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Analysis: जंतर-मंतर की आवाज पर लगा विराम! जिस सड़क पर गूंजता था लोकतंत्र, अब वहां क्या होगा?

दिल्ली में जंतर-मंतर एक ऐसी जगह है, जहां लोग सिर्फ अपनी मांगें लेकर नहीं आते थे बल्कि उस व्यवस्था से जवाब मांगने आते थे जिसे उन्होंने खुद चुना है. अब जब इसे आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया गया है तो सवाल सिर्फ एक जगह के बंद होने का नहीं बल्कि उस लोकतांत्रिक परंपरा का है जिसने आम नागरिक को सत्ता के करीब अपनी बात कहने का मौका दिया.

Written By Amit Singh
Published: Oct 12, 2026, 04:02 PM IST | Updated: Oct 12, 2026, 04:40 PM IST
Image Credit: जंतर-मंतर के इतिहास को सिर्फ बड़े राजनीतिक आंदोलनों से समझना अधूरा होगा
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दिल्ली की सड़कों पर कभी-कभी बैरिकेड सिर्फ रास्ता नहीं रोकते, वे अपने पीछे खड़े सवालों को भी दुनिया की नजरों से दूर करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं. जंतर-मंतर की कहानी आज कुछ ऐसे ही मोड़ पर आ खड़ी हुई है.

जिस जगह पर सालों से अपनी शिकायतें लेकर पहुंचे लोग सत्ता से जवाब मांगते रहे, जहां किसी के हाथ में संविधान था तो किसी की मुट्ठी में अपनी मांगों का पोस्टर, वहां अब प्रदर्शन की इजाजत नहीं होगी.

12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को नए निर्धारित स्थल बनाया है.

यह फैसला सिर्फ एक सड़क या एक मैदान की प्रशासनिक हैसियत बदलने की घटना नहीं है. यह उस जगह के भविष्य से जुड़ा सवाल है जिसने दशकों तक भारतीय लोकतंत्र के असंतोष को अपने भीतर समेट रखा है.

क्या किसी प्रदर्शन स्थल को बदल देने से असहमति की आवाज भी अपना पता बदल लेती है? क्या नागरिकों की शिकायतों को राजधानी के सत्ता-केंद्र से दूर कर देने पर उन शिकायतों की राजनीतिक अहमियत कम हो जाती है?

और सबसे जरूरी सवाल कि क्या लोकतंत्र में विरोध की जगह केवल वही हो सकती है, जिसकी अनुमति व्यवस्था दे या उस जगह की भी कोई अहमियत है जहां पहुंचकर नागरिक अपनी सत्ता से सीधे संवाद करना चाहते हैं? जंतर-मंतर की कहानी इन सवालों का जवाब खोजने का एक जरूरी बहाना है.

आकाश की गणना से जनता की आवाज तक

जंतर-मंतर का जन्म राजनीतिक धरने के लिए नहीं हुआ था. इसका निर्माण 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने खगोलीय गणनाओं और खगोलीय पिंडों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए कराया था.

उस दौर में जब समय जानने, ग्रहों की चाल समझने और खगोलीय घटनाओं की गणना करने के लिए आधुनिक उपकरण उपलब्ध नहीं थे तब पत्थर और चूने से बनी विशाल संरचनाएं विज्ञान की प्रयोगशाला हुआ करती थीं.

यहां की सम्राट यंत्र जैसी संरचनाएं सूर्य की छाया के आधार पर समय और खगोलीय स्थितियों का अनुमान लगाने में मदद करती थीं. जंतर-मंतर कोई साधारण इमारत नहीं बल्कि उस समय के वैज्ञानिक कौशल और गणितीय समझ का उदाहरण है.

दिल्ली के अलावा जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी सवाई जयसिंह ने वेधशालाएं बनवाई थीं. दिल्ली का जंतर-मंतर आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में एक ऐतिहासिक स्मारक है.

