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सुबह स्कूल जाते बच्चों की कतार में सबसे पहले जो चीज नजर आती है, वह अक्सर उनकी एक जैसी यूनिफॉर्म होती है. कहीं सफेद शर्ट के साथ नीली पैंट है तो कहीं हरे, ग्रे, पीले या भूरे रंग की ड्रेस दिखाई देती है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर स्कूलों में यूनिफॉर्म के लिए कुछ खास रंग ही बार-बार क्यों चुने जाते हैं? क्या सरकार पूरे देश में स्कूल ड्रेस का रंग तय करती है या स्कूल खुद इसका फैसला लेते हैं?
दरअसल, भारत में सभी स्कूलों के लिए एक ही यूनिफॉर्म रंग निर्धारित करने वाला कोई सामान्य केंद्रीय नियम नहीं है. स्कूल की यूनिफॉर्म का डिजाइन और रंग स्कूल की पहचान, प्रबंधन के फैसले, राज्य या स्थानीय नियमों और व्यावहारिक जरूरतों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है. CBSE की Affiliation Bye-Laws में स्कूल मैनेजमेंट और प्रशासन की जिम्मेदारियां निर्धारित हैं, लेकिन सभी संबद्ध स्कूलों के लिए एक ही रंग की यूनिफॉर्म तय नहीं की गई है.
किसी स्कूल की यूनिफॉर्म का रंग तय करने में सामान्य तौर पर स्कूल प्रबंधन, प्रधानाचार्य और संबंधित स्कूल मैनेजमेंट सिस्टम की भूमिका होती है. CBSE से संबद्ध स्कूलों में School Management Committee (SMC) का प्रावधान है. CBSE के अनुसार SMC स्कूल के संचालन, प्रबंधन और विभिन्न प्रशासनिक मामलों में भूमिका निभाती है, जबकि राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के संबंधित शिक्षा कानून भी लागू होते हैं.
इसका मतलब यह है कि किसी स्कूल ने नीला-सफेद, हरा-सफेद या कोई दूसरा संयोजन चुना है तो इसका कारण जरूरी नहीं कि कोई केंद्रीय सरकारी आदेश हो. कई बार स्कूल अपनी अलग पहचान बनाने, पुराने ड्रेस पैटर्न को जारी रखने या छात्रों के लिए व्यावहारिक और आसानी से उपलब्ध कपड़े चुनने के आधार पर यूनिफॉर्म तय करता है.
नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन 2023 में स्कूल यूनिफॉर्म को केवल कपड़ों का सेट नहीं माना गया है. दस्तावेज के अनुसार यूनिफॉर्म का रंग और पहनावा स्कूल के मूल्यों और उसकी पहचान को समाज के सामने व्यक्त कर सकता है.
एनसीएफ 2023 यह भी कहता है कि यूनिफॉर्म तय करते समय स्थानीय जलवायु, सुरक्षा, आसानी से उपलब्धता और लागत जैसे पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए. यानी रंग का चुनाव केवल सुंदर दिखने के लिए नहीं, बल्कि उस इलाके और स्कूल की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर होना चाहिए.
नीला रंग भारतीय स्कूल यूनिफॉर्म में सबसे ज्यादा दिखाई देने वाले रंगों में से एक है. इसके पीछे एक कारण इसका व्यावहारिक और औपचारिक रूप माना जाना है. गहरे नीले या नेवी ब्लू रंग पर रोजमर्रा की धूल और छोटे दाग सफेद कपड़े की तुलना में कम दिखाई दे सकते हैं. इसके अलावा यह रंग स्कूल की यूनिफॉर्म को एक औपचारिक और एकरूप रूप देता है.
