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Delhi News: दिल्ली में यमुना को लेकर दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) ने सख्त निर्देश जारी किए हैं. ये आदेश गणेशोत्सव और आने वाली दुर्गा पूजा को लेकर है. अब राजधानी में यमुना नदी में सीधे मूर्ति विसर्जन नहीं किया जा सकेगा. मुर्ति का विसर्जन केवल स्थानिय निकायों या प्रशासन की तरफ से तय किए गए जगहों पर ही किया जाएगा. वहीं जो लोग नियम तोड़ते हैं उनके ऊपर 50 हजार रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जा सकता है. DPCC ने ये निर्देश 9 सितंबर 2026 को जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 33A के तहत जारी किए हैं.
क्यों लगाया गया प्रतिबंध?
त्योहारों को देखते हुए बड़ी संख्या में गणेश और दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है. इसमें से कई ऐसी मूर्तियां होती है, जो प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP), सिंथेटिक रंग, पेंट और दूसरी ऐसी सामग्री से बनाई जाती हैं, जो पानी में आसानी से नहीं घुल पाती हैं. मूर्तियों के साथ फूल, सजावटी सामान और दूसरी पूजा के सामान भी नदी में चले जाते हैं.
DPCC ने जानकारी दी कि मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाले रंगों और पेंट में पारा, क्रोमियम, सीसा और कैडमियम जैसे तत्व मौजूद हो सकते हैं. इनके पानी में जाने से पानी की क्वालिटी प्रभावित होती है और पानी में रहने वाले जीवों के लिए खतरा बढ़ सकता है. मूर्तियों से निकलने वाली सामग्री पानी में गाद और ठोस कचरे का लोड भी बढ़ाती है. इसी वजह से इस बार भी लोगों को यमुना या किसी प्राकृतिक जलाशय में मूर्ति विसर्जित नहीं करने को कहा गया है.
कहां होगा मूर्ति विसर्जन?
इससे लोग ये न सोचें कि वो मूर्ति विसर्जन नहीं कर सकेंगे. मूर्ति विसर्जन करने के लिए प्रशासन द्वारा जगह तय की जाएगी. वहीं पर श्रद्धालुओं को मूर्ति का विसर्जन करना होगा. DPCC ने स्थानीय निकायों से ऐसे अस्थायी या कृत्रिम विसर्जन तालाब तैयार करने को कहा है, जिससे लोगों को मूर्तियां लेकर यमुना तक न जाना पड़े. घरों में भी बाल्टी या टब जैसे ऑप्शन के इस्तेमाल कर सकते हैं. विसर्जन से पहले मूर्तियों से फूल और सजावटी सामग्री हटाने और जैविक और गैर-जैविक कचरे को अलग-अलग जमा करने के निर्देश भी दिए गए हैं.
PoP की मूर्तियों पर भी सख्ती
DPCC ने मूर्ति बनाने वाले जितने भी विक्रेता हैं उन्हें सामान्य मिट्टी, आसानी से गलने वाली सामग्री और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करने को कहा है. केंद्रीय केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की मई 2020 में संशोधित गाइडलाइन के अनुरूप ये निर्देश जारी किए गए हैं. खास तौर पर प्लास्टर ऑफ पेरिस यानी POP से बनी मूर्तियों को नदी में विसर्जित करने की परमिशन नहीं होगी. POP पानी में आसानी से नहीं घुलता से नहीं घुलता और इससे नदी में ठोस कचरा जमा होने की समस्या बढ़ सकती है.
पूजा सामग्री डालने पर भी रोक
यमुना में प्रदूषण का मेन कारण केवल मूर्ति विसर्जन नहीं है. DPCC ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए यमुना में फूल, पूजा सामग्री, खाद्य पदार्थ, तेल और दूसरे कचरा डालने से भी बचने को कहा है. दिल्ली पुलिस और नगर निकायों का प्रतिबेधित मूर्तियां लेकर आने वाले गाड़ियों की जांच करने और अवैध तरीके से मूर्तियां बनाने वाली इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं. साथ ही अधिकारियों को नियमों के पालन की निगरानी करने और कार्रवाई की रिपोर्ट देने को भी कहा गया है.
50 हजार रुपये का जुर्माना
वहीं जो लोग नियमों का उल्लंघन करेंगे उनके ऊपर 50 हजार रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जा सकता है. इसके अलावा जल अधिनियम के तहत जारी निर्देशों का उल्लंघन होने पर कानूनी कार्रवाई का भी प्रावधान है. ऐसे मामलों में 6 साल तक की सजा हो सकती है. साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है. यानी कि प्रशासन केवल अपील तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि निगरानी और कार्रवाई के जरिए नियम लागू कराने की तैयारी में है.
