असल में इजरायली अखबार हेरात्ज ने सरकार के सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इजरायल की नेतन्याहू सरकार सऊदी अरब की मदद करना चाहती है. इजरायली सरकार की इच्छा है कि वो यमन के हूती गुट के खिलाफ सऊदी अरब के सैन्य अभियान में मददगार बने. इजरायली पीएम नेतन्याहू मध्यस्थों के जरिए सऊदी अरब की सरकार से बातचीत करना चाहते हैं, लेकिन सऊदी अरब के शासक मोहम्मद बिन सलमान इजरायल की मदद को स्वीकार नहीं करना चाहते.
इस रिपोर्ट से दो सवाल खड़े होते हैं. पहला सवाल ये है कि हूती गुट के लगातार हमलों के बीच अगर मदद का ऑफर आया है तो सऊदी अरब उसे क्यों नहीं कबूल कर रहा है, दूसरा और अहम सवाल ये है कि आखिर इजरायल एक और जंग में उतरने के लिए उत्सुक क्यों है. अब हम आपके सामने, एक-एक करके इन दोनों सवालों का जवाब डिकोड करने जा रहे हैं.
सऊदी अरब के शासक मोहम्मद बिन सलमान लगातार फिलिस्तीन के मुद्दे पर इजरायल का विरोध करते रहे हैं. इसी वजह से वो इजरायली मदद को कबूलने में हिचकिचा रहे हैं. इसके साथ ही साथ इजरायल से मदद लेना मुस्लिम जगत में सऊदी अरब की इमेज पर भी दाग लगा सकता है. मान लीजिए अगर मोहम्मद बिन सलमान ने इजरायल से मदद ले भी ली, तो ये संदेश जाएगा कि सऊदी अरब अपने बलबूते हूती गुट की चुनौती से निपटने में नाकाम साबित है.
सऊदी अरब की विदेश नीति और मजहबी मजबूरियों के चलते, मोहम्मद बिन सलमान ने इजरायली ऑफर पर आगे बढ़ने से इंकार कर दिया है. लेकिन जो इजरायल पिछले तीन साल में गाजा, लेबनान और ईरान में लड़ चुका है. आखिर वो इजरायल युद्ध का चौथा फ्रंट क्यों खोलना चाहता है. इजरायल के जंगी ऑफर को समझने के लिए आपको नेतन्याहू के महत्वकांक्षी प्लान को गौर से देखना होगा.
गाजा युद्ध के दौरान इजरायल ने ईरान के दो प्रॉक्सी गुटों यानी हमास और हिज्बुल्ला को बड़ा नुकसान पहुंचा दिया है. हमास के 300 कमांडर्स समेत कुल 24 हजार सदस्य मारे जा चुके हैं. इसी तरह हिज्बुल्ला की पूरी टॉप लीडरशिप समेत तकरीबन 14 हजार लड़ाके खत्म किए जा चुके हैं. यानी इजरायल ने अपनी सीमाओं के नजदीक स्थित, ईरान समर्थित गुटों को तकरीबन पूरी तरह पंगु कर दिया है. अब इजरायल को सिर्फ हूती गुट से खतरा है. इसी वजह से सऊदी अरब के नाम पर इजरायल हूती गुट को निशाना बनाना चाहता है. जिससे ईरान का कोई ऐसा प्यादा नहीं बचे जो इजरायली धरती के लिए सीधा खतरा साबित हो सके .
अगर आप फ्लैशबैक में जाएंगे तो आपको याद आएगा कि गाजा युद्ध के दौरान हूती गुट की वजह से इजरायल को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था. हूती गुट ने इजरायल पर 360 से ज्यादा मिसाइल और ड्रोन अटैक किए थे. हालांकि हूती गुट की मिसाइलों को इजरायल ने नष्ट कर दिया था, लेकिन इजरायल के समुद्री व्यापार के लिए हूती गुट बड़ा खतरा बन गया था. हूती गुट की घेराबंदी के चलते इजरायली जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी. इसी वजह से हमास और हिज्बुल्ला के बाद अब हूती गुट भी इजरायल के निशाने पर है.
