जामिया: आइए 20 साल पीछे चलते हैं... जब आखिरी छात्रसंघ चुनाव हुआ, वो चुनाव भी 9 साल बाद हुआ था!
जामिया में छात्रसंघ चुनाव होने और रुक जाने की कहानी लंबी है. ये उन आवाजों की दास्तान भी है जो समय-समय पर अपने प्रतिनिधित्व के लिए उठती रहीं. 1981-82 में शुरू हुआ चुनावों का सिलसिला विवादों, टकरावों और लंबे विराम से गुजरता हुआ 2005 में लौटा, लेकिन फिर थम गया. इस बीच कैंपस ने आंदोलन देखे, अदालतों की चौखट पर पहुंचती उम्मीदें देखीं. मगर अब क्या हुआ?
दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया पिछले कई दिनों से चर्चा में है. छात्रों की मांग के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने फैसला लिया और करीब 20 साल बाद छात्रसंघ चुनाव का रास्ता खुलता दिख रहा है. सोमवार को विश्वविद्यालय प्रशासन ने आदेश जारी कर कहा कि छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराए जाएंगे. यह घोषणा ऐसे समय में हुई, जब कैंपस में 12 अक्टूबर से छात्रसंघ बहाली की मांग को लेकर प्रदर्शन और भूख हड़ताल चल रही है. छात्रों की ये मांग नई नहीं है. जामिया में छात्रसंघ चुनावों का विवाद ऐतिहासिक है. समझना जरूरी है कि ये चुनाव कब शुरू हुए, किन घटनाओं के बाद बंद हुए और दो दशक बाद इन्हें बहाल करने की कवायद क्यों और कैसे हुई.
असल में हाल फिलहाल जो प्रोटेस्ट चल रहा है उसमें छात्रों की मांग है कि विश्वविद्यालय में ऐसा निर्वाचित छात्रसंघ हो, जो हॉस्टल, फीस, खाने और दूसरे छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को प्रशासन के सामने उठा सके. लेकिन जामिया में छात्रसंघ चुनाव का इतिहास सिर्फ चुनाव होने और बंद होने की कहानी नहीं है. इसके पीछे प्रशासन और छात्रों के बीच टकराव, विवादित मुद्दे, अदालती लड़ाई और लंबे आंदोलन भी रहे हैं.
1981-82 में पहली बार चुना गया छात्रसंघ
जामिया में छात्रसंघ चुनाव का रिकॉर्ड कम से कम 1981-82 तक जाता है. विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव का जो बोर्ड लगा हुआ रहता है उसमें पहला चुनाव इसी साल का दर्ज है. 1981-82 की चुनावी व्यवस्था में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव चुने गए. 1981-82 के अध्यक्ष जुबैर खान, उपाध्यक्ष इरफान अली खान, सचिव आफताब अहमद और संयुक्त सचिव जलालुद्दीन का नाम दर्ज है. इसके बाद ये सिलसिला कई सालों तक चला. 1996-97 तक चुनाव हुए
1992 में 'सैटेनिक वर्सेज' पर विवाद, चर्चा में रहे कुलपति
नब्बे के दशक की शुरुआत में जामिया में छात्रसंघ और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच तनाव का एक बड़ा उदाहरण सलमान रुश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेज को लेकर सामने आया. हुआ यह था भारत सरकार ने 1988 में इस किताब के आयात पर प्रतिबंध लगाया था. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 1992 में जामिया के तत्कालीन प्रो-वाइस चांसलर और इतिहासकार मुशीरुल हसन ने प्रतिबंध के खिलाफ सैद्धांतिक रूप से अपनी राय रखी. इसके बाद छात्रों के एक वर्ग ने उनके खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया.
मुशीरुल हसन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे व्यक्तिगत रूप से किताबों पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं, भले ही इस किताब से मुस्लिम समुदाय की भावनाएं आहत हुई हों. मुशीरुल हसन का यह बयान एक संतुलित उदारवादी दृष्टिकोण था मगर जामिया के रूढ़िवादी छात्रों, कट्टरपंथियों और कुछ स्थानीय राजनेताओं ने इसे इस्लाम का अपमान मान लिया था.
तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष बदरुद्दीन कुरैशी ने हसन के इस्तीफे की मांग की और परीक्षाओं के बहिष्कार का ऐलान किया. मामला इतना बढ़ा कि मई 1992 में विश्वविद्यालय बंद करना पड़ा. उस समय की एक रिपोर्ट के मुताबिक हसन को धमकियां मिलीं और उन्हें कैंपस में प्रवेश करने से भी परहेज करना पड़ा. यह विवाद जामिया में अभिव्यक्ति की आजादी, धार्मिक भावनाओं और छात्र राजनीति के बीच टकराव की एक अहम मिसाल बना.
