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Delhi News: दिल्ली हाईकोर्ट ने नाबालिग पत्नी से यौन संबंध के मामले में अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि अगर किसी मुस्लिम व्यक्ति की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार हुई है तो सिर्फ इस आधार पर उसे 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने के मामले में आपराधिक कार्रवाई से छूट नहीं मिल सकती. कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानून बच्चों को दिए गए वैधानिक संरक्षण को खत्म नहीं कर सकता.
जस्टिस संजीव नरूला ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ, POCSO एक्ट और BNS 2023 में बच्चों को दी गई कानूनी सुरक्षा को खत्म नहीं कर सकता.
इस केस में एक व्यक्ति ने 16 साल 3 महीने की लड़की से शादी की थी. उस समय पुरुष की उम्र 28 साल थी. शादी के बाद दोनों साथ रहने लगे और महिला गर्भवती हो गई. गर्भावस्था के दौरान सरकारी अस्पताल में जांच के समय उसकी उम्र का पता चला. अस्पताल में उसकी उम्र पता चलने पर पुलिस ने BNS Section 64(1) और POCSO Section 6 के तहत FIR दर्ज की.
महिला ने कोर्ट में कहा कि शादी उसकी इच्छा से हुई थी और दोनों परिवारों की सहमति थी. उसने यह भी कहा कि उस पर किसी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं हुई थी. उसने पति को जमानत देने और गर्भावस्था के दौरान उसके साथ रहने की इजाजत देने की मांग की.
पति और पत्नी ने FIR रद्द करने की मांग की. उनका तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, अगर लड़की यौन परिपक्वता की स्टेज (Puberty) पा चुकी है तो वह शादी कर सकती है. इसलिए शादी वैध होने के कारण पति-पत्नी के बीच बने यौन संबंध को अपराध नहीं माना जाना चाहिए.
लेकिन हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया.
हाईकोर्ट ने कहा कि शादी वैध है या नहीं, यह एक अलग सवाल है; लेकिन 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाने पर POCSO और BNS के तहत आपराधिक जिम्मेदारी अलग से तय होगी.
POCSO कानून के मुताबिक 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति बच्चा है. बच्चे की सहमति होने पर भी POCSO के तहत यौन संबंध को अपराध से बाहर नहीं किया जा सकता.
BNS की धारा 63 में भी 18 साल से कम उम्र की महिला के साथ यौन संबंध को बलात्कार माना गया है. कोर्ट ने महिला की सहमति वाले तर्क को ईद आधार पर नामंजूर कर किया.
इसके मद्देनजर हाई कोर्ट ने इस केस में FIR रद्द करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई और मुआवजे की मांग भी खारिज कर दी.