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ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कितना 'कंट्रोल' होगा? समझिए ट्रंप के इस नए दांव का अगला शिकार कौन?

इतिहास की किताबों में हम जिस साम्राज्यवादी दौर को पढ़कर पीछे छोड़ आए थे, जहां ताकतवर मुल्क कमजोरों की संप्रभुता छीन लेते थे, ट्रंप ने 2026 में बिना जंग लड़े वही खेल दोबारा खेल दिया है. ट्रंप ने पूरा का पूरा ग्रीनलैंड अमेरिकी कब्जे में ले लिया. यह कैसे हुआ और क्यों हुआ? आइए जानते हैं..

ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कितना 'कंट्रोल' होगा? समझिए ट्रंप के इस नए दांव का अगला शिकार कौन?
Image Credit: Donald Trump

विश्व इतिहास में 15वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी के कालखंड को औपनिवेशिक युग कहा जाता है. यानी ऐसा समय जब कोई शक्तिशाली देश... किसी कमजोर देश पर अपना राजनीतिक, आर्थिक नियंत्रण स्थापित कर लेता था, 21वीं सदी में दुनिया उपनिवेशवाद से ऊपर उठ गई, लेकिन अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से, एक बार फिर उपनिवेशवाद लौट आया है. फर्क सिर्फ इतना है, कि इस उपनिवेशवाद में लड़ाई नहीं हुई, बम-बंदूक नहीं चले, खून नहीं बहा. बाहुबल दिखाकर एक समझौता किया गया और पूरा का पूरा ग्रीनलैंड अमेरिकी कब्जे में चला गया. अब सवाल है, ट्रंप के उपनिवेशवाद का शिकार और कितने देश होंगे? अमेरिका और कितने देशों पर कब्जा करने वाला है? यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ट्रंप हाल ही में कई देशों को अमेरिका में मिलाने की या कब्जा करने की धमकी दे चुके हैं.

याद कीजिए... 24 जनवरी 2026 का दिन. आज से करीब 9 महीने पहले की बात है, जब ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर शेयर की थी. तस्वीर में ट्रंप पेंगुइन के साथ बर्फीले पर्वत की तरफ बढ़ते नजर आए थे. मेरी बाईं तरफ चल रहे वीडियो में आप देख रहे हैं पेंगुइन के हाथ में अमेरिका का झंडा है, जबकि पहाड़ पर ग्रीनलैंड का झंडा लगा हुआ है. यह यूरोपीय देशों को ट्रंप का संदेश था. मित्रो, इस पोस्ट के 238 दिन बाद ग्रीनलैंड पर ट्रंप का कब्जा हो गया है. ट्रंप ने रक्तहीन तरीके से ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया. इसकी पुष्टि खुद डोनाल्ड ट्रंप ने ही की.

डोनाल्ड ट्रंप ने आज सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की. 327 शब्दों की इस पोस्ट में उन्होंने कहा अमेरिका का डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक समझौता हुआ है. इस समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सुरक्षा और अन्य दूसरी जरूरतों का स्थायी नियंत्रण मिल गया है. ट्रंप ने अपनी पोस्ट में जो कुछ लिखा है उसे थोड़ा विस्तार से समझते हैं.

  • समझौते के तहत बेसिंग यानी बेस बनाने, एक्सेस यानी सेना की तैनाती का अधिकार मिल गया है.
  • अमेरिका ग्रीनलैंड की सुरक्षा करेगा. यानी ग्रीनलैंड की जमीन पर अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी रहेगी.
  • किसी भी दूसरे देश को ग्रीनलैंड पर बेस बनाने के लिए अमेरिका से लिखित मंजूरी लेनी होगी. यानी चीन और रूस जैसे देश अब ग्रीनलैंड पर बेस नहीं बना पाएंगे.
  • ग्रीनलैंड में निवेश के लिए स्क्रीनिंग मैकेनिज्म का प्रावधान किया गया है. कोई भी नया निवेश अमेरिका की सहमति से ही होगा. यानी चीन और रूस जैसे देश अब ग्रीनलैंड में इन्वेस्टमेंट नहीं कर पाएंगे.

ग्रीनलैंड बना अमेरिका का '51वां राज्य'!

