भारत के पास, तो PAK से कितना दूर ईरान? मोदी-पेजेश्कियान मुलाकात की एक तस्वीर ने दुनिया को क्या संदेश दिया
Iran on BRICS Summit 2026: ब्रिक्स समिट में ईरान, भारत के नजदीक तो पाकिस्तान से दूर जाता नजर आया. पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान की एक मुलाकात ने दुनिया को बड़ा संदेश दिया, जिससे विश्व परिदृश्य बदलता नजर आ रहा है.
Modi-Pezeshkian Meeting News: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने के बाद पीएम मोदी की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से मुलाकात हुई. इस मुलाकात के बाद पीएम मोदी उनका हाथ पकड़े बाहर आते दिखाई दिए. उनकी यह तस्वीर एक तरह से पिक्चर ऑफ दे डे बन गई.
इस तस्वीर में आपको ब्रिक्स के चार बड़े नेता नजर आए. पहले थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दूसरे थे रूस के राष्ट्रपति पुतिन, तीसरे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा और चौथे ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान. गौर से देखने पर इस तस्वीर में आपको पीएम मोदी मजबूती के साथ पेजेशकियान का हाथ थामे नजर आए. मानों पीएम ये संदेश दे रहे हों कि सिर्फ ब्रिक्स ही नहीं बल्कि भारत से भी ईरान को समर्थन हासिल है.
भारत-ईरान में किन मुद्दों पर बात हुई?
इस दमदार तस्वीर के सामने आने के कुछ ही मिनट बाद भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी शुरु हुई. तकरीबन 30 मिनट चली इस मुलाकात में पीएम मोदी और मसूद पेजेशकियान समेत उनके प्रतिनिधि आमने-सामने बैठे थे. अब हम आपको बताने जा रहे हैं कि ईरान के साथ भारत की इस द्विपक्षीय वार्ता से क्या कुछ निकलकर सामने आया.
भारत की तरफ से जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया, वो है ऊर्जा सुरक्षा यानी होर्मुज के जरिए तेल की सप्लाई. दूसरी तरफ ईरान की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रहा अमेरिका की ओर से लगाए गए प्रतिबंध और ईरान की सुरक्षा. युद्ध की वजह से होर्मुज की घेराबंदी ने तेल की सप्लाई रुकी. नतीजा हुआ कि भारत को तेल और LPG पर खर्च बढ़ाना पड़ा. अमेरिका ने भी ईरान से तेल की सप्लाई रोक दी है. जिसका असर पहले से कमजोर हो चुकी ईरानी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. इसी दिक्कत का जिक्र ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने ब्रिक्स के मंच से भी किया है.
दिल्ली की ब्रिक्स समिट से पहले दोनों नेता 31 अगस्त को किर्गिस्तान के बिश्केक में भी मिले थे . SCO सम्मेलन के दौरान हुई इस मुलाकात में भारत ने क्षेत्रीय और आर्थिक स्थिरता को महत्वपूर्ण बताया था. जबकि ईरान ने भारत से युद्ध खत्म कराने में योगदान की अपील की थी.
होर्मुज खोलने की जरूरत पर भारत ने दिया जोर
दिल्ली में भी पीएम मोदी और मसूद पेजेश्कियान की बातचीत इन्हीं मुद्दों के इर्द गिर्द हुई. दोनों ही पक्षों ने बिश्केक में हुए संवाद को आगे बढ़ाया. भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को जरूरी बताया, जिसे ईरानी पक्ष ने सुना और समझा. उम्मीद जताई जा रही है कि ये सहमति भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को सुरक्षित रखने में मदद करेगी.
भारत के लिहाज से युद्ध खत्म होना और होर्मुज का खुलना दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण है. ईरान-अमेरिका के युद्ध का हिस्सा ना होने के बावजूद भारत ने इस युद्ध की कीमत चुकाई है. ये कीमत तेल के बढ़ते दामों के शक्ल में चुकाई गई है.
पारंपरिक तौर पर भारत के कच्चे तेल की 70 प्रतिशत और LPG की 90 प्रतिशत सप्लाई मिडिल ईस्ट से होती रही है. युद्ध की वजह से हुई होर्मुज की घेराबंदी ने इस सप्लाई को बुरी तरह बाधित किया है. एक अनुमान के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ने की वजह से भारत को तकरीबन 2 लाख 15 हजार करोड़ का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा है. सरल शब्दों में ये रकम वो नुकसान है जो ईरान-अमेरिका के युद्ध की वजह से भारत को भरना पड़ा है.
बदला-बदला नजर आया ईरान का रुख
इसी वजह से भारत ने ब्रिक्स के परचम तले हुई मीटिंग में भी ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा उठाया है. ईरान ने इन चिंताओं को स्वीकार तो किया है, लेकिन क्या ईरान वाकई ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कोई कदम उठा पाएगा. इसको लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता. जब तक ईरान और अमेरिका के बीच पूरी तरह शांति स्थापित नहीं होगी. तब तक होर्मुज से तेल की आवाजाही पर संशय के बादल मंडराते रहेंगे.
ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की बैठक और वर्तमान बैठक के बीच ईरान के रुख में एक बदलाव साफ नजर आया है. ईरान ने अमेरिका के प्रति आक्रामक बयानों की जगह ब्रिक्स के सहयोग को ज्यादा महत्वपूर्ण करार दिया है. अगर भारत की बात करें तो ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह का काम तेजी से आगे नहीं बढ़ पाया था. कभी अमेरिकी प्रतिबंध तो कभी निवेश से जुड़े मतभेद को लेकर दोनों देशों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए थे, लेकिन ब्रिक्स के मंच से ईरान ने भारत को नए व्यापारिक विकल्पों का ऑफर दिया है. जो बताता है कि भारत के साथ ईरान अपने संबंधों को आगे ले जाना चाहता है.
भारत के पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक बार कहा था - यदि हम युद्ध का अंत नहीं करेंगे तो युद्ध हमारा अंत कर देगा. इसी सिद्धांत को ईरान ने समझ लिया है. अमेरिका और इजरायल से जंग के दौरान ईरान ने ये तक कह दिया था कि अमेरिकी और इजरायली कार्रवाई पर भारत की चुप्पी सवालिया निशान खड़ा करती है, लेकिन अब ब्रिक्स के मंच पर आकर ईरान को महसूस हो गया है कि भारत ने संवाद और सहयोग का जो सिद्धांत हमेशा दिया है. वही शांति और स्थिरता ला सकता है.
पाकिस्तान फिर पहुंचा ईरान के पैरों में
प्रधानमंत्री मोदी और ईरान के राष्ट्रपति की हाथ थामे जो तस्वीर शुक्रवार को सामने आई, वह यकीनन शनिवार को दुनिया भर के अखबारों की हेडलाइन होगी, जब ब्रिक्स का अधिकारिक आरंभ होगा . तब सभी ये उम्मीद करेंगे कि ब्रिक्स गठबंधन सहयोग की ऐसी मिसाल कायम करेगा जो दुनिया में ग्लोबल साउथ की इज्जत और अहमियत दोनों को आगे बढ़ाएगी.
ब्रिक्स में ईरान और भारत की मीटिंग की चर्चा चारों तरफ हो रही है. इस चर्चा में एक और नाम शामिल है. ये नाम है पाकिस्तान. वही पाकिस्तान जिसने ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने का दावा किया था.
आपको याद होगा, युद्ध में मध्यस्थता का भरोसा देकर पाकिस्तान का फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ईरान गया था. मुनीर के भरोसे ईरान का प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए पाकिस्तान भी आया था. इसके बावजूद स्थायी सीजफायर नहीं हो पाया था. जिसके बाद ईरान की मीडिया में मुनीर को अमेरिका की कठपुतली तक करार दे दिया गया था. इस अपमान के बावजूद पाकिस्तान दोबारा ईरान का दरवाजा खटखटा रहा है.
सऊदी अरब पर हमला न करवाने की अपील
पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने दोबारा ईरान से बात की है, लेकिन इस बार मुद्दा अमेरिका से युद्धविराम नहीं है. इस बार पाकिस्तानी उस देश के लिए तेहरान से अपील कर रहे हैं, जहां से उनका दाना पानी आता है. ये देश है सऊदी अरब. सऊदी अरब पर हूती गुट के लगातार हमलों के बाद पाकिस्तानी प्रतिनिधियों ने तेहरान से दखल देकर शांति स्थापित करने की अपील की है.
इसे विदेश नीति का मखौल उड़ाना नहीं तो और क्या कहेंगे. पाकिस्तान ने ईरान का युद्धविराम का दावा किया था. अब खुद ईरान से दूसरे देश के युद्धविराम के लिए गुहार लगाई जा रही है. पाकिस्तानियों की इसी फितरत को अब ईरान समझ गया है. इसी का नतीजा है कि कल तक मुनीर और शहबाज का सलाम कबूल करने वाले पेजेशकियान शुक्रवार को मजबूती के साथ प्रधानमंत्री मोदी का हाथ पकड़कर आगे बढ़ते नजर आए.
ना सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी और मसूद पेजेशकियान हाथ पकड़कर साथ चलते रहे बल्कि ईरान के राष्ट्रपति का दिल्ली में स्वागत भी हुआ. दिल्ली में योग और उद्योग जगत से जुड़ी कुछ हस्तियां मसूद पेजेशकियान से मिलीं और भारतीय अंदाज में शॉल ओढ़ाकर उनका स्वागत भी किया. इस स्वागत ने पेजेशकियान को भी भारतीय संस्कृति के अतिथि देवो भव के भाव से परिचित करा दिया होगा.