छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में दुनिया भर में मशहूर बस्तर दशहरा बहुत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. 620 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा के तहत मंगलवार को फूल रथ परिक्रमा की शुरुआत हुई. जहां देश के बाकी हिस्सों में दशहरा भगवान राम की रावण पर जीत के तौर पर मनाया जाता है, वहीं बस्तर में यह त्योहार आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा और आदिवासी संस्कृति को समर्पित है. इसी परंपरा को निभाते हुए, मंगलवार को देवी दंतेश्वरी के पवित्र 'छत्र' को फूल रथ पर पूरे विधि-विधान से स्थापित किया गया और परिक्रमा शुरू की गई.
620 वर्षों की ऐतिहासिक परंपरा आज भी कायम
लगभग 620 साल पुरानी यह परंपरा आज भी बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और लोगों की आस्था का प्रतीक बनी हुई है. रावण पर भगवान राम की जीत के आम जश्न से अलग यह त्योहार देवी दंतेश्वरी की पूजा और आदिवासी परंपराओं के पालन के लिए खास है. रथ यात्रा से पहले देवी दंतेश्वरी के छत्र की विधिवत पूजा की गई और उसे रथ पर रखा गया. इस दौरान पारंपरिक मुंडा बैंड और पुलिस बैंड ने देवी के छत्र का स्वागत किया. महिला पुलिसकर्मियों ने हर्षोल्लास में हवाई फायरिंग करके देवी को सलामी दी, जिसके बाद रथ यात्रा शुरू हुई.
सांस्कृतिक गौरव का जीता-जागता प्रतीक
फूल रथ परिक्रमा रविवार तक चलेगी. इसके बाद विजय रथ की परिक्रमा शुरू होगी. रथ को खींचने के लिए जिले के पंद्रह से ज्यादा गांवों के सैकड़ों ग्रामीण आए. छह सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है. बस्तर दशहरा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि इस इलाके की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव का जीता-जागता प्रतीक है.
जोगी बिठाई की रस्म
इससे पहले सोमवार शाम को मावली माता मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ जोगी बिठाई रस्म की शुरुआत हुई. पुजारी ने दीपक जलाया और देवी की पूजा की. इसके बाद मंदिर में रखी पारंपरिक पवित्र तलवार की तय रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा की गई. पूजा पूरी होने के बाद जोगी दौलत पवित्र तलवार लेकर मुंडाबाजा और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन के बीच सिरहासर भवन पहुंचे. वहां पूजा और धार्मिक रस्में पूरी करने के बाद वे लगभग चार फीट गहरे गड्ढे में पालथी मारकर बैठ गए.
बस्तर दशहरा सिर्फ एक पारंपरिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह छह सौ से ज्यादा सालों के समृद्ध इतिहास, गहरी लोक-मान्यताओं और आदिवासी संस्कृति का जीता-जागता सबूत है. ये सभी आज के दौर में भी अपनी जड़ों से मजबूती से जुड़े हुए हैं. फूल रथ परिक्रमा से लेकर जोगी बिठाई तक अनोखी और कठिन रीतियों का पालन यह दिखाता है कि बस्तर के लोग अपनी प्राचीन परंपराओं को बचाने और उनका सम्मान करने के लिए कितने समर्पित हैं.