Delhi News: दिल्ली में जंतर-मंतर की जगह नए प्रोटेस्ट साइ़ट के फाइनल होने के साथ एक जरूरी सवाल उठ रहा है कि प्रोटेस्ट की जगह कौन तय करता है? क्या संगठन प्रदर्शन के लिए अपनी जगह खुद चुन सकते हैं या उन्हें पुलिस और प्रशासन से अनुमति की जरूरत होती है? इसका जवाब नागरिकों के संवैधानिक अधिकार, सार्वजनिक सुरक्षा और कानून एवं व्यवस्था नियंत्रण करने वाले नियम में है. ऐसे में जानतें हैं कि आखिर प्रदर्शन की जगह तय करने का अधिकार किसके पास है?
दिल्ली में प्रोटेस्ट की जगह तय करने का अधिकार किसके पास है?
दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर प्रोटेस्ट को रेगुलेट करने और लोगों के इक्ट्ठा होने में दिल्ली पुलिस की अहम भूमिका है. पुलिस प्रोटेस्ट के लिए परमिशन देने, कार्यक्रम या प्रदर्शन के लिए कंडीशन तय करने और जरूरत के हिसाब से सिक्योरिटी और ट्रैफिक पाबंदियां लगाने का फैसला कर सकती है. दिल्ली में पुलिस और पब्लिक ऑर्डर केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय की भी अहम भूमिका है.
हाल ही में दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को तय प्रोटेस्ट की जगह की लिस्ट से हटा दिया और रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और ईस्ट दिल्ली में CBD ग्राउंड को नए ऑप्शन के तौर पर नोटिफाई किया. यह फैसला गृह मंत्रालय द्वारा बनाई गई एक कमेटी की सिफारिशों के बाद लिया गया. इस बदलाव का जिक्र दिल्ली पुलिस के 11 अक्टूबर के ऑर्डर में है. हालांकि, नई जगहों पर प्रोटेस्ट के लिए डिटेल्ड रिवाइज्ड गाइडलाइंस भी अलग से जारी की गई.
क्या प्रोटेस्ट करने वाले संगठन अपनी पसंदीदा जगहें चुन सकते हैं?
प्रदर्शनकारी अपनी मांगों और जगहें सुझा सकते हैं, लेकिन इससे उन्हें बिना परमिशन के किसी भी पब्लिक जगह पर मीटिंग करने या प्रदर्शन का अधिकार नहीं मिलता है. पुलिस के प्रक्रिया और शर्तों का पालन करना पड़ सकता है, खासकर सड़कों, सेंसिटिव सरकारी इलाकों और ट्रैफिक से प्रभावित इलाकों में.
अनुमति देने पर विचार करते समय अनुमानित भीड़ का साइज, सिक्योरिटी इंतजाम, ट्रैफिक, आसपास के लोगों की सुविधा और लॉ एंड ऑर्डर जैसे पहलुओं पर विचार किया जा सकता है. दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट की अनुमति के लिए पहले से आवेदन करने के प्रोसेस का भी जिक्र किया. मौजूदा नियमों के तहत आवेदन करने की डेडलाइन और दूसरी शर्तों को संबंधित ऑर्डर में कन्फर्म किया जाना चाहिए.
प्रोटेस्ट साइट को लेकर संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को बोलने की आजादी का अधिकार देता है और अनुच्छेद 19(1)(b) शांति से और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का अधिकार देता है. मगर ये अधिकार पूरी तरह से असीमित नहीं हैं. संविधान पब्लिक ऑर्डर और दूसरे तय आधारों पर सही रोक लगाने की इजाजत देता है.
इसका मतलब है कि नागरिक शांति से अपनी मांगें रख सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने आप हर जगह और हर हाल में विरोध करने का अधिकार नहीं मिल जाता. दूसरी ओर, प्रशासन सिर्फ असहमति या परेशानी के आधार पर नागरिकों के अधिकारों में अपनी मर्जी से कटौती नहीं कर सकता. किसी भी प्रतिबंध का कानूनी आधार और आवश्यकता बहुत जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में जंतर-मंतर पर विरोध से जुड़े मुद्दे पर विचार किया. कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और स्थानीय निवासियों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया. फैसले में यह भी साफ किया गया कि पब्लिक जगहों पर जमावड़े को रेगुलेट किया जा सकता है, लेकिन सभी पब्लिक जगहों पर जमावड़े पर पूरी तरह रोक लगाकर शांति से इकट्ठा होने के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता.
इस कानूनी सिद्धांत के अनुसार, प्रशासन किसी खास जगह पर भीड़, सुरक्षा या ट्रैफिक की चिंताओं के आधार पर नियम बना सकता है. मगर उसे यह पक्का करना होगा कि नागरिकों को अपनी बात कहने का पूरा मौका मिले.
अगर पुलिस किसी प्रोटेस्ट की इजाजत नहीं दे तो क्या होगा?
अगर पुलिस किसी प्रोटेस्ट की इजाजत देने से मना कर दे तो आयोजक संबंधित आदेश और उसके आधार के बारे में जानकारी मांग सकते हैं. हालात के हिसाब से वे प्रशासनिक स्तर पर दोबारा विचार की अपील कर सकते हैं या सही कानूनी रास्ता अपना सकते हैं. हालांकि इजाजत मिलने के बाद भी पाबंदियों को तोड़ने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.
किसी खास मामले में इजाजत न देना सही था या नहीं, यह संबंधित आदेश, उसके तथ्यों और लागू कानून के आधार पर तय किया जाएगा. इसलिए हर मामले में एक ही नियम लागू करना सही नहीं है.