समझौते में कहा गया है कि ग्रीनलैंड की आबादी अपना राजनीतिक भविष्य चुन सकती है. ग्रीनलैंड का कोई भी इलाका अमेरिका को ट्रांसफर नहीं किया जाएगा. समझौते के मुताबिक ग्रीनलैंड की संप्रभुता बनी रहेगी. अब सोचिए, जो देश अपनी स्वतंत्र सोच के मुताबिक रक्षा समझौता नहीं कर सकता, निवेश पर फैसला नहीं कर सकता, अपनी विदेश नीति तय नहीं कर सकता, तो क्या उसे स्वतंत्र कहा जा सकता है? नहीं, उसकी संप्रभुता सिर्फ दिखावे के लिए ही है. इसलिए हम कह रहे हैं कि ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अपना उपनिवेश और अमेरिका का 51वां राज्य बना लिया है.

अमेरिकी विचारक नोआम चॉम्स्की का विचार है कि  "आधुनिक दौर में विस्तारवाद ने नए रूप ले लिए हैं, लेकिन इसका मूल मकसद आज भी वही है दूसरे देशों की संप्रभुता को नष्ट कर उनके संसाधनों पर कब्जा करना."

2019 से ही ग्रीनलैंड को हथियाना चाहते थे ट्रंप

ग्रीनलैंड के संसाधनों पर ट्रंप की नजर है. इसलिए ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते थे. पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने 2019 में ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर कब्जा करने की इच्छा जताई थी. मौजूदा कार्यकाल में ट्रंप लगातार ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात कहते रहे हैं. इसे लेकर ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच विवाद भी हुआ. आखिरकार ट्रंप अपने विस्तारवाद को जमीन पर उतारने में कामयाब रहे. ग्रीनलैंड के किन प्राकृतिक संसाधनों पर ट्रंप की लालची नजर है, वह हम बताएंगे, लेकिन पहले आपको बताते हैं कि ग्रीनलैंड में अभी शासन की व्यवस्था क्या थी.

ग्रीनलैंड अब तक आधिकारिक रूप से डेनमार्क से जुड़ा था. वर्ष 2009 के 'सेल्फ-गवर्नमेंट एक्ट' के तहत ग्रीनलैंड को आंतरिक नीति, अर्थव्यवस्था और संसाधनों का प्रबंधन करने का अधिकार था. ग्रीनलैंड की विदेश नीति और रक्षा मामलों की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास थी.

166 साल पुरानी हसरत: अमेरिका के लिए क्यों जरूरी है ग्रीनलैंड का नक्शा?

अब नए समझौते के बाद ग्रीनलैंड का भविष्य पूरी तरह अमेरिका के हाथ में है. विदेश नीति और रक्षा नीति ही नहीं, निवेश और दूसरे फैसले भी अब ट्रंप करेंगे. ग्रीनलैंड में अमेरिका की दिलचस्पी की कहानी पुरानी है. 1860 यानी आज से 166 साल पहले पहली बार अमेरिका ने ग्रीनलैंड को खरीदने की पहल की थी.

आखिर ग्रीनलैंड में अमेरिका की इतनी दिलचस्पी क्यों है?

ग्रीनलैंड बेशक डेनमार्क के जरिए यूरोप से जुड़ा हो... लेकिन यह भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका के पास है. इसलिए ट्रंप से पहले भी अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष साम-दाम-दंड-भेद के जरिए ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश करते रहे. लेकिन इस कोशिश में अमेरिका की तरफ से कामयाबी ट्रंप को मिली है. ग्रीनलैंड ट्रंप और अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

