राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 22 और 23 अक्टूबर को दो दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरे पर रहेंगी. अपने दौरे के दौरान वे बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपरा के प्रतीक, विश्व प्रसिद्ध मुरिया दरबार में शामिल होंगी. दशहरा के अवसर पर आयोजित होने वाला यह दरबार बस्तर की दशकों पुरानी परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण उत्सव है. इस बार परंपरा में एक बड़ा बदलाव किया गया है, अब मुरिया दरबार का आयोजन जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान में होगा. अपने इस दौरे में राष्ट्रपति मुर्मू बस्तर की जनता को संबोधित भी करेंगी. इसके अलावा 22 अक्टूबर को रायपुर में युवा प्रबोधन कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करेंगी. यह कार्यक्रम इनडोर स्टेडियम में आयोजित किया जाएगा.
राष्ट्रपति के हाई-प्रोफाइल दौरे को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग ने तैयारियां शुरू कर दी हैं. सुरक्षा व्यवस्था, प्रोटोकॉल, भीड़ प्रबंधन, ट्रैफिक और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को लेकर विस्तृत चर्चा की गई. अधिकारियों ने लालबाग मैदान का खुद दौरा किया और वहां वीआईपी (VIP) तथा आम जनता के लिए आने-जाने के रास्तों और पार्किंग की व्यवस्था का जायजा लिया. भारी भीड़ जुटने की संभावना को देखते हुए, कड़े सुरक्षा इंतजाम करने और आम जनता के लिए सभी सुविधाएं सुचारू रूप से उपलब्ध कराने के सख्त निर्देश दिए गए हैं.
'मुरिया दरबार' विश्व-प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की एक ऐतिहासिक परंपरा है. यह 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा उत्सव के समापन का प्रतीक है. इसे स्थानीय जनजातियों की एक अनोखी जन-संसद माना जाता है. इसकी शुरुआत वर्ष 1876 में हुई थी. राजशाही के दौर में राजा अपने शाही वस्त्र उतारकर साधारण कपड़ों में जमीन पर बैठते थे, ताकि वे आम लोगों और जनजातीय समुदायों की समस्याओं को सुन सकें. आज के समय में इस सभा में बस्तर संभाग के चुने हुए प्रतिनिधि, सरकारी अधिकारी, पारंपरिक जनजातीय नेता और स्थानीय ग्रामीण शामिल होते हैं. यहां ग्रामीण अपनी परेशानियां और सुझाव रखते हैं. कहा जाता है कि मुरिया दरबार में बस्तर के 80 परगनों के मुखिया, चालकी और पुरुष व महिला सदस्य शामिल होते हैं. ये लोग अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को सुनने के लिए अलग-अलग दरबार लगाते हैं.
बस्तर का मुरिया दरबार केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह जनजातीय संस्कृति और लोकतंत्र का एक अत्यंत अनूठा उदाहरण है. रियासती दौर से चली आ रही यह विरासत जो शासक और प्रजा के बीच सीधे संवाद का माध्यम है, आज भी अपने मूल स्वरूप और भावना के साथ जीवित है. भले ही समय के साथ इसके तौर-तरीकों में बदलाव आया हो, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य लोगों की समस्याओं को सुनना और उनका समाधान करना आज भी वैसा ही है. इस दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की भागीदारी इस ऐतिहासिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान और प्रतिष्ठा दिलाएगी.