क्लास में अब सैकड़ों बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई जारी रखने में राजेश मदद कर रहे हैं.

बीएससी पढ़ाई छोड़, सैकड़ों बच्चों के लिए बने मसीहा!

राजेश पढ़ाने से पहले खुद बीएससी के छात्र थे, लेकिन जब आर्थिक स्थिति अच्छी न हो, तो कई बार जिंदगी में कुछ ऐसे फैसले लेने पड़ जाते हैं, जो शायद भविष्य के लिए सही न हो. कुछ ऐसा ही राजेश के साथ हुआ उन्होंने आर्थिक तंगी के कारण अपनी बीएससी की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ दिया, लेकिन उनकी किस्मत में सैकड़ों बच्चों के लिए मसीहा बनना लिखा था. उन्होंने अपनी पढ़ाई आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण छोड़ी और आज वो कई सारे बच्चों की मदद कर रहे हैं, जो पढ़ाई के लिए पैसे नहीं दे सकते हैं.

स्कूल की योजना नहीं, चलाते थे जनरल स्टोर

2006 में राजेश शकरपुर में एक जनरल स्टोर चलाते थे और उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि वो कोई पाठशाला खोलेंगे. बस वो नियमित रूप से यमुना बैंक इलाके में जाया करते थे. वहां चल रहे निर्माण कार्य में वो जब गरीब परिवारों के कई बच्चों को काम करते देखते थे, तो अक्सर उनके मन में पढ़ाई को लेकर सवाल घूमता था. वहीं, एक दिन उन्होंने पूछ ही लिया कि तुम लोग स्कूल क्यों नहीं जाते हो, तब एक बच्चा उनके पास अपने पिता को लेकर आ गया. इसके बाद जब उन्हें ये ही सवाल बच्चे के पिता से पूछा, तो उनका जवाब रहा कि अगर उनके बच्चों को कोई पढ़ाने के लिए तैयार है, तो स्कूल भेज देंगे.

बिना फीस के राजेश पढ़ाने के लिए हुए तैयार 

इसके बाद राजेश ने कहा कि वो बच्चों को पढ़ाएंगे लेकिन एक शर्त है कि वो कोई फीस नहीं लेंगे. इसके बाद उन्होंने एक गड्ढे की सफाई की और उस पर मिट्टी बिछवाई और वही एक सफेदे का पेड़ था, जिसके नीचे शुरुआत में दो बच्चों को पढ़ाना शुरू किया. इसके बाद तीन सालों में करीब 140 बच्चे हो गए, जिनमें से 70 बच्चों का एडमिशन सरकारी स्कूल में कराया.

बाढ़ ने छीना ठीकाना, पुल बना सहारा

2009 में जब बाढ़ आई, तो पेड़ के नीचे चल रही क्लासरूम को छोड़, एक नई जगह ढूंढनी पड़ गई. फिर उन्हें एक फ्लाईओवर के नीचे जगह मिली. यहां पर बारिश, कड़ी धूप में भी बच्चे आराम से पढ़ पाते थे जिसके बाद ये ही राजेश की पाठशाला बन गई. राजेश के अनुसार किसी भी बच्चे के लिए आर्थिक तंगी पढ़ाई में बहुत आसानी से रुकावट डाल सकती है. यहां तक कि उन्हें खुद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में चल रही BSc की पढ़ाई को छोड़ना पड़ा था, क्योंकि उनके घर वाले आने-जाने का खर्च नहीं उठा सकते थे.

20 साल में खड़ा किया स्कूल

राजेश को यकीन नहीं होता कि उनकी ये मेहनत ऐसा रंग ले आएगी कि यहां से पढ़ने के बाद छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बन सकेंगे. बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने के लिए उनके इस स्कूल में और भी शिक्षक शामिल हुए जिन्होंने कोई सैलरी नहीं ली, बस अपना समय दिया. इस स्कूल में कोई नकद दान नहीं लिया जाता, यहां पर कॉपी-किताबें, बैग, यूनिफॉर्म और खानपान स्वीकार किया जाता है. 

यहां से पढ़कर BPSC क्रैक कर छात्रा बनी शिक्षिका

उनकी सफलता इस चीज से ही देखी जा सकती है कि जो बच्चे आर्थिक तंगी के कारण कभी पढ़ने का सोच नहीं सकते थे, बस उनके सपनों में ही पुलिस, डॉक्टर आदि बनना था, उसे राजेश शर्मा ने सच किया. उनके इस स्कूल से कई छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बने हैं और उन्हीं में से एक छात्रा अमृता भी हैं जिन्होंने करीब 16 साल पहले यहां से पढ़ाई की थी और वो BPSC परीक्षा में सफल होने के बाद बिहार के एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका हैं. 

ये भी पढ़ें- Success Story: 12वीं में 3 नंबर, फेल होकर छोड़ी पढ़ाई... डांसर से DSP बनने वाले बृजेश परमार की सफलता की कहानी

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