SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

बस्तर दशहरा: 620 वर्षों की ऐतिहासिक परंपरा आज भी कायम...मां दंतेश्वरी की आराधना के साथ भव्य रथ उत्सव शुरू

Bastar Dussehra: विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा के लिए 'फूल रथ परिक्रमा' मंगलवार को शुरू हुई. पारंपरिक दशहरा से अलग इस त्योहार की खासियत रावण का वध नहीं, बल्कि आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा और आदिवासी संस्कृति की पहचान है.

Written By Ranjana Kahar
Published: Oct 14, 2026, 08:20 AM IST | Updated: Oct 14, 2026, 08:24 AM IST
Image Credit: बस्तर दशहरा: 620 वर्षों की ऐतिहासिक परंपरा आज भी कायम
Join

छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में दुनिया भर में मशहूर बस्तर दशहरा बहुत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है.  620 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा के तहत मंगलवार को फूल रथ परिक्रमा की शुरुआत हुई. जहां देश के बाकी हिस्सों में दशहरा भगवान राम की रावण पर जीत के तौर पर मनाया जाता है, वहीं बस्तर में यह त्योहार आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा और आदिवासी संस्कृति को समर्पित है. इसी परंपरा को निभाते हुए, मंगलवार को देवी दंतेश्वरी के पवित्र 'छत्र' को फूल रथ पर पूरे विधि-विधान से स्थापित किया गया और परिक्रमा शुरू की गई.

620 वर्षों की ऐतिहासिक परंपरा आज भी कायम
लगभग 620 साल पुरानी यह परंपरा आज भी बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और लोगों की आस्था का प्रतीक बनी हुई है. रावण पर भगवान राम की जीत के आम जश्न से अलग यह त्योहार देवी दंतेश्वरी की पूजा और आदिवासी परंपराओं के पालन के लिए खास है. रथ यात्रा से पहले देवी दंतेश्वरी के छत्र की विधिवत पूजा की गई और उसे रथ पर रखा गया. इस दौरान पारंपरिक मुंडा बैंड और पुलिस बैंड ने देवी के छत्र का स्वागत किया. महिला पुलिसकर्मियों ने हर्षोल्लास में हवाई फायरिंग करके देवी को सलामी दी, जिसके बाद रथ यात्रा शुरू हुई.

सांस्कृतिक गौरव का जीता-जागता प्रतीक
फूल रथ परिक्रमा रविवार तक चलेगी. इसके बाद विजय रथ की परिक्रमा शुरू होगी. रथ को खींचने के लिए जिले के पंद्रह से ज्यादा गांवों के सैकड़ों ग्रामीण आए. छह सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है. बस्तर दशहरा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि इस इलाके की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव का जीता-जागता प्रतीक है.

जोगी बिठाई की रस्म 
इससे पहले सोमवार शाम को मावली माता मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ जोगी बिठाई रस्म की शुरुआत हुई. पुजारी ने दीपक जलाया और देवी की पूजा की. इसके बाद मंदिर में रखी पारंपरिक पवित्र तलवार की तय रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा की गई. पूजा पूरी होने के बाद जोगी दौलत पवित्र तलवार लेकर मुंडाबाजा और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन के बीच सिरहासर भवन पहुंचे. वहां पूजा और धार्मिक रस्में पूरी करने के बाद वे लगभग चार फीट गहरे गड्ढे में पालथी मारकर बैठ गए.

यह भी पढ़ें: 700 मनोकामना ज्योतियां, 250 साल पुराना इतिहास और बिना बीज उगते करेले का रहस्य…जानिए खैरागढ़ के इस सिद्ध पीठ की महिमा
 

बस्तर दशहरा सिर्फ एक पारंपरिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह छह सौ से ज्यादा सालों के समृद्ध इतिहास, गहरी लोक-मान्यताओं और आदिवासी संस्कृति का जीता-जागता सबूत है. ये सभी आज के दौर में भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़े हुए हैं. फूल रथ परिक्रमा से लेकर जोगी बिठाई तक अनोखी और कठिन रीतियों का पालन यह दिखाता है कि बस्तर के लोग अपनी प्राचीन परंपराओं को बचाने और उनका सम्मान करने के लिए कितने समर्पित हैं.
 

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

रंजना कहार एक डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें न्यूज़ मीडिया और डेस्क ऑपरेशंस के क्षेत्र में 4 सालों से ज्यादा का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीतिक हलचलों, क्राइम और स्थानीय मुद्दों (हाइपरलोकल खबरों) की सटीक, निष्पक्ष व तथ्य-आधारित कवरेज में उनकी एक्सपर्टीज है.छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (बिलासपुर) से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद रंजना ने अपने करियर की शुरुआत ETV भारत से की थी. ज़ी मीडिया से पहले उन्होंने APN न्यूज़ के साथ भी काम किया है. कंटेंट एडिटिंग, न्यूज़ प्रोडक्शन और डेस्क मैनेजमेंट पर मजबूत पकड़ होने के कारण वे रीडर्स तक खबरें तेजी, गुणवत्ता और प्रामाणिकता के साथ पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं.रंजना कहार से आप ranjana.kahar@india.com पर ईमेल के माध्यम से सीधे संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, एक्स (ट्विटर) और लिंक्डइन पर भी उनसे सीधा संवाद कर सकते हैं.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES