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ग्लोबल प्रॉब्लम बन रहे हिंसक प्रदर्शनों का DNA टेस्ट, फ्रांस से अल्बानिया तक एक जैसा पैटर्न क्यों?

फ्रांस, इटली और अल्बानिया समेत कई देशों में हिंसक प्रदर्शनों, आगजनी और लूटपाट ने वैश्विक चिंता बढ़ाई है. महंगाई, बेरोजगारी और सरकारी नीतियों से उपजे गुस्से के बीच इन घटनाओं के एक जैसे पैटर्न और संभावित राजनीतिक कनेक्शन पर सवाल उठ रहे हैं.

Written By Tahir Kamran
Published: Oct 19, 2026, 11:01 PM IST | Updated: Oct 19, 2026, 11:07 PM IST
Image Credit: AI की मदद से बनाई गई तस्वीर
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दुनिया में इस वक्त हिंसक प्रदर्शनों का मौसम चल रहा है, जिन देशों की सड़कों पर इस वक्त टूरिस्टों को शॉपिंग करते दिखाई देना चाहिए था. वहां नकाबपोश उपद्रवी दुकानों में लूटपाट करते नजर आ रहे हैं. पिछले 48 घंटों में फ्रांस, इटली, बेल्जियम और अल्बानिया जैसे देशों से जो तस्वीरें और खबरें आईं. उन्होंने यूरोप के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं. यहां लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे, पुलिस से उपद्रवियों का खूनी संघर्ष हुआ, ऐतिहासिक इमारतें जलाई गईं और दुकानों में लूटपाट हुई.

यह सब एक ऐसे समय में हुआ है जब यूरोप पहले से ही कई मोर्चों पर जूझ रहा है. आज आपको जानना चाहिए कि यूरोप के बड़े देशों समेत दुनिया के कई​ हिस्सों में एक साथ चल रही हिंसा एक संयोग है या फिर सोच समझकर किया जा रहा प्रयोग. आज आपको जानना चाहिए कि अचानक शुरू हुए इन दंगों में कौन सी बातें एक जैसी हैं. इन दंगों के पैटर्न में ऐसा क्या दिखाई दिया, जिससे एक पक्ष मुस्लिम देशों से आए प्रवासियों पर उंगली उठा रहा है. जबकि दूसरे पक्ष को इसकी जड़ में एक महाशक्ति नजर आ रही है. आज आपको ये भी समझना चाहिए कि इस हिंसा से ​किसका फायदा हो रहा है और किसका नुकसान.

फ्रांस में शिक्षकों की कमी, छात्रों की बुनियादी समस्याओं और आसमान छूती महंगाई को लेकर सितंबर के अंत से प्रदर्शन जारी हैं. फ्रांस में अब तक प्रदर्शनों के दौरान 2000 से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. ऐतिहासिक इमारतों और बाजारों में आगजनी और लूटपाट से लगभग साढ़े 5 हजार करोड़ का व्यावसायिक नुकसान हुआ है.

इसके अलावा मिलान समेत इटली के कई शहरों में पिछले दो दिनों से दंगे जारी हैं. यहां बढ़ती महंगाई को लेकर असंतोष है. जिसे मुद्दा बनाकर नाबालिग और युवाओं ने जमकर लूटपाट की है. जिसके बाद प्रधानमंत्री मेलोनी को कड़ी चेतावनी जारी करनी पड़ी.

बेल्जियम में फ्रांस के छात्र आंदोलनों से प्रेरित होकर आर्थिक नीतियों के खिलाफ युवा आक्रोश भड़का है. राजधानी में छात्र प्रदर्शनों के दौरान हिंसक झड़पें चल रही हैं. पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में महंगे घर और आम जनता पर बढ़ती महंगाई का बोझ लोगों को सड़क पर लेकर आया है.

वहीं यूरोपीय देश अल्बानिया में भी पिछले कई महीनों से प्रदर्शन जारी है. यहां पुलिस और छात्रों के बीच हिंसक झड़पें हो रही हैं. यहां सरकारी भ्रष्टाचार, बढ़ी हुई यूनिवर्सिटी फीस और प्रधानमंत्री ईडी रामा की नीतियों के खिलाफ नाराजगी है.