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि सरकार ने नीले रंग को इसलिए अनिवार्य किया है क्योंकि इसका कोई आधिकारिक मनोवैज्ञानिक लाभ तय किया गया है. रंगों के मनोविज्ञान से जुड़े दावे अलग-अलग संदर्भों में किए जाते हैं, लेकिन स्कूल यूनिफॉर्म का रंग तय करने के लिए भारत में कोई एक केंद्रीय वैज्ञानिक रंग-कोड लागू नहीं है. इसलिए नीले रंग को लेकर किए जाने वाले मनोवैज्ञानिक दावों को तथ्य और धारणा के बीच अंतर रखते हुए देखना चाहिए.
सफेद रंग साफ-सफाई, सादगी और औपचारिकता से जुड़ा दिखाई देता है. यही वजह है कि कई स्कूलों में शर्ट, ब्लाउज या अन्य यूनिफॉर्म हिस्सों में सफेद रंग इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि सफेद कपड़े पर धूल और दाग आसानी से दिखाई देते हैं, इसलिए कई स्कूल इसे गहरे रंग की पैंट, स्कर्ट या ट्राउजर के साथ जोड़ते हैं.
व्यावहारिक रूप से भी सफेद और नीला जैसे सामान्य रंग बाजार में आसानी से उपलब्ध होते हैं. इससे अभिभावकों के लिए यूनिफॉर्म खरीदना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है. NCF 2023 का लागत और उपलब्धता पर जोर इसी तरह के व्यावहारिक पहलुओं को महत्वपूर्ण बनाता है.
हरे, पीले, मैरून, ग्रे और दूसरे रंग भी स्कूलों में इस्तेमाल होते हैं. इसका कोई एक राष्ट्रीय रंग-कोड नहीं है. कई स्कूल अपने लोगो, प्रतीक, स्थानीय पहचान या संस्थान की ब्रांडिंग से मेल खाते रंग चुनते हैं. उदाहरण के लिए, किसी स्कूल का हाउस सिस्टम या स्कूल का प्रतीक किसी खास रंग से जुड़ा हो तो यूनिफॉर्म में भी वही रंग इस्तेमाल किया जा सकता है.
इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि हर रंग का पूरे देश में एक निश्चित सरकारी अर्थ है. रंग का चुनाव स्कूल की अपनी पहचान और स्थानीय जरूरतों से भी जुड़ा हो सकता है.
नहीं, CBSE सभी संबद्ध स्कूलों के लिए एक जैसा यूनिफॉर्म कलर निर्धारित नहीं करता. CBSE Affiliation Bye-Laws में स्कूल मैनेजमेंट, प्रधानाचार्य, सुरक्षा, प्रशासन और शिक्षा से संबंधित कई जिम्मेदारियां निर्धारित हैं. लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर CBSE स्कूल को नीली पैंट और सफेद शर्ट ही पहनानी होगी.
यही कारण है कि अलग-अलग CBSE स्कूलों में यूनिफॉर्म का रंग और डिजाइन अलग दिखाई देता है. स्कूल अपनी पहचान और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ड्रेस पैटर्न निर्धारित कर सकते हैं, बशर्ते वे लागू राज्य/स्थानीय कानून और संबद्धता से जुड़े नियमों का पालन करें.
राज्य सरकार या शिक्षा विभाग कुछ परिस्थितियों में सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए यूनिफॉर्म संबंधी निर्देश जारी कर सकता है. इसका हालिया उदाहरण हिमाचल प्रदेश का 2026 का निर्देश है. राज्य के शिक्षा निदेशालय ने CBSE से संबद्ध सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों के संदर्भ में स्पष्ट किया कि छात्रों की यूनिफॉर्म उस समय तक वही रहेगी जो संबंधित स्कूल में पहले से अपनाई गई थी; साथ ही भविष्य के सत्र के लिए विशेषज्ञ एजेंसी के परामर्श से इसे अंतिम रूप देने की बात कही गई.