इतिहास की विडंबना देखिए. जिस परिसर को आकाश में ग्रहों और तारों की गति समझने के लिए बनाया गया था, उसके आसपास की सड़क आगे चलकर जमीन पर चल रहे राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों की दिशा समझने का ठिकाना बन गई.

यह बदलाव किसी एक दिन नहीं हुआ. इसके पीछे दिल्ली का भूगोल, सत्ता के केंद्रों का विस्तार, बड़े प्रदर्शनों पर प्रशासनिक नियंत्रण और उन लोगों की जरूरत थी, जिनकी आवाज सामान्य राजनीतिक रास्तों से सत्ता तक नहीं पहुंच पा रही थी.

जंतर-मंतर का भूगोल ही उसकी ताकत

दिल्ली में बहुत से मैदान हैं. रामलीला मैदान में बड़े राजनीतिक सम्मेलन होते रहे हैं. बुराड़ी में विशाल सभाओं के लिए जगह है. लेकिन जंतर-मंतर की अहमियत सिर्फ उसके आकार में नहीं, उसकी लोकेशन में थी.

नई दिल्ली के सत्ता-केंद्र के करीब स्थित यह इलाका संसद मार्ग से जुड़ता है. संसद भवन, केंद्रीय मंत्रालयों और लुटियंस दिल्ली के दूसरे महत्वपूर्ण संस्थानों से इसकी दूरी इतनी कम है कि यहां होने वाला प्रदर्शन राजधानी की राजनीतिक हलचल से अलग नहीं रह सकता.

जंतर-मंतर की सड़क पर खड़ा प्रदर्शनकारी संसद के भीतर बैठे जनप्रतिनिधियों से भले सीधे संवाद न कर पाए लेकिन उसका संदेश सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने की कोशिश जरूर कर सकता था.

लोकतंत्र में भूगोल कई बार राजनीति का चरित्र तय करता है. किसी आंदोलन को संसद के पास जगह देना और उसे शहर के दूरस्थ हिस्से में भेज देना प्रशासनिक नक्शे पर मामूली बदलाव लग सकता है लेकिन प्रदर्शनकारियों के लिए इसका अर्थ बदल सकता है.

एक जगह मीडिया की निगाहों, राजनीतिक कार्यालयों और निर्णय लेने वाले संस्थानों के करीब है, दूसरी जगह पहुंचने के लिए नागरिकों को अतिरिक्त समय, पैसा और परिवहन की व्यवस्था करनी पड़ सकती है.

इसका मतलब यह नहीं कि हर प्रदर्शन संसद के दरवाजे तक पहुंचने का अधिकार रखता है. राजधानी में यातायात, सुरक्षा, स्थानीय निवासियों की सुविधा और सार्वजनिक सेवाओं का निर्बाध संचालन भी जरूरी है.

लेकिन यह भी सच है कि विरोध की जगह तय करते समय दूरी का असर केवल किलोमीटर में नहीं मापा जा सकता. कभी-कभी यही दूरी किसी शिकायत को राष्ट्रीय बहस बनाने और उसे स्थानीय शोर समझकर नजरअंदाज कर देने के बीच फर्क पैदा करती है.

बोट क्लब से जंतर-मंतर तक

आजादी के बाद लंबे समय तक दिल्ली के बड़े राजनीतिक प्रदर्शन इंडिया गेट के आसपास स्थित बोट क्लब के लॉन में हुआ करते थे. सत्ता के केंद्र के करीब स्थित इस जगह पर किसानों से लेकर राजनीतिक दलों तक, अलग-अलग समूह अपनी मांगें लेकर पहुंचते थे.

1988 में भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का विशाल जमावड़ा इस इतिहास का एक अहम पड़ाव बना. किसानों की मांगों को लेकर हुआ यह आंदोलन राजीव गांधी सरकार के सामने ग्रामीण भारत की ताकत का बड़ा प्रदर्शन था. इस तरह के विशाल जमावड़ों ने राजधानी के यातायात और सुरक्षा प्रबंधन को लेकर प्रशासन की चिंताएं भी बढ़ाईं.

