'पंद्रह मिनट किताब पढ़ो, पाओ इनाम', ग्लोबल हब कहे जाने वाले सिंगापुर को क्यों उठाना पड़ा है ये कदम? जिसकी हो रही चर्चा
Singapore Book Reading Campaign: ग्लोबल हब कहे जाने वाले सिंगापुर में रोजाना पंद्रह मिनट किताब पढ़ने पर इनाम देने का एलान किया गया है. सवाल है कि आखिर सिंगापुर सरकार को ऐसा कदम उठाने पर क्यों मजबूर होना पड़ा है.
What is Singapore Book Reading Campaign? सिंगापुर की सरकार अपने लोगों के लिए एक आकर्षक ऑफर लेकर आई है. इस ऑफर में लोगों को किताब पढ़ने के पैसे दिये जाएंगे. इसे आप 'किताब पढ़ो, इनाम जीतो' अभियान भी कह सकते हैं. देश के नेशनल लाइब्रेरी बोर्ड ने नेशनल रीडिंग मिशन की शुरुआत की है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य अपने नागरिकों को किताबों की तरफ वापस लाना है.
15 मिनट किताब पढ़ो, मिलेंगे पैसे
सिंगापुर सरकार ने इसके लिए क्राउड-टास्क नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किया है. अगर कोई नागरिक इस प्लेटफॉर्म के जरिए रोज कम से कम 15 मिनट किताब पढ़ता है तो सरकार उसे वित्तीय प्रोत्साहन देती है. इसके लिए उन्हें 20 वर्चुअल कॉइन्स मिलते हैं, जिन्हें बाद में कैश या वाउचर्स में बदला जा सकता है. सोचिए, सिंगापुर जैसी विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश को ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ा.
एक सर्वे के मुताबिक, सिंगापुर में एक सामान्य नागरिक रोजाना औसतन 7 घंटे 23 मिनट इंटरनेट पर बिताता है. इसमें से लगभग ढाई घंटे तक का समय सिर्फ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बिना वजह स्क्रॉल करने में बर्बाद होता है. आपको जानना चाहिए कि सिंगापुर में इंटरनेट की पहुंच करीब 98 प्रतिशत तक है.
सिंगापुर सरकार ने शुरू किया अनोखा रीडिंग मिशन
जब किसी देश की पूरी आबादी दिन का एक बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर ही बिताने लगे तो एकाग्रता और सोचने समझने की क्षमता पर बहुत बुरा असर पड़ता है. यही कारण है कि सिंगापुर सरकार को यह अनोखा नेशनल रीडिंग मिशन शुरू करना पड़ा है.
जानते हैं, रोज़ अपनी ज़िंदगी का कितना वक्त लोग सिर्फ फोन की स्क्रीन पर उंगलियां घिसने में गंवा देते हैं? दुनिया भर में इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल इस्तेमाल के आंकड़े उपलब्ध कराने वाली रिसर्च संस्था डेटा रिपोर्टल और GWI के अनुसार, दुनिया भर में एक औसत इंटरनेट यूजर रोज करीब ढाई घंटे सिर्फ सोशल मीडिया पर उंगलियां घिसने यानि डूम-स्क्रॉलिंग में बर्बाद कर देता है.
भारत में रोजाना 6 घंटे स्क्रीन पर बिताते लोग
अगर दुनिया के बाकी देशों पर नजर डालें तो, ब्राजील और फिलीपींस में लोग रोजाना 8 से 9 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं. इसमें से करीब साढ़े तीन घंटे से ज्यादा समय सिर्फ सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने में निकलता है. अमेरिका में एक दिन का स्क्रीन टाइम 7 घंटे का है, जबकि जापान में लोग सबसे कम यानी करीब 4 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं. वहीं भारत में एक औसत यूजर रोज लगभग साढ़े छह घंटे स्क्रीन पर बिताता है और अपने कुल स्क्रीन टाइम का 44 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ सोशल मीडिया ऐप्स पर खर्च करता है.
इसलिए युवाओं को स्क्रीन से दूर कर किताबों से जोड़ने के लिए दुनिया के कई विकसित देशों ने बेहद दिलचस्प नीतियां बनाई हैं. फ्रांस, इटली और स्पेन जैसे देश 18 साल के युवाओं को 'कल्चर वाउचर' या डिजिटल कार्ड देते हैं, जिसका इस्तेमाल युवा किताबें खरीदने के लिए करते हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि वहां युवाओं में किताबें पढ़ने का रुझान तेज़ी से बढ़ा है.
