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परिसीमन पर फिर क्यों गरमाई सियासत? 6 महीने में बदले समीकरण, अब किसकी बढ़ेगी मुश्किल?

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी के बाद परिसीमन पर सियासी हलचल तेज हो गई है. चर्चा है कि सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर बिल ला सकती है. महिला आरक्षण, संसद के नंबर गेम और 2027 के विधानसभा चुनावों के बीच परिसीमन बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है.

Written By Tahir Kamran
Published: Oct 17, 2026, 10:45 PM IST | Updated: Oct 17, 2026, 10:48 PM IST
Image Credit: AI की मदद से बनाई गई तस्वीर
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आज देश में दो राजनीतिक मुद्दे ट्रेंड कर रहे हैं. पहला मुद्दा है रिजीम चेंज, जिस पर पिछले 48 घंटे से बहस छिड़ी है. दूसरा मुद्दा परिसीमन यानी डीलिमिटेशन से जुड़ा है. परिसीमन वाली चर्चा की शुरुआत हुई है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की एक चिट्ठी से. खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखी है. आप इसे खरगे का पीएम के नाम लिखा परिसीमन पत्र भी कह सकते हैं.

इसमें उन्होंने पीएम से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है. खरगे के पत्र के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाने वाली है. क्या सरकार ने परिसीमन बिल पर आगे बढ़ने की तैयारी कर ली है. सरकार प्रदर्शन काल में परिसीमन पर मंथन क्यों कर रही है. आज हम इन्हीं सवालों को डिकोड करेंगे.

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पीएम मोदी को एक चिट्ठी लिखी है. इस चिट्ठी में उन्होंने रेखांकित किया है कि परिसीमन पर किसी भी संवैधानिक संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, विपक्षी दलों से चर्चा की जाए. सभी दलों को बिल पर अपना पक्ष तैयार करने के लिए समय दिया जाए. खरगे ने याद दिलाया है कि वो चौथी बार प्रधानमंत्री के नाम ये चिट्ठी लिख रहे हैं.

इससे पहले 11 अप्रैल, 16 जुलाई और 27 अगस्त को पत्र लिख चुके हैं. अब चौथी बार 16 अक्टूबर को चिट्ठी लिखी है. जर्मनी के प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक ओटो वॉन बिस्मार्क का विचार है कि राजनीति कोई अकादमिक सिद्धांत नहीं है, यह संभावनाओं की कला है. यहां हर मुद्दा एक उपकरण है, जिसका इस्तेमाल भविष्य में अपने प्रभाव को सुरक्षित और मजबूत करने के लिए किया जाता है.

क्या सरकार संसद में परिसीमन बिल लाने की तैयारी कर रही है?

भविष्य को प्रभावित करने वाले एक मुद्दे की चर्चा राजनीति के सूत्र कर रहे हैं. पॉलिटिकल कॉरिडोर में सूत्रों के हवाले से ये चर्चा है कि सरकार संसद में परिसीमन बिल लाने का मन बना रही है. अब तक ये चर्चा सूत्रों के हवाले से हो रही थी. कांग्रेस अध्यक्ष की चिट्ठी ने इस चर्चा को एक पुख्ता आधार दे दिया है. मल्लिकार्जुन खरगे ने अपनी चिट्ठी में परिसीमन बिल के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की चर्चा के खिलाफ तर्क भी दिया है.

उन्होंने लिखा है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ था. इसके बाद से 64 दिन बीत चुके हैं, लेकिन संसद के दोनों सदनों का अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है. उन्होंने मानसून सत्र के स्थगन में अभूतपूर्व देरी को लेकर चिंता जताई है.

खरगे की चिट्ठी, क्या विशेष सत्र बुलाएगी सरकार?

समझिए संसद का शीतकालीन सत्र नवंबर के तीसरे या आखिर हफ्ते से शुरू होता है. यानी संसद के शीतकालीन सत्र में करीब 40 दिन का समय बचा है. ऐसे में खरगे ये क्यों कह रहे हैं कि सरकार विशेष सत्र बुलाकर संसद में परिसीमन बिल लाने की तैयारी कर रही है. अप्रैल में लोकसभा में परिसीमन से जुड़ा बिल पेश किया गया है. आखिर पिछले 6 महीने में जमीन पर क्या बदल गया कि अब फिर परिसीमन बिल चर्चा के केंद्र में है. इसे विस्तार से समझने के लिए पहले ये समझते हैं कि अप्रैल में जब संसद में परिसीमन बिल पेश किया गया था, तो क्या हुआ था.

परिसीमन लागू करने के लिए तीन बिल जरूरी

6 महीने पहले 16 अप्रैल को सरकार ने संसद में परिसीमन से जुड़े एक बिल को संसद में पेश किया था. पहले आप ये समझिए कि परिसीमन लागू करने के लिए तीन बिल संसद में पास कराया जाना है.