इस घटना के कुछ समय बाद तक टकराव बना रहा. फिर 1996 में चुनावों पर रोक लग गई. हालांकि ये एकमात्र घटना नहीं थी जिसकी वजह से चुनाव पर रोक लगी. टकराव के कई कारण थे.
1996-97 में अचानक थम गई चुनावी प्रक्रिया
जामिया के छात्रसंघ चुनावों के इतिहास में 1996-97 का दौर चर्चित रहा. इसके बाद चुनावी सिलसिला रुक गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक 1996 के बाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए और इसकी जगह प्रशासन ने छात्र प्रतिनिधित्व के दूसरे तरीकों पर जोर देना शुरू किया. चुनाव रोकने की वजह को लेकर प्रशासन और छात्रों के बीच मतभेद रहे.
जामिया विश्वविद्यालय की तरफ से छात्रसंघ की गतिविधियों, प्रशासनिक मामलों में कथित दखल और कैंपस के शैक्षणिक माहौल पर असर पड़ने जैसी चिंताएं जताई गईं. हालांकि 1996 में रोक लगाने के फैसले का सटीक कारण बताने वाला कोई क्लियर रिकॉर्ड सामने नहीं आया और ना ही प्रशासन ने बताया मगर टकराव का हवाला देते हुए चुनाव रोके गए.
नौ साल बाद 2005 में फिर हुआ चुनाव
करीब नौ साल के अंतराल के बाद जामिया में दिसंबर 2005 में छात्रसंघ चुनाव कराए गए. ये संयोग ही था कि विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति मुशीरुल हसन ने चुनाव की अनुमति दी थी. इस चुनाव में शम्स परवेज अध्यक्ष चुने गए. रिकॉर्ड में 2005-06 के लिए अध्यक्ष शम्स परवेज, सचिव फरहत अली और संयुक्त सचिव जिल्ली सुब्हानी के नाम दर्ज हैं.
इस चुनाव से छात्रों को उम्मीद जगी कि कैंपस में निर्वाचित छात्रसंघ की व्यवस्था दोबारा मजबूत होगी. मगर यह वापसी ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी. चुनाव के कुछ महीनों बाद ही छात्रसंघ के भविष्य को लेकर प्रशासन और निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच फिर टकराव सामने आने लगा.
31 मार्च 2006 को सील कर दिया गया छात्रसंघ कार्यालय
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2005 में चुनाव होने के बाद 31 मार्च 2006 को जामिया छात्रसंघ का कार्यालय सील कर दिया गया. इसके बाद से विश्वविद्यालय में दोबारा छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए. प्रशासन का कहना रहा है कि कैंपस में हिंसक झड़पों, शिक्षकों पर हमलों और पढ़ाई में व्यवधान की घटनाओं के कारण छात्रसंघ को भंग किया गया.
2012 में संसद में दिए गए सरकारी जवाब में भी विश्वविद्यालय की तरफ से बताया गया था कि कई हिंसक घटनाओं के बाद छात्रसंघ भंग हुआ था और इन घटनाओं में आखिरी घटना कुलपति पर हमले की थी. पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष शम्स परवेज ने इस फैसले के पीछे प्रशासनिक हितों को लेकर सवाल उठाए थे. एक रिपोर्ट में उन्होंने दावा किया कि छात्रसंघ ने दाखिले और नियुक्तियों से जुड़ी कथित गड़बड़ियों के मुद्दे उठाए थे. परवेज के मुताबिक 31 मार्च तक कैंपस में ऐसी हिंसा नहीं हुई थी, जिसके आधार पर कार्यालय सील करने का फैसला उचित ठहराया जा सके.
2006 के बाद भी टकराव, आंदोलन और आरोप-प्रत्यारोप
छात्रसंघ कार्यालय सील होने के बाद विवाद खत्म नहीं हुआ. जुलाई 2006 में दाखिले से जुड़े एक मुद्दे पर तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष शम्स परवेज और कुछ अन्य छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ मारपीट के आरोप लगाए. परवेज का कहना था कि वह दाखिले में कथित गड़बड़ी का मुद्दा उठाने कुलपति कार्यालय गए थे, जहां उनके साथ मारपीट हुई. इसके बाद कैंपस में तोड़फोड़ और वाहनों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आईं.
इन घटनाओं के बीच 2006 में छात्रसंघ कार्यालय सील कर दिया गया. हालांकि छात्रसंघ पर रोक की वजह पर आज भी दोनों पक्षों के दावों में अंतर है. बाद के वर्षों में भी छात्रों ने चुनाव बहाल करने की मांग उठाई. 2011 में इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया. छात्रों का तर्क था कि विश्वविद्यालय में निर्वाचित छात्रसंघ न होने से उनके पास साझा समस्याओं को प्रशासन के सामने रखने के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक मंच नहीं है.