पढ़ने की संस्कृति बचाने की कोशिश
वहीं दूसरी तरफ ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने सीधे पैसे देने के बजाय मुफ्त किताबों का रास्ता चुना है. ब्रिटेन में बच्चों को मुफ्त पुस्तकें बांटी जाती हैं, जबकि दक्षिण कोरिया में मेट्रो स्टेशनों पर 'SMART BOOK-SHELF' लगाए गए हैं, जहां से लोग दिन-रात किसी भी समय मुफ्त में किताबें ले सकते हैं.
डिजिटल युग में पढ़ने की छूटती आदत को बचाने के लिए भारत सरकार ने भी कई बड़े कदम उठाए हैं. शिक्षा मंत्रालय का 'राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय' 23 भाषाओं में 5500 से अधिक मुफ़्त किताबें दे रहा है. IIT खड़कपुर की 'नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी' पर करोड़ों ई-बुक्स मुफ़्त उपलब्ध हैं. इसके अलावा, हर साल 19 जून से महीने भर चलने वाला 'राष्ट्रीय पठन दिवस', नए लेखकों के लिए 'पीएम युवा योजना' की स्कॉलरशिप और बच्चों के लिए 'पढ़े भारत' का 100 दिनों का अभियान यह साबित करता है कि देश में पढ़ने की संस्कृति को फिर से जीवित करने की हर संभव कोशिश की जा रही है.
पठन-पाठन के मामले में पहले नंबर पर
'एनओपी वर्ल्ड कल्चर स्कोर इंडेक्स' के अनुसार, हफ्ते में सबसे ज्यादा पढ़ने के मामले में भारत पूरी दुनिया में पहले नंबर पर है. हमारे देश में लोग हफ्ते में औसतन करीब 11 घंटे पढ़ने में बिताते हैं. चाहे वो किताबें हों, अखबार हों या दफ्तर-पढ़ाई से जुड़ा काम. इस मामले में थाईलैंड, चीन, फ्रांस और अमेरिका जैसे विकसित देश भी भारत से बहुत पीछे हैं, जबकि दक्षिण कोरिया में तो लोग हफ्ते में सिर्फ 3 घंटे ही पढ़ पाते हैं.
लेकिन इस आंकड़े पर खुश होने के साथ-साथ आपको आज के दौर का एक कड़वा सच भी समझना होगा. साल 2010 में स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट आने से पहले लोग औसतन एक घंटे तक सुकून से किताबें या अखबार पढ़ते थे. इसे विज्ञान की भाषा में 'डीप रीडिंग' यानी गहन अध्ययन कहते हैं. जिससे इंसान की सोचने-समझने की शक्ति और एकाग्रता बढ़ती है. लेकिन आज रील्स और शॉर्ट वीडियो के इस दौर में हमारी पढ़ाई की आदत खत्म होती जा रही है.
ऊपर-ऊपर से पढ़कर निकल रहे लोग
अब लोग गहरी पढ़ाई करने के बजाय पन्नों पर सिर्फ ऊपर-ऊपर से नजर दौड़ाते हैं, जिसे 'स्किमिंग' कहा जाता है. रिसर्च बताती है कि सिर्फ सुकून और ज्ञान के लिए किताबें पढ़ने की हमारी आदत में करीब 40 परसेंट की भारी गिरावट आई है, जबकि हमारा एक-तिहाई दिन सिर्फ स्क्रीन पर उंगलियां दौड़ाने में ही निकल जाता है.
चाहे सिंगापुर का कैश रिवॉर्ड मॉडल हो, यूरोप का कल्चर वाउचर हो या भारत का राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय, सबका मकसद एक ही है. तकनीक और स्मार्टफोन हमारी सुविधा के लिए हैं, लेकिन जब रील्स और स्क्रॉलिंग हमारे दिमाग को थकाने लगे, तो किताब का एक पन्ना पलटना ही सबसे बड़ा डिजिटल डिटॉक्स बन जाता है. अब सोचना आपको है कि आप दिन भर में कितना समय अपनी स्क्रीन को दे रहे हैं और कितना समय किताबों को.