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Delhi News: यमुना के प्रदूषण को लेकर हमेशा बातें होती हैं, लेकिन क्या आपको पता है ये प्रदूषण नदी के पानी तक सीमित नहीं है. यमुना के किनारे खेती के लिए यूज होने वाले दूषित पानी अब सब्जियों की क्वालिटी को लेकर सावल खड़े कर रहे हैं. एक स्टडी में यमुना किनारे के एरिया में उगाई जाने वाली सब्जियों में कई भारी धातुओं (Heavy Metals) की मौजूदगी पाई गई है. रिसर्चर्स ने कुछ सब्जियों में इन धातुओं का स्तर निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा बताया है. ऐसे में सवाल बनता है कि युमना के किनारे उगाई जाने वाली सब्जियां कितनी सुरक्षित हैं? Heavy Metals क्या होते हैं और इससे कितना खतरा हो सकता है?
Heavy Metals क्या होते हैं?
Heavy Metals यानी भारी धातुएं. ये ऐसे धात्विक तत्व हैं, जिनमें से कुछ बहुत कम मात्रा में शरीर के लिए जरूरी हो सकते हैं. वहीं इसका ज्यादा होना शरीर में पहुंचने पर नुकसान पहुंचा सकते हैं. इनमें सीसा (Lead), कैडमियम (Cadmium), क्रोमियम (Chromium), निकेल (Nickel), एल्युमिनियम (Aluminium), जिंक (Zinc) और मोलिब्डेनम (Molybdenum) जैसे तत्व शामिल हैं.
यमुना की सब्जियों में Heavy Metals कैसे पहुंचे?
एक स्टडी के अनुसार, यमुना किनारे खेती बिना उपचार किए गए गंदे पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस पानी में मौजूद अलग-अलग रासायनिक तत्व और भारी धातुएं सिंचाई के दौरान खेतों की मिट्टी में पहुंच सकती हैं. इसके बाद पौधों की जड़ें मिट्टी से पानी और पोषक तत्वों के साथ इन धातुओं को भी अवशोषित कर सकती हैं.
यही कारण है कि समय के साथ कुछ धातुएं पौधों के अलग-अलग हिस्सों में जमा होने लगती हैं. इसको जैव-संचयन (Bioaccumulation) कहा जाता है. आसान शब्दों में समझें तो जब कोई जीव किसी पदार्थ को अपने खाने या पानी से जितनी तेजी से बाहर निकालता है, उससे ज्यादा तेजी से उसे अपने शरीर में जमा करता है, तो इसे जैव-संचयन कहते हैं
किन सब्जियों में कितना Heavy Metal मिला?
वहीं जब इस सब्जियों की जांच की गई, तो कुछ में तय सीमा से काफी ज्यादा धातुएं पाए गए.
प्याज में निकेल का लेवल तय सीमा से करीब 65% ज्यादा पाया गया है.
पालक में निकेल का स्तर करीब 97% ज्यादा है.
सफेद मूली में क्रोमियम करीब 11% ज्यादा पाया गया.
पालक में क्रोमियम करीब 12 गुना और सरसों में करीब 22 गुना ज्यादा दर्ज किया गया.
लाल मूली में मोलिब्डेनम 340.06 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम और क्रोमियम 36.58 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक पाया गया.
मेथी में जिंक 177.72 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक देखने को मिला है.
धनिया में निकेल 19.91 और कैडमियम 1.59 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम पाया गया.
सरसों में सीसे की मात्रा 5.86 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक दर्ज की गई.
ये शरीर में कैसे पहुंचते हैं?
ये धातू शरीर में खाने के रास्ते से जाते हैं. अगर दूषित पानी में उगाई गई सब्जियों में भारी धातुएं जमा हो जाएं और उन्हें पर्याप्त तरीके से साफ किए बिना खाया जाए, तो ये शरीर में जा सकती हैं. इसके अलावा दूषित पानी या धूल के संपर्क जैसे दूसरे रास्ते भी कुछ परिस्थितियों में जरूरी हो सकते हैं. शरीर में जाते ही अलग-अलग धातुओं का असर अलग-अलग हो सकता है.
सीसा किसी के लिए खतरनाक हो सकता है. लंबे समय तक बच्चों के इसके संपर्क में रहने से बच्चों के लिए चिंता का विषय माना जाता है. वहीं कैडमियम का लंबे समय तक संपर्क किडनी और हड्डियों पर असर डाल सकता है. इसके अलावा निकेल और क्रोमियम की की ज्यादा मात्रा स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां खड़ी कर सकती हैं.
क्या इससे कैंसर का खतरा भी है?
स्टडी में सब्जियों को लेकर सेहत से जुड़ी जोखिम का आकलन भी किया गया. कई सब्जियों के लिए Hazard Index सुरक्षित सीमा से ऊपर था. वहीं स्टडी में कैंसर से जुड़े जोखिम को भी देखा गया. लाल मूली में ये जोखिम 0.17, धनिया में 0.16 और पालक तथा सफेद मूली में 0.14 दर्ज किया गया. शोधकर्ताओं के अनुसार इस आकलन में निकेल और क्रोमियम का योगदान प्रमुख रहा.
यहां ये समझना जरूरी होगा कि किसी स्टडी में कैंसर जोखिम का अनुमान सामने आना और किसी व्यक्ति को कैंसर होना एक ही बात नहीं है. इस तरह के जोखिम वाले आंकड़े आम तौर पर लंबे समय तक किसी पदार्थ के संपर्क के आधार पर संभावित जोखिम का आकलन करते हैं.
क्या सब्जियां खाना बंद कर दें?
वहीं स्टडी को देखते हुए सारी सब्जियों को दूषित मानना सही नहीं होगा. टेंशन मुख्य रूप से उन क्षेत्रों की सब्जियों को लेकर है, जहां दूषित या बिना उपचार किए गए पानी से लगातार सिंचाई होती है. सब्जियों को बहते साफ पानी में अच्छी तरह धोना मिट्टी और सतह पर मौजूद कुछ प्रदूषकों को कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन केवल धोने से पौधे के अंदर जमा भारी धातुएं पूरी तरह खत्म नहीं होतीं. इसलिए समस्या का स्थायी समाधान खेत तक पहुंचने वाले दूषित पानी और प्रदूषण के स्रोतों को कंट्रोल करना है.
किसानों के लिए क्या समाधान सुझाया गया?
अध्ययन का नेतृत्व दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रो. दिनबंधु साहू ने किया. शोधकर्ताओं ने प्रदूषण प्रभावित इलाकों में मिट्टी और फसलों की नियमित निगरानी की जरूरत बताई है. इसके साथ ही यमुना में प्रदूषण पहुंचाने वाले स्रोतों पर कंट्रोल और किसानों को ऐसी फसलों की ओर ले जाने का सुझाव दिया गया है, जिनमें भारी धातुओं का जमा होना अपेक्षा से कम होगा.