G7 vs Brics: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, साउथ अफ्रीका, यूएई समेत दुनिया के 11 ताकतवर देश 12-13 सितंबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जुटने वाले हैं. भारत चौथी बार वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े मंच 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अगवानी कर रहा है. नई दिल्ली के 'भारत मंडपम' में ब्रिक्स के सदस्य देशों और आउटरीच सहयोगी देशों की बैठक होगी.
15 दिन बाद दूसरी बार मिलेंगे RIC
SCO समिट के करीब 15 दिन में दूसरी बार RIC यानी रूस , भारत और चीन एक मंच पर एक साथ होंगे. ये तस्वीरे पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका को परेशान कर सकती है. ब्रिक्स को लेकर अमेरिका का खीज किसी से छिपा नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी बता चुके हैं और 10 % अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दे चुके हैं.
ब्रिक्स को क्यों खतरा मानते हैं ट्रंप
अमेरिका सालों से BRICS को एक खतरे के तौर पर देखता है. उसे डर है कि ये ब्लॉक अमेरिका के लिए आर्थिक चुनौती बन सकता है. अमेरिका को डर सता रहा है कि ब्रिक्स समूह अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए अपनी करेंसी लाकर उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं. ब्रिक्स के सदस्य देश एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो अमेरिका के लिए खतरा है.
ब्रिक्स की ताकत को समझिए
ब्रिक्स की ताकत को समझने के लिए सबसे पहले उसके सदस्य देशों और ग्लोबल इकोनॉमी में उसकी हिस्सेदारी को समझते हैं.

GDP के आंकड़े ब्रिक्स के पूर्ण देशों के हैं, इसके अलावा इस संगठन में कुछ अन्य देशों को पार्टनर या सहयोगी देशों के रूप में भी जोड़ा गया है, जिसके बाद कुल संख्या करीब 21 पहुंच जाती है.
ग्लोबल इकोनॉमी में ब्रिक्स का दबदबा
GDP: नॉमिनल जीडीपी के हिसाब से कुल इकोनॉमी करीब 32 ट्रिलियन डॉलर की है. Purchasing Power Parity के आधार पर ग्लोबल इकोनॉमी में 41% की हिस्सेदारी है.
ग्लोबल क्रूड ऑयल पर ब्रिक्स का कंट्रोल: सऊदी अरब, ईरान, UAE के शामिल होने के बाद ग्लोबल क्रूड प्रोडक्शन में 40% पर ब्रिक्स देशों का कंट्रोल
ब्रिक्स की आबादी: दुनिया की 45% आबादी ब्रिक्स देशों में रहती है. यानी दुनिया का हर दूसरा इंसान ब्रिक्स देश से जुड़ा है.
ब्रिक्स का व्यापार: ब्रिक्स देशों का वैश्विक व्यापार में हिस्सा लगभग 25% से अधिक है . इंट्रा-ब्रिक्स ट्रेड 2003 के बाद 13 गुना ज्यादा बढ़कर 1.17 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया. ब्रिक्स देश लगभग 6.1 ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक निर्यात और 4.9 ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक आयात करते हैं. चीन और रूस जैसे बड़े निर्यातक और भारत जैसे बड़े बाजार ब्रिक्स का हिस्सा है
ब्रिक्स बैंक : ब्रिक्स ने 2014 में वर्ल्ड बैंक और IMF के विकल्प के तौर पर खुद का न्यू डेवलपमेंट बैंक बनाया . जिसका मुख्यालय चीन के शंघाई में है. इस बैंक के पहले अध्यक्ष भी भारत के केवी कामथ रहे हैं.

G7 Vs BRICS की तुलना

ब्रिक्स से अमेरिका की घबराहट की असली वजह समझिए
इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड(IMF) के मुताबिक ब्रिक्स देशों ने आर्थिक शक्ति के सबसे सटीक पैमाने यानी Purchasing Power Parity के मामले में आधिकारिक रूप से G7 को पीछे छोड़ दिया है. ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार का ऐसा विकल्प है कि इन्हें पश्चिमी देशों की जरूरत ही नहीं है. अगर ये आपस में ही सारा व्यापार कर लें, तो अमेरिका की हेकड़ी निकल जाएगी.
ब्रिक्स देशों का ग्रोथ रेट 4% है, जबकि अमेरिका के प्रतिनिधित्व वाले G7 का ग्रोथ रेट सिर्फ 1 %. अमेरिका का सबसे बड़ा डर डॉलर को लेकर है. अगर ब्रिक्स करेंसी का प्लान पूरा हो गया और ब्रिक्स देशों ने इसी करेंसी में ट्रेड शुरू कर दिया, तो अमेरिका के सुपरबॉस वाली छवि को बड़ा झटका लगेगा. अमेरिका की दादागिरी खत्म हो जाएगी. अगर ब्रिक्स और SCO के सदस्य देश डॉलर के बजाए अपनी स्थानीय करेंसी में व्यापार करें, तो अमेरिका की ब्लैकमेलिंग वाली हरकत खत्म हो जाएगी.
ट्रंप के डर की 3 सबसे बड़ी वजह :
डी-डॉलराइजेशन का डर: BRICS देश अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं जैसे रुपया, युआन, रुबल के इस्तेमाल पर जोर रहे हैं.अगर ये चलन बढ़ा या ब्रिक्स अपनी करेंसी ले आया, तो अमेरिका का वर्चस्व खतरे में आ जाएगा.
एनर्जी बाजार में पकड़ खोने का डर: ट्रंप को डर सता रहा है कि दुनिया के बड़े तेल और गैस उत्पादक जैसे सऊदी अरब, यूएई, ईरान) BRICS के सदस्य है. इनकी बदौलत वैश्विक कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस मार्केट पर ब्रिक्स देशों का कंट्रोल बढ़ रहा है. जिससे अमेरिका की इकोनॉमी को बड़ा झटका लगेगा.
सप्लाई चेन में ब्रिक्स के बढ़ते दबदबे का डर: ग्लोबल सप्लाई चेन में ब्रिक्स देशों का दबदबा बढ़ रहा है. मैन्युफैक्चरिंग और ऊर्जा सेक्टर में ब्रिक्स देश ग्लोबल इकोनॉमी के रीढ़ बन रहे हैं. जिससे अमेरिका घबराया हुआ है.