SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

एक था जंतर-मंतर! आंदोलनों की धड़कन थी जो जगह.. वो अब प्रदर्शनकारियों के लिए बंद

1988 के किसान आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे और महिला पहलवानों के प्रदर्शनों तक, जंतर-मंतर दिल्ली की लोकतांत्रिक आवाज का केंद्र रहा. मगर अब प्रतिबंधों और नए प्रदर्शन स्थलों के फैसले ने इसके भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

Written By Gaurav Pandey
Published: Oct 12, 2026, 09:39 PM IST | Updated: Oct 12, 2026, 09:44 PM IST
Image Credit: Z CREATIVE
Join

Delhi News: 1990 के दशक से पहले दिल्ली के इंडिया गेट के समीप बोट क्लब लॉन प्रदर्शनकारियों का सर्वाधिक प्रिय स्थल था. इसका कारण क्लियर था. ये जगह राजपथ, प्रधानमंत्री और कुछ केंद्रीय मंत्रियों के कार्यालयों और राष्ट्रपति भवन के निकट थी.  1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने भी आंदोलन के लिए बोट क्लब लॉन का ही चयन किया.

25 से 31 अक्टूबर 1988 के बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग पांच लाख किसान वहां एकत्र हुए. गन्ना किसानों की यह ऐतिहासिक रैली टिकैत के नेतृत्व में हुई. इसके बाद दिल्ली में आंदोलनों का केंद्र बदल गया. बोट क्लब की जगह इंडिया गेट से मात्र चार किलोमीटर दूर जंतर-मंतर नया प्रदर्शन-स्थल बन बैठा.

असल में 1993 में केंद्र सरकार ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगा दिया. इन चिंताओं में संसद, नॉर्थ-साउथ ब्लॉक और राष्ट्रपति भवन की निकटता शामिल रही.

किसी औपचारिक कानून या अधिसूचना के बिना ही जंतर-मंतर रोड प्रदर्शनों के लिए व्यावहारिक एवं वैकल्पिक स्थान के रूप में स्वीकार कर लिया गया. संसद के निकट होने के बावजूद यह स्थान नियंत्रित और सीमित था, जिससे पुलिस के लिए भीड़ का प्रबंधन अपेक्षाकृत सुगम हो गया.

जंतर-मंतर का उज्बेक कनेक्शन
दिल्ली का जंतर-मंतर 1734 में पूर्ण हुआ. इसका निर्माण 1728 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने आरंभ करवाया था. यह उज्बेकिस्तान के समरकंद स्थित वेधशाला से प्रेरित था.

दरअसल मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला (1719-1748) के शासनकाल में हिंदू एवं मुस्लिम खगोलशास्त्रियों के बीच ग्रहों की स्थिति को लेकर विवाद शुरू हो गया था. इसी विवाद के समाधान के लिए सवाई जय सिंह ने जंतर-मंतर का निर्माण कराया.

ग्रहों की गति मापने के लिए यहां अनेक प्रकार के यंत्र स्थापित किए गए. 2010 में इस वेधशाला को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया. हालांकि आज आस-पास ऊंची इमारतों के कारण ये यंत्र अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाते. फिर भी यह स्थान लोकतांत्रिक विरोध का जीवंत प्रतीक बना हुआ है.

अपनी किताब गांधी के बाद भारत में रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि वर्तमान कर्तव्य पथ (पहले राजपथ) के दोनों ओर बोट क्लब लॉन फैला हुआ था. ब्रिटिश काल में इसे किंग्सवे कहा जाता था. 1990 के दशक के आरंभ तक यह लॉन राजनीतिक-सामाजिक विरोध का प्रमुख केंद्र रहा.

यहां देश के अलग-अलग प्रदेशों से आए लोगों के तंबू लगते थे. परंतु उसी दशक में बोट क्लब लॉन को आंदोलनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया.

इस सरकारी निर्णय के बाद जंतर-मंतर का युग आरंभ हुआ. कनॉट प्लेस के निकट स्थित यह स्थान संसद और सरकारी कार्यालयों से अधिक दूर नहीं है. आस-पास की भीड़-भाड़ प्रदर्शनकारियों की मांगों को जन-सामान्य तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होती है.

2011 का जंतर मंतर
फिर अप्रैल 2011 में दिल्ली का जंतर-मंतर देश की सामूहिक स्मृति में स्थायी रूप से अंकित हो गया. सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और उनके समर्थक जन-लोकपाल की मांग को लेकर अनशन पर बैठे. भ्रष्टाचार-विरोधी यह मुहिम राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन गई. यहीं से आम आदमी पार्टी का राजनीतिक जन्म हुआ, जिसकी वर्तमान में पंजाब में सरकार है, जबकि दिल्ली में उसकी सत्ता का पतन हो चुका है.