पश्चिम बंगाल में भी 2026 में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की नीला-सफेद यूनिफॉर्म को लेकर समीक्षा की खबर सामने आई. इससे यह स्पष्ट होता है कि यूनिफॉर्म का रंग राज्य स्तर की शिक्षा नीति और प्रशासनिक फैसलों से भी प्रभावित हो सकता है.
स्कूल यूनिफॉर्म के रंग का सीधे तौर पर संविधान में कोई निर्धारित रंग नहीं है. यानी संविधान यह नहीं कहता कि स्कूल की ड्रेस नीली, सफेद, हरी या किसी अन्य रंग की होनी चाहिए. इसका संवैधानिक महत्व मुख्य रूप से समानता, गैर-भेदभाव और शिक्षा के अधिकार जैसे व्यापक सिद्धांतों से जुड़ता है.
Right to Education Act, 2009 बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार देता है. कानून में सरकार और स्थानीय प्राधिकरणों की जिम्मेदारियां भी निर्धारित हैं. RTE से जुड़े सरकारी दिशानिर्देशों में कमजोर और वंचित समूहों के बच्चों के साथ भेदभाव न करने और ऐसा वातावरण बनाने पर जोर दिया गया है जिसमें बच्चा शिक्षा पूरी कर सके.
यूनिफॉर्म का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों के बीच दृश्य समानता पैदा करना हो सकता है. जब सभी बच्चे एक जैसे कपड़े पहनते हैं तो महंगे और सस्ते फैशन कपड़ों के बीच अंतर कम दिखाई दे सकता है. इससे स्कूल में एक साझा पहचान की भावना बन सकती है.
लेकिन केवल यूनिफॉर्म होने से आर्थिक असमानता खत्म नहीं हो जाती. यूनिफॉर्म की कीमत, जूते, बैग, किताबें और अन्य आवश्यक वस्तुओं का खर्च परिवारों पर अलग-अलग प्रभाव डाल सकता है. इसलिए यूनिफॉर्म नीति बनाते समय केवल रंग और डिजाइन नहीं, बल्कि उसकी affordability यानी वह परिवारों के लिए कितनी सुलभ है, यह भी महत्वपूर्ण है.
सरकारी स्कूलों में यूनिफॉर्म का मुद्दा केवल ड्रेस कोड तक सीमित नहीं है. शिक्षा मंत्रालय के Samagra Shiksha से जुड़े दस्तावेजों में RTE entitlements के तहत यूनिफॉर्म और पाठ्यपुस्तकों जैसी सुविधाओं का प्रावधान दर्ज है. सरकारी योजनाओं में समय पर यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है.
इसका उद्देश्य यह है कि आर्थिक कारणों से कोई बच्चा स्कूल की आवश्यक सुविधाओं से वंचित न रहे. इसलिए यूनिफॉर्म का रंग तय करते समय उसकी उपलब्धता और लागत का पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाता है.
कुल मिलाकर किसी स्कूल की यूनिफॉर्म का रंग तय करना केवल फैशन या पसंद का फैसला नहीं होना चाहिए. स्कूल की पहचान, स्थानीय मौसम, सुरक्षा, कपड़े की उपलब्धता, कीमत, रखरखाव और छात्रों की सुविधा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना अधिक तार्किक तरीका है. NCF 2023 भी इन्हीं व्यावहारिक और संस्थागत पहलुओं को महत्व देता है.
इसलिए अगली बार जब किसी स्कूल के बच्चों को नीली पैंट-सफेद शर्ट, हरी यूनिफॉर्म या पीले रंग की ड्रेस में देखें, तो समझिए कि उस रंग के पीछे केवल एक पसंद नहीं, बल्कि स्कूल की पहचान, प्रशासनिक निर्णय और स्थानीय जरूरतों का मिश्रण हो सकता है. सबसे अहम बात यह है कि भारत में स्कूल यूनिफॉर्म के लिए कोई एक राष्ट्रीय रंग तय नहीं है और CBSE भी सभी स्कूलों के लिए एक ही रंग अनिवार्य नहीं करता.