यूरोप के अलावा लैटिन अमेरिकी देश चिली में शिक्षा बजट में कटौती और सामाजिक-आर्थिक असमानता की वजह से आंदोलन चल रहे हैं. अर्जेंटीना में राष्ट्रपति माइली की सख्त राजकोषीय नीतियों और फंड में भारी कटौतियों की वजह से मजदूर यूनियन और छात्र सड़कों पर उतर आए.

कोलंबिया में आर्थिक बदहाली, बढ़ती लागत और सरकारी नीतियों के खिलाफ असंतोष है. प्रदर्शन लगातार उग्र होते जा रहे हैं.

वहीं, मेक्सिको और ट्यूनीशिया में भी आर्थिक तंगी की वजह से सड़कों पर उपद्रव हो रहा है.

हैरानी की बात यह है कि इनमें से कुछ देशों में इन प्रदर्शनों के तार दूसरे देशों से जुड़े होने के दावे भी किए जा रहे हैं. आज आपको दुनिया भर में प्रदर्शनों के हिंसक होने का पैटर्न भी समझना चाहिए. लेकिन इससे पहले आप इन हिंसक प्रदर्शनों की वजह से दुनिया के कुछ सबसे आधुनिक देशों में बर्बादी का वीडियो विश्लेषण देखिए.

यूरोप की सड़कें जल रही हैं. फ्रांस, इटली और अल्बानिया में प्रदर्शन की आड़ में लूटपाट, आगजनी और पुलिस से खूनी टकराव के ये दृश्य पिछले 48 घंटों से दुनिया को बेचैन कर रहे हैं.

इटली: मिलान में 48 घंटे तक हिंसा, दुकानों में लूटपाट

अल्बानिया: तिराना में नकाबपोश छात्रों ने फेंके पेट्रोल बम

फ्रांस में हालात इतने खराब हैं कि इमरजेंसी लगाने की तैयारी की जा रही है और यूरोपीय देशों में अराजकता की ये तस्वीरें कई सवाल खड़ा कर रही हैं. क्या ये सिर्फ महंगाई का गुस्सा है या फिर प्रदर्शन की आड़ में अराजकता फैलाने वाले समूह किसी योजना के तहत सक्रिय हैं. डीएनए की शोधशाला में हमने जब इन सभी घटनाओं को एक साथ परखा तो फ्रांस, इटली, अल्बानिया और दूसरे देशों में हिंसा के पैटर्न में कई समानताएं दिखीं. इन देशों में चुनाव नजदीक हैं. ज्यादातर देशों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में नकाबपोश युवाओं ने लूटपाट और आगजनी की है. कई जगहों पर फिलिस्तीन के झंडों का दिखाई देना भी सवाल खड़े कर रहा है. आज आपको शांतिपूर्ण प्रदर्शन के हिंसक होने के 7 चरणों को समझना चाहिए.

हर देश में प्रदर्शन की शुरुआत फीस, महंगाई, सरकारी फंड में कटौती या पानी जैसी किसी स्थानीय समस्या से हुई. जैसे पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में आसमान छूते हाउसिंग और किराए के संकट ने आम जनता को सड़कों पर ला खड़ा किया, जबकि चिली में शिक्षा के बजट में कटौती ने असंतोष की पहली चिंगारी सुलगाई.

दूसरे चरण में ऐसे आंदोलनों से छात्र, यूनियन और नागरिक समूह जुड़ते गए, जैसे फ्रांस में सितंबर के अंत में स्कूलों में शिक्षकों की कमी और खराब सुविधाओं को लेकर छात्रों ने आवाज उठाई, जिसे बाद में ट्रेड यूनियनों और 'येलो वेस्ट' जैसे पुराने आंदोलनों का समर्थन मिल गया.

तीसरे चरण में सोशल मीडिया के जरिए प्रदर्शनकारियों की तेज लामबंदी हुई. जैसे बेल्जियम और फ्रांस में युवा सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए ही आंदोलनकारियों को इकट्ठा कर रहे हैं. फ्रांस में हालिया प्रदर्शन में 8 लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया.

