न बजट का रोना... न जेब पर बोझ, नारागांव की 'सोलर दीदियों' ने छत्तीसगढ़ में कैसे लाई ये क्रांति?
बालोद जिले के नारागांव ने सौर ऊर्जा और महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश की है. यहां पर 'सोलर दीदियों' ने बिना अतिरिक्त सरकारी बजट और सीएसआर के 150 से ज्यादा घरों में पैनल लगवाए हैं. इससे 2.50 लाख रुपए से ज्यादा की इनकम इकट्ठा की है.
जिस माटी ने कभी देश की आजादी के लिए चार-चार स्वतंत्रता सेनानी दिए हों. जेल के सलाखों की परवाह नहीं की, उसी नारागांव ने अब ऊर्जा की आजादी और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में देश-दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया है. छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का यह छोटा सा गांव आज प्रदेश का पहला ऐसा गांव बन चुका है, जो पूरी तरह 'सोलर दीदियों' के बूते सौर ऊर्जा से जगमगा रहा है. जिला प्रशासन की पहल से यह गांव विकास की अनोखी मिशाल लिखने में कामयाब हुआ है.
गुरूर ब्लॉक के आंचल महिला संकुल संगठन से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं ने बिना किसी अतिरिक्त सरकारी बजट और बिना किसी कॉर्पोरेट सीएसआर (CSR) फंड के गांव के 150 से ज्यदा घरों की छतों पर सोलर रूफटॉप स्थापित कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है.
देश के सामने रखा अनूठा मॉडल
आमतौर पर किसी भी बड़े नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट के लिए भारी-भरकम बजट, सरकारी सब्सिडी या कॉर्पोरेट डोनेशन की दरकार होती है. लेकिन नारागांव ने इस धारणा को पूरी तरह उलट दिया. कलेक्टर दिव्या मिश्रा के मुताबिक, इस पूरे अभियान की रीढ़ इसका 'शून्य हितग्राही अंशदान और शून्य अतिरिक्त शासकीय सहयोग' मॉडल है.
150 से अधिक परिवारों को छत पर सोलर पैनल लगाने के लिए अपनी जेब से कोई अतिरिक्त राशि नहीं देनी पड़ी, जिससे सरकार पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं आया. पूरी प्रक्रिया महिलाओं के आपसी समन्वय, वित्तीय अनुशासन और सामुदायिक सहभागिता से पूरी हुई. महिलाएं चौके-चूल्हे से तकनीकी प्रबंधन तक पहुंची, जिसमें दीदियों ने कमाई अतिरिक्त आय
गांव के हर दरवाजे पर दस्तक दी
इस अभियान ने ग्रामीण महिलाओं को केवल उपभोक्त या योजना का हितग्राही बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उन्हें ऊर्जा उद्यमी के रूप से स्थापित किया. 'सोलर दीदियों' ने गांव के हर दरवाजे पर दस्तक दी, परिवारों को सौर ऊर्जा की बचत और पर्यावरण के प्रति जागरूक किया और कागजी कार्रवाई से लेकर रूफटॉफ इंस्टॉलेशन की निगरानी तक का जिम्मा संभाला.
इस जमीनी नेतृत्व का सीधा फायदा महिलाओं की आर्थिक स्थित पर पड़ा दीदियों ने इसे एक व्यावसायिक मॉडल के रूप में संचालित किया. अब तक इस अभियान के माध्यम से इन महिलाओं ने 2.50 लाख रुपए से ज्यादा की शुद्ध आय अर्जित कर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है.
राज्योत्सव में गूंजा नारागांव का नाम
स्वर्गीय सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम में आयोजित राज्योत्सव समारोह में इन सोलर दीदियों को विशेष रूप से सम्मानित किया गया. मंच पर जब घूंघट और पारंपरिक वेशभूषा में सजी इन महिलाओं ने अपनी सफलता की दास्तां साझा की, तो पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.
स्वतंत्रता संग्राम से सोलर क्रांति तक
नारागांव की पहचान हमेशा से राष्ट्रभक्ति की रही है. ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम में यहां के 4 सेनानियों ने सक्रिय भागीदारी निभाते हुए जेल की यातनाएं सही थीं. आज उसी गांव की बेटियां और बहुएं पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता खत्म कर देश को पर्यावरण संकट से आजाद कराने की नई लड़ाई की अगुवा बन गई हैं.
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भविष्य की राह देश के गांवों के लिए ब्लूप्रिंट
नारागांव की यह सफलता साबित करती है कि अगर नीति में स्थानीय समुदाय का विश्वास और महिलाओं का सशक्त नेतृत्व शामिल हो, तो बिना किसी भारी वित्तीय निवेश के भी जमीनी स्तर पर बड़ी क्रांति लाई जा सकती है. छत्तीसगढ़ का यह गांव अब सिर्फ सौर ऊर्जा से जगमगा नहीं रहा, बल्कि पूरे देश के ग्रामीण भारत के लिए हरित ऊर्जा और महिला सशक्तीकरण का जीवंत मॉडल बन चुका है.
(रिपोर्टः दानवीर साहू, बालोद)