‘छत्तीसगढ़ का स्वर्ग’ चिरमिरी का असली राज क्या है? दादू लहरी से जुड़ी है इसकी दिलचस्प कहानी
Chirmiri History: छत्तीसगढ़ का चिरमिरी अपनी हरियाली, पहाड़ों और खूबसूरत झरनों के चलते छत्तीसगढ़ का स्वर्ग कहा जाता है. इसकी पहचान सिर्फ प्राकर्तिक सुंदरता ही नहीं बल्कि इसके नाम के पीछे की कहानी भी बहुत अनोखी है. इसके अलावा, इसका इतिहास भी काफी दिलचस्प माना जाता है. आइए इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं.
छत्तीसगढ़ एक ऐसा प्रदेश है, जिसकी प्राकृतिक खूबसूरती के चलते यहां विदेश से लोग खींचे हुए चले आते हैं. यहां के बड़े-बड़े पहाड़, घने जंगल से लेकर खूबसूरत झरने हर किसी को सुकून देते हैं. इन्ही पहाड़ों, झरनों के बीच में ऐसी जगह भी मौजूद है, जिसके पीछे पूरी दुनिया दीवानी है. इतना ही नहीं इसे छत्तीसगढ़ के स्वर्ग के रूप में जाना जाता है. क्या आप जानते हैं, इसे छत्तीसगढ़ का स्वर्ग क्यों कहा जाता है. अगर नहीं पता है, तो चलिए आज हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. इसके अलावा, इसके दिलचस्प इतिहास के बारे में भी जानते हैं.
दरअसल, हम जिस जगह के बारे में बात कर रहे हैं, उसका नाम चिरमिरी है. ये जगह छत्तीसगढ़ के सबसे खूबसूरत इलाकों में से एक माना जाता है. यह मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में समुद्र तल से लगभग 579 मीटर की ऊंचाई पर बसा है. इतना ही नहीं चिरमिरी हसदेव नदी के किनारे पर बसा है. यह महानदी की प्रमुख सहायक नदियों में से एक मानी जाती है. यहां चारों तरफ फैली हरियाली, बड़े-बड़े पहाड़, खूबसूरत झरने चिरमिरी को देश की अन्य जगहों से काफी खूबसूरत बनाती है. चिरमिरी की सबसे खास बात यह है कि यहां का मौसम सालभर सुहावना बना रहता है. चाहे गर्मी का सीजन हो या फिर सर्दी का सीजन, यहां पर हर मौसम आपको सुकून देता है.
चिरमिरी का पुराना नाम
कहा जाता है कि चिरमिरी को पुराने समय में 'छेड़ी-मेड़ी' नाम से जाना जाता था. अंग्रेजों के शासन काल में इसका नाम बदलकर चिरमिरी रख दिया गया. इस नाम के पीछे की एक कहानी भी मौजूद है. मान्यता है कि यहां पर एक चेरी माई की स्मृति में एक सती मंदिर हुआ करता था. एक समय ऐसा आया, जब यह मंदिर जर्जर अवस्था में पहुंच गया था. इसी मंदिर के नाम से इस इलाके का नाम चिरमिरी पड़ा था. बताया जाता है कि चिरमिरी के संस्थापक के रूप में दादू लेहरी का नाम याद किया जाता है. इसके बाद से चिरमरी को पर्यटन के रूप में जाना जाने लगा है. चिरमिरी के पीछे की एक रोचक कहानी भी है.
कौन हैं दादू लहरी ?
दादू लहरी को चिरमिरी का संस्थापक कहा जाता है. लहरी एक पेशे से इंजीनियर थे, जो ठेकेदार के रूप में चिरमिरी आए हुए थे. बताया जाता है कि यहां पर शिक्षा से लेकर सांस्कृतिक विकास में इनका बहुत बड़ा योगदान माना जाता है. दादू लहरी ने यहां पर शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 1948 में लहरी सेकेंडरी स्कूल और 1953 में लहरी कॉलेज की स्थापना की थी. ये लहरी कॉलेज छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक माने जाते हैं. इसके अलावा, कोयला खदानों की शुरु करने में इनका बड़ा योगदान माना जाता है.
कोयले के लिए पहचान
चिरमिरी की कहानी सिर्फ बड़े-बड़े पहाड़ों और खूबसूरत झरनों तक ही सीमति नहीं है, बल्कि अपने कोयले के लिए भी जानी जाती है. बता दें कि यहां पर शुरुआती दिनों में स्वामित्व वाली कोयला खदानें हुआ करती थीं. इसके बाद यहां पर टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी ने भी कोयला की खोज की थी. बताया यह भी जाता है कि 1930 में चिरमिरी कोयला खदान खोली गई. उसके बाद 1932 में कोयला का उत्पादन भी शुरू हो गया था. इसके बाद 1942 में नई चिरमिरी और 1945 में प्योर चिरमिरी कोयला खदान की शुरुआत की गई. यही कोयला खदानें यहां के लोगों के लिए रोजगार का साधन भी माना जाता है.
पर्यटन के लिए मशहूर
इसके अलावा, चिरमिरी को पर्यटन के लिहाज से देखें, तो यह देश की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक हैं. अगर भागदौड़ वाली जिंदगी में परिवार संग दो पल बिताना चाहते हैं, तो यह आपके लिए परफेक्ट जगह है. इसकी खासियत है कि यहां की खूबसूरती देखते ही बनती है. चिरमिरी में घूमने के लिए कई जगहें मौजूद हैं, जिनकी खूबसूरती बाकई में आपको अपनी ओर खींची ले आएगी. यहां पर धार्मिक स्थलों, अनोखे-अनोखे झरने से लेकर एडवेंचर की काफी बेहतरीन जगहें हैं. इन्हीं खूबसूरती की वजह से चिरमिरी को छत्तीसगढ़ का स्वर्ग कहा जाता है.