रेयर अर्थ से लेकर तेल तक: ग्रीनलैंड में दबा है बेशकीमती प्राकृतिक खजाना

  1. ट्रंप जो कुछ भी करते हैं उसके केंद्र में आर्थिक फायदा होता है, तो ग्रीनलैंड पर कब्जे के पीछे भी यही प्रमुख कारण है.
  2. अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण और वैश्विक बाजार के आंकड़ों के अनुसार ग्रीनलैंड में लगभग 15 लाख मीट्रिक टन दुर्लभ पृथ्वी तत्व यानी रेयर अर्थ मटीरियल का विशाल भंडार है.
  3. मौजूदा दौर में वैश्विक रेयर अर्थ सप्लाई चेन पर चीन का एकाधिकार है. रेयर अर्थ इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन ऊर्जा टरबाइन और उन्नत सैन्य हथियारों के लिए अनिवार्य हैं.
  4. ग्रीनलैंड पर कब्जे के साथ ही ट्रंप को रेयर अर्थ का यह बड़ा खजाना मिल गया है. अब रेयर अर्थ के मामले में अमेरिका की चीन पर निर्भरता कम होगी.
  5. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुमान के मुताबिक अकेले उत्तर-पूर्वी ग्रीनलैंड में 31 अरब बैरल तेल और प्राकृतिक गैस का भंडार है. यह खजाना भी अब अमेरिका के कब्जे में होगा.
  6. ग्रीनलैंड में यूरेनियम, लोहा, जस्ता, निकल और कोबाल्ट जैसी बेशकीमती धातुएं प्रचुर मात्रा में हैं. इस पर भी अमेरिका का प्रभुत्व होगा.
  7. जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ पिघल रही है, जिससे नए समुद्री व्यापार मार्ग खुल रहे हैं. इन रास्तों के जरिए एशिया और यूरोप के बीच की दूरी पारंपरिक मार्गों की तुलना में लगभग 50% तक कम हो जाती है.  
  8. ग्रीनलैंड अटलांटिक महासागर और आर्कटिक महासागर के बीच मुख्य द्वार पर है. ग्रीनलैंड पर कब्जा कर ट्रंप ने भविष्य के व्यापारिक रास्तों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है.
  9. अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस ग्रीनलैंड के पास है. यह बेस हमले की सूरत में अमेरिका को शुरुआती चेतावनी देता है, साथ ही अंतरिक्ष निगरानी भी करता है. रूस-चीन या अन्य किसी देश की तरफ से दागी जाने वाली किसी भी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल को ट्रैक करने के लिए ग्रीनलैंड एक अचूक 'शील्ड' का काम करेगा.

अलास्का की तर्ज पर खुद को चमकाने की चाहत

ट्रंप वेनेजुएला में मादुरो का तख्तापलट कर अपनी पसंद की सरकार बनवा चुके हैं. कठपुतली सरकार के जरिए वेनेजुएला को चला रहे हैं. अब ग्रीनलैंड पर भी ट्रंप का कब्जा हो चुका है. इसलिए यह सवाल है कि ट्रंप का अगला टारगेट कौन सा देश होगा?

प्राकृतिक खजाने पर कब्जा और सामरिक महत्व के अलावा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की ट्रंप की एक और वजह है. आत्ममुग्ध ट्रंप अमेरिकी इतिहास में अपना नाम सबसे ऊपर रखना चाहते हैं. वह दिखाना चाहते थे कि 166 साल में जो काम किसी भी राष्ट्रपति ने नहीं किया, वह काम उन्होंने किया. ट्रंप अमेरिकी इतिहास में खुद को उस राष्ट्रपति के तौर पर दर्ज कराना चाहते हैं जिसने अलास्का की तर्ज पर ग्रीनलैंड जैसे बड़े भू-भाग को अमेरिका से जोड़ा है.

आत्ममुग्ध ट्रंप ऐसे काम करते रहे हैं. वह अपनी फोटो वाले सिक्के और डॉलर भी जारी कर चुके हैं. अब ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया है, लेकिन ट्रंप के विस्तारवाद से दुनिया में बेचैनी है, डर है.

कनाडा से लेकर क्यूबा तक: ट्रंप के निशाने पर दुनिया के कौन-कौन से देश?

ट्रंप वेनेजुएला में मादुरो का तख्तापलट कर अपनी पसंद की सरकार बनवा चुके हैं. कठपुतली सरकार के जरिए वेनेजुएला को चला रहे हैं. अब ग्रीनलैंड पर भी ट्रंप का कब्जा हो चुका है. इसलिए यह सवाल है कि ट्रंप का अगला टारगेट कौन सा देश होगा? मित्रो, कुछ देशों को अभी से अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता की चिंता सताने लगी है.

विस्तारवादी ट्रंप अनेक बार कनाडा को अपना 51वां राज्य घोषित कर चुके हैं. ट्रंप बार-बार यह कहते रहे हैं कि कनाडा को अमेरिका में विलय कर लेना चाहिए. क्यूबा को भी ट्रंप 'फेल्ड नेशन' कह चुके हैं. ट्रंप क्यूबा पर अमेरिकी कब्जे की बात सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं. रीडेवलपमेंट के नाम पर ट्रंप गजा पर अमेरिकी कब्जे का मंसूबा रखते हैं. पनामा नहर को भी ट्रंप फिर से अमेरिका के कब्जे में लाने का ऐलान करते रहे हैं. इसके अलावा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को 'ट्रंप स्ट्रेट' घोषित करते हुए इस पर अमेरिकी प्रभुत्व का ऐलान कर चुके हैं.