समय के साथ बोट क्लब के लॉन पर बड़े प्रदर्शनों को लेकर पाबंदियां बढ़ीं. 1993 तक प्रदर्शन का केंद्र जंतर-मंतर की ओर खिसकने लगा. इस बदलाव के पीछे सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों का उल्लेख मिलता है.

इसके बाद जंतर-मंतर धीरे-धीरे राजधानी में धरने, भूख हड़ताल और छोटे या मध्यम आकार के विरोध प्रदर्शनों का पहचाना हुआ पता बन गया.

यहां पहुंचने वाले लोगों की मांगें एक जैसी नहीं थीं. किसी के लिए मुद्दा भ्रष्टाचार था, किसी के लिए पेंशन, किसी के लिए जमीन, किसी के लिए रोजगार और किसी के लिए न्याय.

कई बार एक-दूसरे से बिल्कुल अलग विचार रखने वाले समूह भी इसी सड़क पर अपनी बात कहते दिखाई देते थे.

जंतर-मंतर की असली पहचान शायद यही थी कि यहां आने के लिए किसी एक विचारधारा, पार्टी या सामाजिक पहचान का सदस्य होना जरूरी नहीं था.

किसी नागरिक को लगता था कि उसकी शिकायत सुनी नहीं जा रही तो वह यहां अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश कर सकता था.

जब एक भूख हड़ताल ने बदली देश की राजनीति

अप्रैल 2011 में अन्ना हजारे ने जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अनशन शुरू किया. भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आंदोलन कुछ ही दिनों में राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया.

मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया और देश के अलग-अलग शहरों में हुए प्रदर्शनों ने इसे एक व्यापक जनआंदोलन का रूप दिया.

अन्ना हजारे का आंदोलन बाद में रामलीला मैदान जैसे बड़े स्थल तक भी पहुंचा. इस आंदोलन से जुड़े कई चेहरे आगे चलकर राजनीति में आए. अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों के राजनीतिक सफर ने भारतीय राजनीति में एक नई पार्टी के उदय का रास्ता बनाया.

2013 में दिल्ली में सरकार बनाने और 2014 के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बदलाव के क्रम को समझने के लिए उस आंदोलन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

यहां एक जरूरी बात समझनी होगी. किसी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसकी हर मांग मान ली गई या उसके सभी समर्थकों को राजनीतिक जीत मिली.

कई बार आंदोलन उन सवालों को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला देते हैं जिन्हें सत्ता और समाज लंबे समय तक टालते रहे हों.

जंतर-मंतर ने ऐसे सवालों को जगह दी. इसने दिखाया कि एक छोटा-सा धरना भी तब बड़ा हो सकता है, जब उसके पीछे व्यापक जनसमर्थन, मीडिया का ध्यान और राजनीतिक व्यवस्था से जवाब मांगने की इच्छा मौजूद हो.

किसान, पहलवान, पूर्व सैनिक और आम लोग

जंतर-मंतर के इतिहास को सिर्फ बड़े राजनीतिक आंदोलनों से समझना अधूरा होगा. इसकी सड़क पर ऐसे लोग भी पहुंचे, जिनके पास न बड़ी पार्टी का संगठन था, न संसाधनों से भरा कोई अभियान और न ही अपनी बात को देशव्यापी बनाने का आसान रास्ता.

मार्च 2017 में तमिलनाडु के किसानों का प्रदर्शन इसका एक यादगार उदाहरण बना. सूखे, कर्ज और राहत की मांगों को लेकर आए किसानों ने अपने विरोध को बेहद प्रतीकात्मक रूप दिया.

खोपड़ियां दिखाने से लेकर आधे मुंडे सिर और अनोखे तरीकों से प्रदर्शन करने तक, उन्होंने दिल्ली का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की. इन दृश्यों के पीछे ग्रामीण संकट, खेती की अनिश्चितता और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने की बेचैनी थी.

