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Why Medicines Unavailable in Government Hospitals? DNA में हम लगातार उन मुद्दों को उठाते हैं, जिनका सीधा सरोकार आपसे होता है. आपको याद होगा, हमने प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस, यूनिफॉर्म, किताबों के नाम पर होने वाली लूट और मेडिकल उपकरणों में मुनाफाखोरी को लेकर बड़ा खुलासा किया था. हमारी इन खबरों का गहरा असर भी हुआ. इसी कड़ी में आज हम एक ऐसे विषय का विश्लेषण करने जा रहे हैं, जो देश के करोड़ों आम लोगों के स्वास्थ्य और जेब से जुड़ा है.
देश के आम और गरीब नागरिकों के लिए देश में 2 लाख से ज्यादा हेल्थ सेंटर्स हैं. इनमें जिला अस्पताल से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक हैं. यहां मुफ्त इलाज और मुफ्त दवाएं मिलती हैं. लेकिन आप में से बहुत से लोगों ने शायद अब सरकारी अस्पतालों का रुख करना ही छोड़ दिया है. इसका एक बड़ा कारण भीड़ और डॉक्टरों की गैरमौजूदगी है.
इसके अलावा एक और बड़ी वजह है और वो है सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी. डॉक्टर पर्चे पर जो दवा लिखते हैं, वो अस्पताल की फार्मेसी यानी दवाखाने में मिलती ही नहीं है. जिन दवाओं पर मरीज़ों का मुफ्त अधिकार है, उन्हें अस्पताल के बाहर बने प्राइवेट केमिस्ट की दुकान से लेना पड़ रहा है. आज हम इसी मजबूरी और इसके पीछे के खेल का DNA टेस्ट करने वाले हैं.
हमारे इस विश्लेषण में आपको पता चलेगा कि सरकारी अस्पतालों के दवाखानों की असली स्थिति क्या है? आपको देखना चाहिए कि जिन दवाओं के लिए सरकार करोड़ों रुपये का बजट पास करती है, वो दवाएं गायब कैसे हो जाती हैं. कैसे ये सिस्टम आम आदमी को इलाज के नाम पर कंगाल कर रहा है.
केंद्र सरकार की फ्री ड्रग सर्विस इनिशिएटिव के तहत देश के हर सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में मरीज़ों को जरूरी दवाएं बिल्कुल मुफ्त मिलनी चाहिए. इसके लिए बाकायदा एक पूरा सिस्टम तय किया गया है. नियमों के मुताबिक, एक उप-स्वास्थ्य केंद्र में 113 जरूरी दवाएं होनी चाहिए.
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी PHC में 179, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ((CHC)) में 301, Sub-District Hospital में 318 दवाएं और बड़े जिला अस्पताल ((District Hospital)) में कम से कम 381 जरूरी दवाओं का स्टॉक हर वक्त मौजूद रहना चाहिए.
यही नहीं, इस योजना में राज्यों को यह पूरी आजादी भी दी गई है कि वो स्थानीय बीमारियों और जरूरतों के हिसाब से इस लिस्ट में और भी दवाएं जोड़ सकते हैं. कागजों पर ये योजना कितनी बेहतरीन लग रही है. लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकारी अस्पताल के डॉक्टर द्वारा लिखी गई पर्ची लेकर उसी अस्पताल के दवाखाने पर पहुंचता है तो सच्चाई कितनी चुभने वाली होती है. ये आप किसी भी सरकारी अस्पताल में जाकर देख सकते हैं.
जब बड़े अस्पतालों की स्थिति ये है तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और छोटे हेल्थ सेंटर्स का क्या हाल होगा. आपमें से ज्यादातर लोग समझ रहे होंगे और सरकार भी इसे समझ रही है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की 2025 में 17वीं कॉमन रिव्यू मिशन में 17 राज्यों की समीक्षा हुई. रिपोर्ट में कई जगह दवाओं की उपलब्धता और सप्लाई में अंतर दर्ज किया गया.ओडिशा के कालाहांडी जिला अस्पताल में जरूरी दवाओं की लिस्ट में शामिल 381 दवाओं में से 75 दवाएं आउट ऑफ स्टॉक मिलीं. यानी करीब हर पांचवीं दवा उपलब्ध नहीं थी.
नागालैंड के सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता का अगर औसत निकाला जाए तो मात्र 80 दवाएं ही मिलीं. आप समझ रहे हैं. 381 दवाएं होनी चाहिए. लेकिन इनमें से सिर्फ 80 दवाएं ही थीं. बाकी दवाएं कहां गईं? सिक्किम में 381 में से 124 दवाएं उपलब्ध नहीं थीं. यानी मरीजों को नहीं मिल रही थीं.