2015 से शुरू हुई सख्ती
दिल्ली में यमुना में मूर्ति विसर्जन को लेकर कोई नई बात नहीं है. पिछले कई सालों से पर्यावरण नियमों के तहत नदी में गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्री जाने पर रोक लगाने की कोशिश होती रही है. 2015 में NGT ने यमुना में PoP और प्लास्टिक जैसी गैर-बायोडिग्रेडेबल सामनों से बनी मूर्तियों और पूजा के सामान के विसर्जन पर रोक से जुड़े निर्देश दिए थे. इसके बाद ही पर्यावरण-अनुकूल मिट्टी की मूर्तियों और निर्धारित विसर्जन व्यवस्था पर जोर बढ़ा दी गई.
साल 2019 में एनजीटी और डीपीसीसी ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए यमुना नदी के मुख्य प्रवाह में हर प्रकार के मूर्ति विसर्जन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था. वहीं साल 2020 और 2021 में कोरोना महामारी के प्रोटोकॉल के चलते सार्वजनिक रूप से विसर्जन और कृत्रिम तालाबों के जमावड़े पर भी रोक लगा दी गई थी.
इसके बाद साल 2022 से 2026 तक यमुना में सीधे विसर्जन पर पूर्ण रोक को लगातार लागू रखा गया है. नियमों का उल्लंघन करने वालों पर 50,000 रुपये का जुर्माना और 6 साल तक की जेल का कड़ा प्रावधान लगातार है. अब 2026 में DPCC ने फिर से साफ किया है कि यमुना और दूसरे विसर्जन वाली जगहों में सीधे विसर्जन नहीं किया जा सकता.
पिछले 5 साल में कैसी रही यमुना की हालत?
मूर्ति विसर्जन पर रोक से त्योहारों के समय नदी में जाने वाले कचरे को कम करने में मदद मिल सकती है, लेकिन दिल्ली में यमुना की पूरी समस्या केवल मूर्तियों तक सीमित नहीं है. राजधानी में यमुना के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण सीवेज और नालों से आने वाला प्रदूषित पानी है.
केंद्र सरकार की जुलाई 2025 की जानकारी के अनुसार, दिल्ली में अनुमानित सीवेज उत्पादन करीब 3,596 MLD था. वहीं, जून 2025 तक करीब 641 MLD सीवेज बिना उपचार के नदी या ड्रेनेज नेटवर्क में पहुंच रहा था. इसका सीधा असर पानी के क्वालिटी पर दिखाई देता है. 2025 में नजफगढ़-निजामुद्दीन और ओखला जैसे हिस्सों में कई बार घुलित ऑक्सीजन यानी Dissolved Oxygen (DO) का स्तर 0.3 mg/L तक दर्ज किया गया, जबकि प्राथमिक जल गुणवत्ता मानक में DO 5 mg/L से अधिक होना चाहिए.
DO कम होने का क्या मतलब है?
पानी में Dissolved Oxygen यानी घुलित ऑक्सीजन पानी वाले जीवों के लिए बेहद जरूरी होती है. जब नदी में सीवेज और जैविक कचरा बढ़ता है तो उसे तोड़ने के लिए सूक्ष्मजीव ज्यादा ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं. इससे पानी में मौजूद ऑक्सीजन कम होने लगती है. इसी वजह से यमुना के कई हिस्सों में DO का बेहद कम स्तर टेंशन का कारण बन जाता है. जून 2026 की DPCC रिपोर्ट पर आधारित रिपोर्टों में भी कई जगहों पर प्रदूषण का लेवल तय मानकों से ऊपर बताया गया था.
जहरीला झाग भी बड़ी समस्या
अब दिल्ली में यमुना की पहचान कई बार सफेद झाग को देखते हो जाती है. खासकर कालिंदी कुंज जैसे हिस्सों में जहरीले झाग की तस्वीरें सामने आती रहती हैं. इसके पीछे सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण को मेन कारणों में गिना जाता है.
यानी नदी की समस्या केवल त्योहारों के दौरान होने वाले मूर्ति विसर्जन से पैदा नहीं होती. घरेलू सीवेज, औद्योगिक कचरा, नालों का पानी, कम प्रवाह और पानी में ऑक्सीजन की कमी जैसे कई कारण एक साथ यमुना की स्थिति को प्रभावित करते हैं.
तो क्या मूर्ति विसर्जन पर रोक से यमुना साफ हो जाएगी?
नहीं, मूर्ति विसर्जन पर रोक यमुना प्रदूषण की पूरी समस्या का समाधान नहीं है. इससे त्योहारों के दौरान नदी में पहुंचने वाले अतिरिक्त ठोस कचरे, रंगों और मूर्तियों की सामग्री को कम करने में मदद मिल सकती है. लेकिन नदी को लंबे समय तक साफ रखने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट, नालों के प्रदूषण पर कंट्रोल, औद्योगिक कचरे की निगरानी और नदी में पर्याप्त जल प्रवाह जैसे मुद्दों पर भी लगातार काम करना जरूरी होगा. यमुना की 2025 की सरकारी निगरानी में भी नदी के दिल्ली वाले हिस्से में कई जगहों पर BOD और फीकल कोलीफॉर्म का स्तर मानकों से काफी ऊपर दर्ज किया गया था.