  1. पहला बिल है संविधान 131वां संशोधन विधेयक 2026. इसमें लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है.
  2. दूसरा बिल परिसीमन संशोधन विधेयक 2026 है. इसमें परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव है.
  3. तीसरा बिल केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक 2026 है. यह विधेयक पुडुचेरी, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के कानूनों में संशोधन करता है, ताकि परिसीमन और महिला आरक्षण बिल इन राज्यों में लागू हो सके.

परिसीमन के लिए इन तीन बिल को संसद में पास कराना अनिवार्य है. अब समझते हैं कि अप्रैल में जब संविधान के 131वें संशोधन विधेयक पर वोटिंग हुई थी, तो क्या हुआ था.

लोकसभा में 54 वोट कम पड़ने से गिरा था बिल

लोकसभा में बिल पर 21 घंटे की चर्चा के बाद 17 अप्रैल को लोकसभा में वोटिंग हुई थी. वोटिंग के दौरान सदन में कुल 528 सदस्य उपस्थित थे. बिल पास कराने के लिए मौजूद सदस्यों का दो-तिहाई यानी 352 सदस्यों का समर्थन चाहिए था. बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े थे. विरोध में 230 वोट पड़े थे. यानी संविधान के 131वें संशोधन बिल को दो-तिहाई बहुमत से 54 वोट कम मिले.

इस कारण ये बिल लोकसभा में पास नहीं हो पाया. इसके बाद परिसीमन से जुड़े बाकी के दो बिल सरकार ने संसद में पेश ही नहीं किए. 12 साल में ये पहला मौका था, जब सरकार सदन में कोई बिल पास नहीं करा पाई. सवाल ये है कि 6 महीने में ऐसा क्या बदल गया कि खरगे साहब कह रहे हैं कि सरकार फिर संसद में परिसीमन बिल पेश करने की तैयारी कर रही है. इसके लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है. बिल पास कराने के लिए सरकार को 54 वोट और चाहिए. 6 महीने में आंकड़ों में बदलाव हुआ है. यही बदलाव खरगे की चिंता और सरकार की तैयारी का साक्ष्य है. इस बदलाव को भी समझते हैं.

लोकसभा में क्या है परिसीमन बिल का गणित?

लोकसभा में 543 सांसद हैं. 3 सीटें खाली हैं. अब 540 सदस्य बचे हैं. NDA के 318 सांसद हैं. बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई यानी 360 वोट चाहिए. अब अगर DMK के 22 सांसद NDA के साथ आ जाएं, तो बिल के समर्थन में 340 सांसद हो जाएंगे. यानी इसके बाद भी 20 और सांसदों की जरूरत होगी. दूसरे छोटे दलों को साथ लाकर ये संख्या पूरी हो सकती है.

राज्यसभा में क्या है नंबर गेम?
अब राज्यसभा का गणित भी समझिए. राज्यसभा में 245 सीटें हैं. 3 सीटें खाली हैं. इस तरह 240 सदस्य बचे. बिल को पास कराने के लिए 162 सांसद चाहिए. NDA के 153 सांसद हैं. NDA को 9 सांसदों की जरूरत पड़ेगी. यहां DMK के 8 राज्यसभा सांसद महत्वपूर्ण होंगे.

पिछले 6 महीने में संसद के समीकरण कैसे बदले?

अब ये समझते हैं कि पिछले सत्र से अब तक संसद में क्या बदला है. क्यों सरकार इस बार पहले से मजबूत स्थिति में दिख रही है और क्यों विपक्ष पहले के मुकाबले कमजोर हुआ है. सबसे बड़ा बदलाव ये है कि TMC में टूट हो चुकी है. TMC के 20 सांसद एनसीपीआई में शामिल हो गए. वो सरकार के साथ हैं. उद्धव गुट वाली शिवसेना के 6 सांसदों ने पाला बदल लिया है. अब वो भी सरकार के साथ हैं.

तीसरा महत्वपूर्ण बदलाव ये हुआ है कि तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और DMK में अलगाव हो चुका है. DMK ने इंडिया गठबंधन का साथ छोड़ दिया है. यानी 6 महीने में आंकड़े सरकार के पक्ष में झुके हैं. अभी भी कागज पर सरकार के पास नंबर पूरे नहीं हैं. लेकिन जैसा कि विद्वान कहते हैं, राजनीति संभावनाओं का खेल है. सरकार अब नंबर गेम में आगे है. इसलिए खरगे को लग रहा है कि सरकार परिसीमन बिल लाने की तैयारी कर रही है.

प्रदर्शन काल में परिसीमन बिल पर चर्चा का क्या मतलब?

आचार्य चाणक्य का विचार है कि राजनीति में कोई भी कदम बिना किसी भावी उद्देश्य के नहीं उठाया जाता, तो परिसीमन बिल को लेकर सरकार का भावी उद्देश्य क्या है. इसका सबसे आसान जवाब ये होगा कि सरकार गोल शिफ्ट करना चाहती है. यानी इस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर जो धरना-प्रदर्शन चल रहा है, जिस तरह का प्रेशर या कहें माहौल बनाया जा रहा है, उससे ध्यान हटाने के लिए परिसीमन बिल की एंट्री कराई जा रही हो.