प्राइवेट में दवा Full..सरकारी अस्पताल में क्यों 'गुल'? सरकारी अस्पतालों में दवाओं की तलाश का विश्लेषण
— Zee News (@ZeeNews) September 21, 2026
अब एक दूसरा सरकारी आंकड़ा आपको बताते हैं. नेशनल हेल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर की स्टडी में छत्तीसगढ़, हरियाणा और तमिलनाडु की सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को जांचा गया. कुल मिलाकर जरूरी दवाओं की उपलब्धता करीब 60 प्रतिशत ही मिली. सोचिए, 40 प्रतिशत जरूरी दवाएं सरकारी दवाखाने से गायब थीं.
2024 में जारी CAG की रिपोर्ट भी बताती है कि बिहार के सरकारी अस्पतालों की OPD में साल 2018 के दौरान, 21 से 65 प्रतिशत जरूरी दवाएं उपलब्ध नहीं थीं. महाराष्ट्र के भी बड़े सरकारी अस्पतालों में 42 प्रतिशत जरूरी दवाओं की कमी थी. राजस्थान में भी 43 प्रतिशत दवाओं की कमी पाई गई.
अब यहां सबसे बड़ा सवाल ये है कि सरकारी अस्पताल में दवा क्यों नहीं मिल रही है. क्या ये सिर्फ दवा की कमी है या दवा के अस्पताल तक पहुंचने वाले पूरे सिस्टम में ही गड़बड़ी है.
इन ऑडिट रिपोर्ट्स को ध्यान से समझेंगे तो एक बात बार-बार सामने आती है. दवा की कमी अचानक नहीं होती. इसके पीछे Supply Chain की कई कमजोर कड़ियां होती हैं. CAG और 17वीं कॉमन रिव्यू मिशन की रिपोर्ट ये बताती है कि इसके पीछे पांच प्रमुख कारण हैं.
पहला कारण है मांग के हिसाब से समय पर दवा की खरीद नहीं होना. दूसरी वजह है वेंडर्स की शॉर्ट सप्लाई, जैसे ओडिशा में सिर्फ 47 प्रतिशत दवा ही सप्लाई की गई.तीसरा कारण बफर स्टॉक मैनेजमेंट की कमजोरी, यानी ऑर्डर देने में ही अस्पताल प्रशासन की ओर से देरी की गई.
चौथी वजह है, क्वालिटी टेस्टिंग में देरी, जिसकी वजह से गोदाम में पहुंची दवा भी समय पर अस्पताल तक नहीं पहुंच पाई. और पांचवीं वजह है इन्वेंट्री ट्रैकिंग में कमी. यानी दवाओं के स्टॉक का सही से हिसाब न रखना.
हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में ऐसी चीज भी सामने आई. जो एक और वजह की ओर इशारा कर रही है. कई जगहों पर तो दवा इसलिए नहीं मिली क्योंकि दवाखाने में स्टॉक नहीं था. लेकिन उन्हीं दवाखानों के बाहर लोगों के हाथ में एक ऐसी पर्ची भी थी जिसपर ऐसी दवा का नाम लिखा था. जो सरकारी दवाखानों में मिलती ही नहीं हैं. ये पैटर्न एक नहीं बल्कि कई अस्पतालों में दिखा.
मरीजों से पूछने पर पता चला कि ये पर्ची भी सरकारी डॉक्टर ने ही लिखी थी. कई मरीजों ने तो यहां तक बताया कि डॉक्टर साहब सीधे कहते हैं कि बाहर की दुकान से दवा ले लेना. ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी अस्पतालों में सादी पर्ची वाला ये खेल कैसे चल रहा है.
मरीज पहले ही अस्पताल के पर्चे पर लिखी दवा न मिलने से परेशान थे. ऊपर से सफेद पर्चे पर महंगी दवाएं लिख दी गईं. गरीब से गरीब व्यक्ति भी ये दवाएं मजबूरी में खरीद ही लेता है. लेकिन यहां सवाल यही है कि जब सरकार ने अस्पतालों में मुफ्त दवाओं का इंतजाम किया है तो ये बोझ मरीज पर क्यों आ रहा है. इस सवाल का जवाब जानने से पहले आपको देखना चाहिए कि आम आदमी पर सालाना दवाओं के खर्च का कितना बोझ आ रहा है.
साल 2022-23 के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं पर मरीज की जेब से 3 लाख 83 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए. ये खर्च सरकारी योजनाओं और हेल्थ इंश्योरेंस के अलावा था. अगर हेल्थ इंश्योरेंस का खर्च जोड़ देंगे तो ये आंकड़ा सोचिए कहां चला जाएगा.
इस 3 लाख 83 हजार करोड़ में से 1 लाख 61 हजार करोड़ रुपये सिर्फ दवाओं पर खर्च किए गए. यानी इलाज पर कुल खर्च का एक तिहाई से ज्यादा सिर्फ दवाओं पर खर्च हो जाता है. अगर सरकारी अस्पतालों में जरूरी दवाएं मिलने लगें. सोचिए लोगों के कितने पैसे बचेंगे.