पहले वेनेजुएला... अब ग्रीनलैंड पर कब्जे के बाद यह साफ हो गया है कि 21वीं सदी में ट्रंप का विस्तारवाद फुल स्केल यानी पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है. इसलिए अब कनाडा, क्यूबा जैसे देशों में खलबली है. पनामा और होर्मुज के रास्ते व्यापार करने वाले देशों में डर है.

एक तरफ टैरिफ की मार, दूसरी तरफ सैनिकों की वापसी

यूरोपीय देशों ने ट्रंप के विस्तारवाद को चुनौती दी तो ट्रंप ने यूरोप पर टैरिफ लगाने की धमकी दी. अब ग्रीनलैंड पर कब्जे के बाद ट्रंप ने यूरोप को एक और झटका दिया है. ट्रंप यूरोप में तैनात अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला रहे हैं.

ट्रंप यूरोप में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी कम कर रहे हैं.

यूरोप में तैनात 80 हजार अमेरिकी सैनिकों में से आधे यानी 40 हजार सैनिकों को वापस बुलाया जा रहा है.

सैनिकों के साथ ही यूरोप में तैनात अमेरिकी विमान, जहाज और हथियार भी कम कर लिए जाएंगे.

रूसी हमले का खौफ: जब कांप रहा था यूरोप, तब ट्रंप ने छोड़ा अकेला

ट्रंप यह कटौती उस वक्त कर रहे हैं जब यूरोपीय देशों को रूस के हमले का डर सता रहा है. यूरोप में अमेरिका के करीबी देश इस वक्त रूस के हमले से बचने का इंतजाम कर रहे हैं. यूरोप के डर को ऐसे समझिए कि  फिनलैंड ने मिलिट्री-रिजर्व में शामिल होने की उम्र बढ़ाकर 65 साल कर दी है. रूस के हमले की सूरत में मुकाबले के लिए फिनलैंड 10 लाख लोगों का रिजर्व फोर्स तैयार कर रहा है.

  • एस्तोनिया ने बचाव के लिए NATO के परमाणु हथियारों को अपनी जमीन पर तैनात करने की पहल की है.
  • लिथुआनिया रूस और बेलारूस के पास मजबूत रक्षा ठिकाने बना रहा है.
  • पोलैंड 5 लाख लोगों की सेना और रिजर्व सिस्टम बनाने पर काम कर रहा है.
  • जर्मनी 10 लाख नागरिकों के लिए शेल्टर की क्षमता जुटाने की कोशिश कर रहा है, साथ ही संभावित सैन्य सर्विस के लिए युवा पुरुषों का रजिस्ट्रेशन कर रहा है.
  • स्वीडन ने नागरिकों को युद्ध में बचाव का तरीका समझाने के लिए हैंडबुक शेयर की है.
  • डेनमार्क में महिलाओं के लिए अनिवार्य सैन्य सर्विस लागू कर दी गई है.
  • फ्रांस में लोगों को रेडिएशन से बचाव के तरीकों के बारे में बताया जा रहा है.
  • ब्रिटेन ने आम लोगों को खाने-पीने का सामान स्टोर करने के लिए कहा है.

यूरोपियन यूनियन ने 45 करोड़ निवासियों को कम से कम 72 घंटे के लिए खाना, पानी, दवा, कैश और इमरजेंसी का सामान तैयार रखने की सलाह दी है.

ऐसे वक्त में ट्रंप ने यूरोप को अकेला छोड़ दिया है. ग्रीनलैंड पर कब्जा और यूरोप से सैनिकों की वापसी के ऐलान से ट्रंप ने साफ कर दिया है कि उन्हें अपने यूरोपीय सहयोगियों की फिक्र नहीं है. उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे की चिंता है. इस फायदे के लिए वह किसी हद तक जा सकते हैं. किसी के साथ भी दोस्ती कर सकते हैं, किसी भी दोस्त का साथ छोड़ सकते हैं और अपने से कमजोर किसी भी देश पर कब्जा करने की कोशिश कर सकते हैं.

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About the Author

Bhoopendra Rai

Bhoopendra Rai

पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
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