इसी तरह, पूर्व सैनिकों ने वन रैंक, वन पेंशन के मुद्दे पर यहां आवाज उठाई. महिला पहलवानों ने भी अपने आरोपों और न्याय की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर धरना दिया.

इन आंदोलनों के मुद्दे और राजनीतिक संदर्भ अलग-अलग थे लेकिन उनके बीच एक साझा बात थी कि वे अपने सवालों को ऐसी जगह उठाना चाहते थे जहां उन्हें अनसुना करना आसान न हो.

जंतर-मंतर की सड़क इसीलिए केवल नारों की जगह नहीं थी. यह उस असमानता का भी आईना थी, जिसमें कुछ आवाजों को सहज ही राष्ट्रीय मंच मिल जाता है जबकि कुछ को अपनी पीड़ा सुनाने के लिए लंबे संघर्ष और असाधारण प्रतीकों का सहारा लेना पड़ता है.

विरोध की आजादी और शहर की मुश्किलें

किसी सार्वजनिक जगह का इतिहास उसे हमेशा के लिए हर तरह के इस्तेमाल का अधिकार नहीं दे देता. जंतर-मंतर के आसपास रहने वाले लोगों की शिकायतें भी सामने आती रही हैं.

शोर, कचरा, यातायात और सार्वजनिक सुविधाओं पर दबाव वास्तविक समस्याएं हैं. एक लोकतांत्रिक शहर को प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों के जीवन और दूसरे लोगों की आवाजाही का भी ध्यान रखना होता है.

अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने जंतर-मंतर रोड पर प्रदर्शनों पर रोक लगाते हुए प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था. इसके बाद 23 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रतिबंध को रद्द कर दिया.

अदालत के फैसले का महत्वपूर्ण सिद्धांत यह था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन उसे पूरी तरह निषिद्ध करना अलग बात है.

बाद में प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के तहत जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों की क्षमता सीमित की गई. भीड़ के आकार, समय, अनुमति और सुरक्षा से संबंधित नियम लागू हुए. बड़े आयोजनों के लिए दूसरे स्थान निर्धारित किए गए.

यह व्यवस्था बताती है कि जंतर-मंतर का इतिहास सिर्फ आंदोलनकारियों और सत्ता के बीच संघर्ष का इतिहास नहीं है. यह नागरिक अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था और शहर के प्रबंधन के बीच संतुलन खोजने की लगातार चलती कोशिश का इतिहास भी है.

मगर संतुलन और निषेध के बीच एक महीन रेखा होती है. व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर ऐसे नियम बनाना जरूरी हो सकता है जो सभी पर समान रूप से लागू हों. लेकिन अगर नियमों के जरिए विरोध की व्यावहारिक संभावना ही समाप्त होने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है.

जब जंतर-मंतर के भविष्य पर ही सवाल

अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी सहित कुछ समूहों के प्रदर्शन के प्रयासों ने जंतर-मंतर के भविष्य को फिर बहस के केंद्र में ला दिया.

दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया. 10 अक्टूबर को राजधानी में व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण और वैध प्रदर्शन करने वालों के लिए बुनियादी सुविधाओं की जरूरत पर जोर देते हुए वैकल्पिक स्थलों की पहचान का सवाल उठाया. अदालत के सामने यह मुद्दा भी आया कि क्या जंतर-मंतर सामान्य प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान बना हुआ है.

यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत में किसी विकल्प पर विचार करना और किसी अधिकार को समाप्त करने का अंतिम फैसला एक ही बात नहीं है. अब 12 अक्टूबर को जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा सीबीडी ग्राउंड को नए स्थलों के रूप में निर्धारित करने का फैसला सामने आया है.

प्रशासन के लिए इसके पीछे सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सवाल हैं लेकिन नागरिक अधिकारों के नजरिए से सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नए स्थान प्रदर्शनकारियों की जरूरतों को वास्तव में पूरा कर पाएंगे.