ये संभावनाओं का सरलीकरण है. क्यों. समझिए. परिसीमन को लेकर भी विपक्ष का जो रुख रहा है, उससे साफ है कि बिल जब संसद में पेश होगा, तो विपक्ष सड़क पर होगा. आज जिस ताकत से विपक्ष प्रदर्शन कर रहा है, उससे भी ज्यादा मजबूती से विरोध होगा. यानी सरकार को परिसीमन पर आगे बढ़ने से विरोध वाले मोर्चे पर राहत नहीं मिलेगी. ये भी हो सकता है कि विरोध और तेज हो. तो जब ऐसी बात है, फिर परिसीमन की चर्चा क्यों हो रही है.

पांच राज्यों के चुनाव से पहले महिला आरक्षण का मुद्दा

चार महीने बाद यानी फरवरी और मार्च 2027 में देश के पांच राज्यों, उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव होना है. ये चुनाव राजनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण हैं. परिसीमन बिल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजनीतिक सिस्टम में महिलाओं को 33 प्रतिशत यानी एक तिहाई आरक्षण देने का भी है. अब समझिए, बिल संसद में पेश होता है और पास होता है या पास नहीं भी होता है, तब भी नैरेटिव बदलेगा. बिल अगर पास हुआ, तो विमर्श होगा कि महिलाओं को अधिकार दिलाने, महिला आरक्षण लागू करने और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व देने के लिए बड़ा कदम उठाया गया.

महिला सशक्तिकरण का ये परसेप्शन पांच चुनावी राज्यों में असरदार हो सकता है. क्योंकि बिहार, पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनावी नतीजे तस्दीक करते हैं कि महिला वोटर्स का रुझान जिस पार्टी की तरफ होता है, सरकार उस पार्टी की बनती है. महिला सशक्तिकरण का ये नैरेटिव सिर्फ विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा. 2029 के लोकसभा चुनाव में भी ये एक स्थायी मुद्दा होगा.

अगर बिल पास नहीं हुआ, तो क्या होगा. NDA विपक्ष पर महिला आरक्षण के विरोध का आरोप लगाएगा. इस नैरेटिव का जवाब देना विपक्ष के लिए मुश्किल होगा. SIR और वोट चोरी के नैरेटिव के सामने महिला आरक्षण के विरोध का भावनात्मक नैरेटिव होगा. ये विपक्ष को बैकफुट पर धकेल सकता है.

परिसीमन बिल पर विपक्षी एकजुटता कमजोर होने की आशंका

अब इस बिल का राजनीतिक पक्ष समझिए. फिलहाल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर लगभग पूरा विपक्ष एकजुट है. लेकिन परिसीमन बिल पर ये एकजुटता कमजोर हो सकती है. कैसे? कई क्षेत्रीय पार्टियों की चिंता परिसीमन के बाद सीटों को लेकर है. DMK जैसी पार्टियां चाहती हैं कि सभी राज्यों में एक अनुपात में सीटें बढ़ाई जाएं. सरकार कह चुकी है कि 50% सीटें बढ़ाई जाएंगी. ये भरोसा मिलने के बाद क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से अलग रुख अपना सकती हैं. इससे विपक्षी एकजुटता कमजोर होगी.

भविष्य के राजनीतिक एजेंडे को लेकर सरकार की रणनीति

इस बिल को पेश कर सरकार भविष्य से जुड़ा एक संदेश भी देना चाहती है. सरकार बताना चाहती है कि वो महिला आरक्षण और प्रशासनिक सुधार के अपने वैचारिक और नीतिगत एजेंडे पर अडिग है. भले ही संसद में संख्या या विरोध के कारण इसे तुरंत पारित कराना मुश्किल हो. बिल पेश कर सरकार ऐसी राजनीतिक लकीर खींच सकती है, जो भविष्य में विपक्ष को वैचारिक रूप से उलझा सकती है.

परिसीमन बिल पर अभी आधिकारिक बयान नहीं

समझिए, अभी परिसीमन बिल पेश करने पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. बस सूत्रों के हवाले से इसकी चर्चा हो रही है. इतना होने से ही मंथन के केंद्र में परिसीमन बिल आ गया है. विपक्ष परिसीमन को भी चुनाव आयोग और चुनावी गड़बड़ी से जोड़ सकता है. लेकिन गड़बड़ी वाला ये नैरेटिव पुराना होगा. इसमें नया अध्याय महिला आरक्षण से जुड़ा है. जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां पॉलिटिकल सिस्टम में महिलाओं के लिए आरक्षण बड़ा भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा बन सकता है. सरकार की पोजिशनिंग आधी आबादी के हितों के पक्ष में होगी. और बिल का विरोध करने वालों पर महिला विरोधी होने का आरोप लगेगा. अभी ये सिर्फ चर्चा है. मल्लिकार्जुन खरगे की चिट्ठी ने परिसीमन को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. आगे जो भी अपडेट होगा, हम आपको बताएंगे.

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About the Author

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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