इसी आंकड़े में एक बेहद चिंताजनक बात छिपी है. द लैंसेट रीजनल हेल्थ स्टडी के मुताबिक, लंबे वक्त तक रहने वाले बुखार पर भारत को हर साल करीब 12 हजार 300 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हो रहा है.
इस तरह के बुखार की दवाएं आमतौर पर सरकारी अस्पतालों में मिल जाती हैं लेकिन स्टडी में पाया गया है कि इसके इलाज का 91 फीसदी बोझ सीधे मरीजों और उनके परिवारों को उठाना पड़ रहा है.
इसी स्टडी में ये भी पाया गया है कि हर साल 70 हजार से ज्यादा परिवार अपनी आय का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सिर्फ इलाज पर खर्च कर रहे हैं.
मुफ्त दवाओं की सरकारी योजना धरातल पर क्यों नहीं उतर पा रही है, इसे समझने के लिए आपको दिल्ली के सरकारी अस्पतालों को लेकर CAG की एक रिपोर्ट देखनी चाहिए. रिपोर्ट बताती है कि 2016 से 2022 के बीच 34 से 47 प्रतिशत दवाएं मरीज को खुद खरीदनी पड़ीं.
ये वो दवाएं थीं जो दिल्ली सरकार की आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल थीं. ये आंकड़े बता रहे हैं कि मुफ्त दवाओं की जो स्कीम सरकार चला रही है. उसका फायदा आम आदमी तक पूरी तरह पहुंच ही नहीं पा रहा है. आंकड़े बता रहे हैं कि दवाओं पर जो खर्च हो रहा है. वो पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को बिगाड़ रहा है.
ये आंकड़े सिर्फ कागजी नहीं हैं, बल्कि हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में ये साक्षात दिख भी रहे हैं. आपको जानना चाहिए कि जो दवाएं लोगों को मुफ्त मिलनी चाहिए थीं. उसके लिए उन्हें कितने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं.
जरा सोचिए, एक दिहाड़ी मजदूर जो दिन में मुश्किल से 500 से 700 रुपये कमाता है. वो दवा पर 1000 रुपये खर्च करेगा तो उसके घर में चूल्हा कैसे जलेगा. हमारे देश में हर साल ऐसे हजारों मरीज मिलते हैं, जिनका इलाज होते-होते उनके पूरे परिवार का आर्थिक स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ जाता है.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि जब भी तुम दुविधा में हो, उस सबसे गरीब और बेबस आदमी का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो और खुद से पूछो कि तुम जो कदम उठाने जा रहे हो, क्या उससे उस आदमी को कोई फायदा होगा?
महात्मा गांधी का ये कथन आज हमारी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बेहद प्रासंगिक है. आज दवाओं का बोझ एक आम भारतीय पर काफी ज्यादा भारी पड़ रहा है. ऐसे में आज नीति निर्माताओं को ये देखना चाहिए कि दुनिया के वो कौन से देश हैं जिनका मॉडल भारत में फॉलो किया जाना चाहिए.
दवाओं पर सबसे कम खर्च अमेरिकी नागरिकों को झेलना पड़ता है. एक औसतन अमेरिकी अपनी जेब से केवल 11 प्रतिशत दवा पर खर्च करते हैं. इसके अलावा स्वीडन में 13 प्रतिशत, यूनाइटेड किंगडम में 15 प्रतिशत और फ्रांस में यह 10 प्रतिशत से भी कम है. इन देशों में इंश्योरेंस कंपनियां और सरकार दवाओं का पूरा खर्च उठाती हैं.
भारत में स्वास्थ्य सेवा संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य सूची का विषय है. इसलिए राज्यों की जिम्मेदारी है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को जरूरी दवाएं समय पर और मुफ्त उपलब्ध कराई जाएं. लेकिन जब सिस्टम की कमी की वजह से वही मरीज अस्पताल से निकलकर मेडिकल स्टोर पहुंचता है और अपनी जेब से सैकड़ों या हजारों रुपये की दवा खरीदता है. तो ये सिर्फ एक मरीज की मजबूरी नहीं रह जाती...ये उस पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी का सवाल बन जाता है.
चाहे नीति बनाने वाले हों, अस्पताल चलाने वाले हों या सफेद पर्ची पर दवा लिखने वाले डॉक्टर. हर किसी को खुद से पूछना चाहिए कि जो दवा सरकार को मरीज तक मुफ्त पहुंचानी थी. उसके लिए अगर वही गरीब आदमी अपनी बाकी जरूरतों को छोड़कर हजारों रुपये खर्च कर रहा है तो इस व्यवस्था की कीमत आखिर कौन चुका रहा है? उस दवा की कीमत सिर्फ उस मरीज को नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार को भुगतनी पड़ती है.