क्या वहां मीडिया की पहुंच होगी? क्या बुजुर्गों, किसानों, दिव्यांगों और दूरदराज से आए नागरिकों के लिए पर्याप्त सुविधाएं होंगी? क्या अनुमति की प्रक्रिया पारदर्शी होगी? क्या अलग-अलग राजनीतिक विचार रखने वाले समूहों को समान नियमों के तहत प्रदर्शन का अवसर मिलेगा?

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह बदलाव केवल जगह का पुनर्निर्धारण है या विरोध की राजनीति के स्वरूप में बड़ा परिवर्तन भी है.

जगह बदलेगी तो क्या शिकायत भी बदल जाएगी?

जंतर-मंतर को लेकर सबसे आसान निष्कर्ष यह निकालना होगा कि एक पुराना प्रदर्शन स्थल बंद हुआ और तीन नए स्थल खुल गए. लेकिन लोकतंत्र की कहानी इतनी सीधी नहीं होती.

सार्वजनिक स्थान केवल जमीन के टुकड़े नहीं होते. समय के साथ वे स्मृतियों, संघर्षों और नागरिक अनुभवों से अर्थ ग्रहण करते हैं.

किसी किसान के लिए यह वह जगह हो सकती है जहां वह अपनी फसल और कर्ज की समस्या लेकर राजधानी पहुंचा. किसी पूर्व सैनिक के लिए यह अपने सम्मान और पेंशन की मांग का प्रतीक हो सकती है.

किसी महिला के लिए यह न्याय की उम्मीद का मंच हो सकता है. किसी छात्र के लिए पहली बार यह समझने की जगह कि लोकतंत्र में सवाल पूछना भी नागरिक होने का हिस्सा है.

इसीलिए जंतर-मंतर की अहमियत को केवल इस कसौटी पर नहीं परखा जा सकता कि वहां कितने लोगों के बैठने की जगह है या वहां से कितनी गाड़ियां गुजरती हैं. यह भी देखना होगा कि उस जगह ने नागरिकों और सत्ता के बीच किस तरह का संबंध बनाया.

बेशक, किसी भी आंदोलन को कानून के दायरे में रहना चाहिए. शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का अर्थ हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं है.

प्रशासन का दायित्व है कि वह सुरक्षा सुनिश्चित करे और शहर का सामान्य जीवन बाधित न होने दे. लेकिन नागरिकों का अधिकार भी महज कागज पर दर्ज एक वाक्य नहीं होना चाहिए. उसके इस्तेमाल के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो निष्पक्ष, व्यावहारिक और सुलभ हो.

जंतर-मंतर की घड़ी ने कभी आसमान में सूर्य की चाल बताई थी. बाद के वर्षों में इस जगह ने देश की राजनीति में उठती बेचैनी और बदलते समय के संकेत भी दिखाए.

अब जब इसका आधिकारिक पता प्रदर्शन स्थलों की सूची से हट गया है तो असली परीक्षा उन नई जगहों की होगी जिन्हें इसकी जगह चुना गया है.

इतिहास हमें बताता है कि आवाजों को सुनने के लिए हमेशा एक ही मैदान जरूरी नहीं होता. लेकिन यह भी बताता है कि आवाजों के लिए कोई सार्थक मंच न हो तो असंतोष रास्ते तलाशता रहता है.

जंतर-मंतर की सड़क पर अब पहले जैसी भीड़ दिखाई दे या न दे, वहां उठे सवाल इतनी आसानी से विदा नहीं होंगे.

लोकतंत्र की असली मजबूती इस बात में नहीं है कि उसकी सड़कों पर कितने लोग खामोश खड़े हैं. उसकी मजबूती इस बात में है कि असहमति रखने वाला नागरिक अपनी बात कह सके. उसकी बात सुनी जा सके और व्यवस्था उसे जवाब देने के लिए तैयार रहे.

क्योंकि प्रदर्शन की जगह बदली जा सकती है लेकिन उस शिकायत का भूगोल कौन बदलेगा जो किसी नागरिक को घर से निकलकर सत्ता के दरवाजे तक आने के लिए मजबूर करती है?

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About the Author

अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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