2012 में निर्भया कांड के विरोध-प्रदर्शन का आधार भी जंतर-मंतर ही बना. यहीं से महिला सुरक्षा का प्रश्न पूरे देश के सामने उपस्थित हुआ और संसद को मध्यरात्रि तक जागकर महिला सुरक्षा कानून पारित करना पड़ा. इसे जिसे निर्भया एक्ट भी कहा जाता है.

इसके बाद 2015 का वन रैंक वन पेंशन आंदोलन, 2017 में तमिलनाडु के किसानों का धरना, 2019-2020 का नागरिकता संशोधन अधिनियम विरोधी प्रदर्शन, 2021 की किसान संसद, 2023 में महिला पहलवानों का विरोध और 2026 में नीट परीक्षा के प्रश्न पर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन सब जंतर-मंतर की भूमि पर ही हुए.

फिर आया 2017
आज स्थिति है कि जंतर-मंतर खगोलीय वेधशाला के रूप में निष्क्रिय है. लेकिन इसे आंदोलन-स्थल के रूप में निष्क्रिय करने की नींव अक्टूबर 2017 में पड़ी जब राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने आदेश दिया कि विभिन्न आंदोलनों के कारण यहां ध्वनि प्रदूषण और गंदगी फैलती है तथा स्थानीय निवासियों को असुविधा होती है; अतः इसे बंद कर दिया जाए.

इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई. 23 जुलाई 2018 को सुनवाई करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर रोक लगाना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) एवं 19(1)(ख) के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह स्थानीय निवासियों और आंदोलनकारियों के अधिकारों में संतुलन स्थापित करे.

इस आदेश के बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हेतु कुछ प्रतिबंध लगाए. स्टैंडिंग ऑर्डर के अनुसार इच्छुक व्यक्ति, समूह या दल को धरना-प्रदर्शन से कम से कम दस दिन पूर्व डीसीपी कार्यालय में लिखित आवेदन देना अनिवार्य है.

आवेदन में आयोजक की पहचान, उद्देश्य, अनुमानित संख्या, समय और वक्ताओं की सूची का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए. भीड़ की सीमा भी निर्धारित कर दी गई. जंतर-मंतर पर अधिकतम एक हजार लोग ही एकत्र हो सकते हैं. एक हज़ार से पचास हज़ार तक की भीड़ के लिए रामलीला मैदान तथा पचास हज़ार से अधिक के लिए बाहरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान निर्धारित किया गया.

धरना-प्रदर्शन का समय प्रातः दस बजे से सायं पांच बजे तक सीमित कर दिया गया तथा रात्रि में ठहरने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. सेंट्रल विस्टा क्षेत्र इंडिया गेट, राजपथ/कर्तव्य पथ, जनपथ आदि पर प्रदर्शन पूर्णतः निषिद्ध कर दिया गया. तंबू और लाउडस्पीकर के लिए अलग अनुमति आवश्यक बनाई गई.

यातायात बाधित न करना, सफाई बनाए रखना तथा पशु या ट्रैक्टर न लाना जैसी अन्य शर्तें भी जोड़ी गईं. इनका उल्लंघन करने पर बीएनएसएस की धारा 163 के अंतर्गत कानूनी कार्रवाई संभव है.

फिर छिड़ा दंगल
आज मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली की सड़कों पर दंगल छिड़ा हुआ है. केंद्र जंतर-मंतर ही था लेकिन पुलिस बंदोबस्त ने प्रदर्शनकारियों को वहां पहुंचने से रोक दिया. वर्तमान में यहां धरना-प्रदर्शन-आंदोलन पर प्रतिबंध है.

ऐसी स्थिति में यदि आंदोलन आवश्यक हो, तो जंतर-मंतर से तीन किलोमीटर दूर रामलीला मैदान, अठारह किलोमीटर दूर बुराड़ी मैदान तथा बारह किलोमीटर दूर पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड उपलब्ध हैं.

अब आंदोलनों के लिए जंतर-मंतर अतीत की स्मृति मात्र है या फिर जय सिंह द्वितीय के स्थापत्य की तरह दिल्ली में घूमने-फिरने की जगह.

ये भी पढ़ें: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन बंद करने का फैसला कितना कानूनी? जानें क्या सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश से मेल खाता है यह निर्णय

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

Gaurav is a multimedia journalist writing across a wide range of subjects, including politics, sports, cinema, explainers, opinion and Delhi Haryana civic issues. With analysis, he regularly covers social issues and public policy through in-depth. With around nine years of experience, he has worked with India Today, Hindustan Times, and Network18, producing stories with a strong focus on facts and ground reality. He studied journalism at IIMC Delhi.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES