What is Doda Government Medical College Burqa Controversy? डोडा के सरकारी मेडिकल कॉलेज में बुर्के को लेकर आंदोलन हो रहा है. पढ़ाई की जगह धार्मिक पहनावे की लड़ाई ने ले ली है. MBBS और नर्सिंग की छात्राएं पढ़ाई छोड़कर आंदोलन कर रही हैं. ये आंदोलन मेडिकल कॉलेज में सुविधाओं में सुधार या मेडिकल की पढ़ाई के लिए नई तकनीक के लिए नहीं है. ये कथित आंदोलन प्रोटोकॉल की जगह धार्मिक पहनावे की मनमानी जिद को पूरा करने के लिए है. सबसे पहले ये समझिए कि ये विवाद शुरू कैसे हुआ.
असल में अस्पताल के स्त्री रोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मधु चिब ने 30 सितंबर को लेबर रूम में बुर्का पहनकर आई मेडिकल छात्राओं और इंटर्न्स को बाहर जाने के लिए कहा. उन्होंने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि चिकित्सा शास्त्र के अनुशासन और मरीजों की सुरक्षा के लिए प्रोटोकॉल तय होता है. चूंकि अबाया पहनकर छात्राओं ने प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया था. इसलिए उन्हें बाहर जाने के लिए कहा गया.
इस पर मेडिकल की पढ़ाई कर रही मुस्लिम छात्राएं भड़क गईं और उन्होंने मेडिकल कॉलेज में आंदोलन शुरू कर दिया. नियम के पालन के आदेश को धर्म विरोध से जोड़ दिया गया. आंदोलन में मुस्लिम छात्राओं ने अस्पताल परिसर में नारा ए तकबीर जैसे नारे लगाए. उनके समर्थन में दूसरे मुस्लिम छात्र भी एकजुट हो गए.
इस दौरान छात्राओं ने भड़काऊ बातें भी की. एक ने कहा कि मैं मेडिकल की ऐसी पढ़ाई को लात मारती हूं, जिसमें मुझे दीन पर चलने की इजाजत न हो. एक अन्य छात्रा ने कहा कि मेरे लिए इस्लाम पहले है और पढ़ाई बाद में. हम दीन से कोई समझौता नहीं कर सकते.
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— Zee News (@ZeeNews) October 2, 2026
ये नारेबाजी किसी धर्मस्थल, किसी धार्मिक जलसे या किसी धार्मिक संस्थान में नहीं हो रही थी. साथ ही, भड़काऊ नारे लगाने वाले कोई मदरसे के छात्र नहीं थे, जो कह रहे हों कि वे अपनी मजहबी पहचान दर्शाने वाली ड्रेस ही पहनेंगे. वे सब मेडिकल की छात्राएं थीं.
अफसोस की बात ये थी कि वे देश की उन 3 प्रतिशत सौभाग्यशाली युवाओं में शामिल थीं, जिन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS की सीट मिली है. डॉक्टर की पढ़ाई करने वाले हर स्टूडेंट्स की पढ़ाई पर सरकार औसतन 2 करोड़ रुपए खर्च करती है. ये पैसा कोई धार्मिक संस्थान नहीं देता बल्कि हमारी जेब से जाता है.
लेकिन डोडा के सरकारी मेडिकल कॉलेज में धर्मांधता के समंदर में डूबी लड़कियों को शायद इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. उन्हें इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि सरकारी मेडिकल कॉलेज में एक सीट के लिए 35 विद्यार्थी परीक्षा देते हैं और वे उनमें से 34 प्रतियोगियों को पीछे छोड़कर मेडिकल कॉलेज में पहुंची हैं.
अफसोस यही है कि वे लड़कियां डॉक्टर तो बनने जा रही हैं लेकिन अपने मजहबी कट्टरपंथ को छोड़ नहीं पा रही हैं. कॉलेज प्रशासन ने मामले की जांच के लिए 8 सदस्यीय कमेटी बनाई है, जिसमें स्टूडेंट्स भी शामिल हैं. लेकिन प्रदर्शनकारी छात्राओं को इससे कोई मतलब नहीं है. उन्हें कमेटी की जांच रिपोर्ट नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेज में बुर्का और अबाया पहनने की आजादी चाहिए.