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NITI Aayog Report: देश की इकोनॉमी मौजूदा समय में 7% सालाना की दर से बढ़ रही है. यह ग्रोथ रेट देखकर दुनिया के बड़े-बड़े देश हैरान हैं. पिछली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.3% के करीब रहने का अनुमान जताया गया है. हालांकि, यह उससे पहली तिमाही की 7.8% की ग्रोथ रेट से कुछ कम है. दुनिया की छठी सबसे बड़ी इकोनॉमी भारत के लिए यह ग्रोथ रेट भले ही खुश करने वाली हो. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के 2047 तक 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) बनाने के लक्ष्य के लिहाज से यह काफी कम साबित हो सकती है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार इकोनॉमिस्ट का साफ कहना है कि यदि भारत को आजादी के 100वें साल तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो इकोनॉमिक ग्रोथ को नई ऊंचाई पर ले जाना जरूरी है. वरना देश 'मिडिल-इनकम ट्रैप' की चपेट में आ सकता है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने तीसरे कार्यकाल में 'विकसित भारत 2047' को अपना मुख्य एजेंडा बनाया है. लेकिन यहां तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण है. सरकार के थिंक-टैंक नीति आयोग के वरिष्ठ अधिकारी अशोक लाहिड़ी के अनुसार भारत को 2047 तक विकसित देश बनने के लिए अगले 21 साल तक लगातार 9.25% की सालाना ग्रोथ से आगे बढ़ना होगा.
आंकड़ों पर गौर करें तो यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल लग रहा है. 2000 से लेकर 2024 के बीच देश की एवरेज ग्रोथ रेट केवल 6.3% रही है, जो देश की 7.5% से 8% की मौजूदा कैपिसिटी से कम है. पिछले 50 साल के इतिहास में इंडियन इकोनॉमी ने महज तीन बार (1975, 1988 और 2021) ही 9.25% या इससे ज्यादा की ग्रोथ रेट हासिल की है. ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की इकोनॉमिस्ट एलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद (Alexandra Hermann Prasad) का कहना है कि जैसे-जैसे इकोनॉमी का साइज बड़ा होता है, इतने बड़े बेस पर लगातार 9.25% की ग्रोथ रेट बनाए रखना मुश्किल होता है.
यदि भारत की ग्रोथ रेट आने वाले समय में 8% से नीचे बनी रही तो देश 'मिडिल-इनकम ट्रैप' (Middle-Income Trap) में फंस सकता है. यह एक ऐसी स्थिति होती है, जहां देश में मजदूरी और लागत तो बढ़ जाती है, लेकिन कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी और स्किल उस लेवल तक नहीं पहुंच पाता कि वे अमीर देशों से कम्पीट कर सकें. ऐसे में देश मिडिल इनकम क्लास में ही अटका रहता है. हायर इनकम वाले देश का दर्जा पाने के लिए भारत को लंबी दूरी तय होगी. आइए जानते हैं किन 5 मोर्चों पर भारत को खुद को मजबूत करना होगा?
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार साल 2025 में देश की प्रति व्यक्ति आय (Per-Capita Income) 2,813 डॉलर (2,68,305 रुपये) थी. डेवलपड कंट्री बनने की लिमिट को पार करने के लिए 2047 तक इसे छह गुना से भी ज्यादा बढ़ाकर करीब 18,000 यूएस डॉलर (17.20 लाख रुपये) तक पहुंचाना जरूरी है.
ओवरसी-चाइनीज बैंकिंग कॉर्प (Oversea Chinese Banking Corp) की इकोनॉमिस्ट लावण्या वेंकटेश्वरन के अनुसार भारतीय इकोनॉमी में कई खामियां हैं. उन्होंने देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current-Account Deficit), बजट डेफिसिट और बाहरी संतुलन बनाए रखने के लिए अस्थिर विदेशी पूंजी पर निर्भरता को बड़ा रिस्क बताया.
इस तरह के रिस्क होने से विदेशी निवेशकों के बीच भारत का आकर्षण कम हो रहा है. एशियाई महाद्वीप में भारतीय रुपया सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया है. बैंक ऑफ अमेरिका कॉर्प की तरफ से अगस्त में जारी फंड मैनेजर्स के सर्वे में बताया गया कि एशियाई शेयर मार्केट में विदेशी निवेशकों की पहली पसंद रहने वाला भारत अब इंडोनेशिया की जगह सबसे कम पसंदीदा मार्केट बन गया है.