अर्थशास्त्र में आचार्य चाणक्य ने राजमंडल नीति का वर्णन किया है. इस नीति में कहा गया है - एक राजा को अपने अरि यानी शत्रु को समाप्त करने के लिए पहले शत्रु के ऐसे सहयोगी का विनाश करना चाहिए जो छद्म हो, यानी जो सीधे तौर पर शत्रु की सीमाओं के नजदीक स्थित ना हो. इजरायल का शत्रु है ईरान और ईरान का छद्म साथी है हूती गुट.
सऊदी अरब को ऑफर से क्या दिक्कत ? इजरायल क्यों जंग में उतरना चाहता है?
— Zee News (@ZeeNews) October 13, 2026
चाणक्य के सिद्धांत में जो बताया गया है, नेतन्याहू उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं . पिछले महीने 27 तारीख को नेतन्याहू अरब देश UAE गए थे. अब वो सऊदी अरब की तरफ हाथ बढ़ाकर हूती गुट पर प्रहार की कोशिश कर रहे हैं. इजरायल का प्लान बताता है कि उसका मकसद अरब जगत में ईरान को पूरी तरह अलग-थलग या यूं कहें कि अकेला करना है. यहां आपको जानना चाहिए कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब इजरायल ने सऊदी अरब की तरफ सहयोग के कदम बढ़ाए हैं.
60 के दशक में जब यमन में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था, उस दौर में भी इजरायल ने सऊदी अरब की मदद की थी. सऊदी अरब समर्थित गुट के लिए इजरायल ने हथियार और सैन्य संसाधन भेजे थे. वर्ष 2015 में जब हूती गुट ने सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर हमले शुरु किए थे, तब भी इजरायल ने सऊदी अरब को आयरन डोम डिफेंस सिस्टम देने की पेशकश की थी. अब इजरायल ने हूती नाम के खतरे को पूरी तरह मिटाने में मदद का ऑफर दिया है.
इसी इतिहास की वजह से ईरान भी चौकन्ना है. ईरान को पता है अगर हूती गुट कमजोर हुआ, तो ना सिर्फ उसका एक सहयोगी खत्म होगा बल्कि होर्मुज के बाहर तेल की आवाजाही पर ईरान की पकड़ कमजोर हो जाएगी. ये तेल का व्यापार ही है जिसकी वजह से अब तक ईरान युद्ध में डटा हुआ है. जिस तरह इजरायल की तरफ से हूती गुट को खत्म करने की कोशिश की जा रही है, ठीक उसी तर्ज पर ईरान भी लगातार हूती गुट को मजबूत करने के प्रयास कर रहा है.
फरवरी 2026 से ईरान युद्ध में उलझा हुआ है, इसके बावजूद हूती गुट को मदद भेजने का सिलसिला कम नहीं हुआ है . 10 से 20 जुलाई के बीच ईरान की इलीट सैन्य टुकड़ी IRGC के सैकड़ों अधिकारी यमन पहुंच गए थे. हाल ही में हूती और सऊदी समर्थित गुट के बीच जो टकराव हुए हैं, उनमें IRGC के अधिकारियों ने ही कमान संभाली है. होर्मुज के रास्ते ईरान से जहाज लगातार यमन पहुंच रहे हैं. इन जहाजों के जरिए हथियारों के साथ ही साथ सोना भी भेजा गया है.
ईरान को पता है कि हूती गुट के पास ब्लैक मार्केट में तेल और सोना बेचने के सिवा, आय का कोई साधन नहीं बचा है. इसी वजह से अपने ऊपर पड़ रहे आर्थिक दबाव के बाद भी, ईरान लगातार हूती गुट को सोने की सप्लाई कर रहा है.
इजरायल ये समझ चुका है कि ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य अभियान शुरु करने में अमेरिका हिचकिचा रहा है. अगर सऊदी अरब ने सहमति जताई तो ना सिर्फ हूती गुट को नुकसान पहुंचाया जा सकेगा बल्कि इजरायल पर संभावित हमलों की सूरत में, अमेरिका को दोबारा जंग में उतरने के लिए मजबूर भी किया जा सकेगा. हूती गुट अब ताकत के इस तराजू की धुरी बन चुका है. अगर हूती गुट कमजोर हुआ तो तराजू इजरायल की तरफ झुकेगा, अगर हूती गुट का वजूद बरकरार रहा तो मिडिल ईस्ट में ईरान का मजबूत सहयोगी खड़ा रहेगा.