2017 में भूख हड़ताल, फिर अदालत में पहुंचा मामला
छात्रसंघ की बहाली की मांग 2017 में भी तेज हुई. सितंबर में एक छात्र मीरान हैदर ने निर्वाचित छात्रसंघ की मांग को लेकर भूख हड़ताल की. उस समय की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक करीब दस दिन चले इस आंदोलन के दौरान नौवें दिन तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और उन्होंने हड़ताल समाप्त कर दी. उस दौर में प्रशासन ने चुनाव कराने के रास्ते में अदालत में मामला लंबित होने और कानूनी अड़चनों का हवाला दिया.
ठीक उसी साल विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के बजाय छात्र परिषद बनाने का प्रस्ताव भी चर्चा में आया था. इस व्यवस्था में कक्षा प्रतिनिधियों के जरिए कुछ पदों पर चुनाव कराने की बात थी, लेकिन छात्रों के एक वर्ग ने इसका विरोध किया. उनका तर्क था कि विभाग या कक्षा स्तर की प्रतिनिधि व्यवस्था पूरे विश्वविद्यालय के छात्रों की तरफ से चुने गए अध्यक्ष वाले छात्रसंघ का विकल्प नहीं हो सकती. इस तरह चुनाव की मांग सिर्फ एक संगठन को बहाल करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस बात पर भी बहस हुई कि छात्रों को प्रतिनिधि चुनने का कितना अधिकार मिलना चाहिए.
2022 में हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा किया
उधर जामिया छात्रसंघ चुनाव का मामला दिल्ली हाईकोर्ट में भी लंबे समय तक चलता रहा. 2011-12 के दौरान चुनाव बहाल कराने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर की गईं. इनमें विश्वविद्यालय में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग की गई थी. 20 दिसंबर 2022 को हाईकोर्ट ने चुनाव से जुड़ी एक जनहित याचिका का निपटारा कर दिया.
सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय की तरफ से कहा गया कि छात्रसंघ पहले ही भंग किया जा चुका है और चुनाव कराने का सवाल नहीं उठता. अदालत ने विश्वविद्यालय को चुनाव कराने का निर्देश नहीं दिया. हालांकि इस आदेश का अर्थ यह भी नहीं था कि भविष्य में चुनाव कराए ही नहीं जा सकते. इसके बाद भी निर्वाचित छात्रसंघ बहाल करने की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई.
यहां गौर करने वाली बात यह है कि इसके बाद भी विश्वविद्यालय में विभागीय स्तर पर छात्र प्रतिनिधि चुने जाते रहे, लेकिन पूरे कैंपस के लिए एक साझा निर्वाचित छात्रसंघ नहीं बन पाया.
2026 में फिर आंदोलन और भूख हड़ताल
अक्टूबर 2026 में जामिया में छात्रसंघ की बहाली की मांग ने फिर जोर पकड़ लिया. 12 अक्टूबर से छात्रों ने प्रदर्शन और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की. आंदोलन के दौरान जामिया में रिसर्च से जुड़े एक छात्र दीपांकर ने बताया कि छात्रों का ये कहना है कि विभागीय प्रतिनिधित्व से पूरे विश्वविद्यालय की समस्याओं को एक मंच पर उठाना संभव नहीं है. हॉस्टल, फीस, दाखिले, खाने और दूसरे छात्र हितों से जुड़े मुद्दों पर प्रशासन के सामने प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने के लिए निर्वाचित छात्रसंघ जरूरी है.
आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई छात्रसंघ व्यवस्था बहाल की जाए. इस बीच प्रशासन ने प्रदर्शन कर रहे कुछ छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की. विश्वविद्यालय ने अपने रुख में कैंपस में हिंसा और शैक्षणिक गतिविधियों में व्यवधान के पुराने मामलों का हवाला दिया.
अब क्या बदलेगा? संविधान की मंजूरी के 15 दिन बाद चुनाव
फिलहाल करीब दो दशक के विवाद के बाद 26 अक्टूबर 2026 को जामिया प्रशासन की ओर से जारी आदेश ने छात्रसंघ चुनाव की उम्मीद फिर जगा दी है. आदेश के मुताबिक पहले छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी दी जाएगी और उसके 15 दिनों के भीतर चुनाव कराए जाएंगे. यानी चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए संविधान की मंजूरी एक अहम चरण होगी. हालांकि आदेश जारी होने का मतलब यह नहीं है कि मतदान की तारीख तय हो चुकी है.
अब इसके लिए संविधान को मंजूरी देने और चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया से जुड़े अगले कदमों का इंतजार करना होगा. जामिया में इस समय विभागीय स्तर पर छात्र प्रतिनिधि चुने जाते हैं, लेकिन विश्वविद्यालय-स्तर पर अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारियों वाला निर्वाचित छात्रसंघ करीब 20 साल से अस्तित्व में नहीं है. अब देखना होगा कि प्रशासन और छात्रों के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद किस तरह सुलझता है और क्या इस बार चुनाव नियमित रूप से कराने की व्यवस्था बन पाती है.
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