चौथे चरण में पुलिस कार्रवाई को आंदोलन को भड़काने का हथियार बनाया गया. अल्बानिया और फ्रांस में जब भीड़ को संभालने के लिए भारी पुलिस तैनाती की गई तो तनाव कम होने के बजाय और बढ़ गया.

पांचवे चरण में नकाबपोश और कट्टर समूहों की आंदोलन में एंट्री हुई, इटली के मिलान और फ्रांस में शांतिपूर्ण मार्च और छात्र रैलियों के बीच में काले कपड़े और मास्क पहने उपद्रवी घुस आए. स्थानीय समस्या के लिए शुरू आंदोलन में फिलिस्तीन का झंडा लहराया जाने लगा.

इसके बाद छठवें चरण में तोड़फोड़, आगजनी और पुलिस से हिंसक झड़प शुरू हो गईं, इन्हीं लोगों ने फ्रांस में 143 साल पुराने टाउन हॉल को जलाया और इटली में सुपरमार्केट और ब्रांडेड स्टोर लूटे.

आखिरी चरण में महंगाई, शिक्षा या हाउसिंग जैसी असली और बुनियादी मांगें पूरी तरह पीछे छूट गईं. अब बहस इस बात पर हो रही है कि सरकारों ने हजारों लोगों को क्यों गिरफ्तार किया है. क्या सरकारें आंदोलन का दमन कर रही हैं और कानून-व्यवस्था तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को कैसे संभाला जाए. इससे सत्ता संभाल रहे नेताओं पर दबाव बढ़ने लगा.

कई देशों ने इन प्रदर्शनों के लिए बाहरी ताकतों को जिम्मेदार बताया है. मेलोनी ने उपद्रवियों से सख्ती से निपटने की बात कही, मैक्रों भी कह रहे हैं कि जिन्होने आग लगाई वो बचेंगे नहीं, लेकिन यूरोपीय नेता अपने यहां समस्या की मुख्य जड़ अमेरिका को मानते हैं. आज आपको फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का बयान बहुत ध्यान से सुनना चाहिए.

वैसे, फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों को ऐसा लगता है कि यूरोप में जो हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, उसकी चिंगारी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लगाई है. अमेरिका-ईरान युद्ध को वो यूरोप में महंगाई और असंतोष बढ़ने की मुख्य वजह मान रहे हैं. फ्रांस में उपद्रवी फिलिस्तीन का झंडा लेकर भी प्रदर्शन कर रहे हैं. मुस्लिम प्रवासियों के इलाके में हिंसक प्रदर्शन ज्यादा हो रहे हैं. इससे पहले मैक्रों गाजा पर ट्रंप के प्लान का विरोध भी कर चुके हैं. मैक्रों ने ट्रंप के रूसी डीजल खरीद समझौते का भी विरोध किया है.

मैक्रों ने कहा कि यूक्रेन पर बमबारी जारी है, इसलिए रूसी धमकी के आगे नहीं झुकना चाहिए. यानी ऐसे कई मुद्दे हैं, जिनसे फिलहाल मैक्रों ट्रंप से असहमत हैं. इसीलिए मैक्रों और ट्रंप के रिश्ते भी ठीक नहीं चल रहे. वैसे ये भी एक संयोग है, जिन देशों में प्रदर्शन चल रहे हैं. उनमें से कई देशों का अमेरिका से विवाद चल रहा है.

मैक्रों के अलावा इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और ट्रंप के बीच ईरान युद्ध में सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल और रूस से जुड़े ऊर्जा सौदों को लेकर मतभेद बढ़े हैं. दोनों नेताओं के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही है.

बेल्जियम में अमेरिका की विश्वसनीयता, व्यापार और रक्षा खर्च को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं. अमेरिकी दबाव और यूरोप के हितों को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद हैं.

अल्बानिया के अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध तो ठीक हैं, लेकिन ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर से जुड़े लग्जरी रिसॉर्ट प्रोजेक्ट को लेकर देश में विवाद है. पर्यावरण और पारदर्शिता से जुड़े सवालों ने सरकार के खिलाफ विरोध को हवा दी है.

इसके अलावा ट्रंप और मैक्सिको की राष्ट्रपति शीनबाम के रिश्तों में अवैध प्रवासन, सीमा सुरक्षा, ड्रग तस्करी और अमेरिकी टैरिफ की वजह से तनाव बढ़ा है.

इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यूरोप की हिंसा का फायदा अमेरिकी चुनावों में उठाने की कोशिश भी कर रहे हैं.

फ्रांस की हिंसा पर ट्रंप ने कहा कि फ्रांस जल रहा है! जिनके दिलों में नफरत भरी है, बिल्कुल अलग संस्कृति से आए ऐसे लोगों के आव्रजन ने कभी महान रहे देश को तबाह कर दिया है. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, अपनी सीमाएं बंद कीजिए और हालात पर नियंत्रण कीजिए.

इसके जरिए ट्रंप चुनाव से पहले अपनी कठोर आव्रजन नीतियों को सही ठहरा रहे हैं. किसी देश में विदेशियों के प्रवेश, निवास, काम करने, वीजा और नागरिकता प्राप्त करने से जुड़े नियमों और सरकारी व्यवस्था को आव्रजन नीति कहा जाता है. ट्रंप अवैध घुसपैठियों पर सख्ती कर रहे हैं और फ्रांस का उदाहरण देकर समझा रहे हैं, अगर ऐसा नहीं किया गया तो अमेरिका का भी फ्रांस जैसा हाल होगा. ट्रंप इस मुद्दे के जरिए विपक्षी डेमोक्रेट्स को ऐसी पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, जो आव्रजन पर पर्याप्त सख्ती नहीं करती. जिससे अमेरिका का नुकसान हो सकता है. यानी लगातार चल रहे हिंसक प्रदर्शन से भले ही यूरोपीय देशों और और वहां सत्ता में बैठे नेताओं को नुकसान हो, लेकिन ट्रंप इस मौके को अमेरिका चुनाव से पहले अपने पक्ष में भुनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

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About the Author

Zee News में नेशनल डेस्क पर देश–विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरें लिखते हैं. करियर का आगाज 2015 से 'पंजाब केसरी' ग्रुप के उर्दू अखबार ‘हिंद समाचार’ से किया, जहां वे कंटेट राइटर से पेज डिजाइनर तक पहुंचे. इसके बाद उर्दू, हिंदी और पंजाबी - तीनों भाषाओं में काम करने का मौका मिला. 2018 में डिजिटल की तरफ कूच करते हुए पंजाब केसरी ग्रुप की उर्दू वेबसाइट की लॉन्चिंग टीम का नेतृत्व किया. इसके बाद 2020 में 'Zee Salaam' ज्वाइन किया, यहां भी वेबसाइट को लॉन्च करने के साथ-साथ तीन साल टीम का नेतृत्व भी किया. इसी दौरान ZEE Delhi NCR वेबसाइट भी लॉन्च हुई, जिसमें उनका अहम योगदान रहा. 2023 में India Daily Live की लॉन्चिंग टीम के साथ काम किया और शुरुआती दिनों में हिंदी के अलावा पंजाबी, तमिल, तेलुगु और गुजराती वेबसाइट टीमों को मैनेज किया. अक्टूबर 2024 में फिर से Zee Media में में वापसी करते हुए नेशनल टीम का हिस्सा बने. तकनीक में दिलचस्पी की वजह से उन्होंने React.js और वेब डिजाइनिंग सीखी. यही कारण है कि उनकी खबरों में HTML-CSS के छोटे-छोटे ग्राफिक्स दिख जाते हैं, जो मुश्किल बातों को भी आसान बना देते हैं. करियर की शुरुआत में कुछ दिनों तक फोटो स्टूडियो में भी काम किया, जहां कैमरा, Adobe Photoshop और ग्राफिक डिजाइनिंग सीखी, जो आज भी उनके डिजिटल काम में मदद करता है. उर्दू शायरी से प्यार अलग ही है. ग़ज़लें, नज़्में, गीत भी लिखते हैं और कई अखबारों में उनकी शायरी छप भी चुकी हैं. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, अनवर जलालपुरी खुशबीर सिंह शाद और नवाज देवबंदी, माजिद देवबंदी  जैसे शायरों के इंटरव्यू व बातचीत का अनुभव भी उनके पास है. आप tahir.kamran@india.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facbook से जुड़ सकते हैं. 
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