इकोनॉमिस्ट का मानना है कि भारत को अपनी ग्रोथ रेट बढ़ाने के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का तेजी से एक्सपेंशन करना होगा. हालांकि, यह पीएम मोदी के एजेंडे में भी शामिल है. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से देश की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 16% से 17% पर स्थिर बनी हुई है, जबकि सरकार ने इसे बढ़ाकर 25% तक ले जाने का टारगेट रखा था.
ग्लोबल लेवल पर कुल निर्यात (Global Goods Exports) में भारत की हिस्सेदारी 2% से भी कम है. वहीं, चीन की हिस्सेदारी 14% से ज्यादा है. इस अंतर से यह साफ है कि भारत को एक गलोबल औद्योगिक महाशक्ति बनने के लिए कितनी बड़ी खाई को पाटना होगा. जानकारों का कहना है कि हाई-टेक एक्सपोर्ट, प्राइवेट सेक्टर के निवेश को बढ़ावा देना और दूसरे देशों से आयात की जाने वाली एनर्जी सप्लाई पर निर्भरता कम करनी होगी.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करने के लिए इंटरनेशनल इन्वेस्टर्स को आकर्षित करने की जरूरत है. इसी सिलसिले में देश के दो वरिष्ठ मंत्रियों ने अमेरिका, कनाडा और जापान के ग्लोबल इन्वेस्टर्स से नई कैपिटल निवेश करने की बात कही. हालांकि, भारत ने पिछले दिनों रिकॉर्ड एफडीआई (FDI) हासिल किया है. लेकिन इस कैपिटल को देश में रोके रखना बड़ी चुनौती बन रहा है. पिछले एक से दो साल के दौरान भारतीय कंपनियों ने भी विदेशों में निवेश बढ़ाया है. दूसरी तरफ भारतीय स्टार्टअप्स से विदेशी निवेशक अपना निवेश निकालकर बाहर निकल रहे हैं. इसका असर यह हुआ कि देश में नेट एफडीआई (Net FDI) करीब-करीब जीरो हो गया.
देश के विकास से जुड़े टारगेट को पूरा करने के लिए डोमेस्टिक सेविंग बेहद जरूरी है. हालांकि, भारत ग्लोबल एवरेज से ज्यादा सेविंग करता है, लेकिन एशियाई देशों के मुकाबले देश का सेविंग लेवल काफी पीछे है और यह चीन के मुकाबले काफी कम है. भारत में आम लोगों की कम इनकम के कारण रोजमर्रा से जुड़े खर्च करने के बाद सेविंग भी कम ही हो पाती है.
घरेलू सेविंग नए कारखानों, बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) और अन्य निवेश के लिए सस्ती पूंजी मुहैया कराती है. यदि घरेलू बचत के आंकड़े में गिरावट आती है तो भारत को ग्रोथ से जुड़ी जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशी पूंजी या महंगे कर्ज पर के भरोसे रहना पड़ेगा. भारत के पास अगले तीन दशक तक दुनिया की सबसे युवा आबादी का फायदा उठाने का मौका है, इसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' कहते हैं. लेकिन यदि युवाओं के लिए बेहतर नौकरियों के मौके नहीं बनाए गए तो यह मौका हाथ से निकल सकता है.
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 15 से 29 साल की उम्र वाले करीब 8.7 करोड़ युवा न तो कोई नौकरी कर रहे हैं, न ही किसी एजुकेशन या ट्रेनिंग से जुड़े हैं. क्वालिटी जॉब की कमी के कारण देश की 60% वर्कफोर्स को सेल्फ एम्पलायमेंट (Self-Employment) की तरफ धकेल दिया गया है. इनमें से अधिकतर खेती का रुख कर रहे हैं, जहां इनकम बहुत कम है.
ग्लोबलडाटा टीएस लोम्बार्ड की चीफ इकोनॉमिस्ट सुमिता देवेश्वर का कहना है कि देश की आर्थिक स्थिरता के बावजूद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सालों से निवेश चक्र सुस्त क्यों बना हुआ है और नेट एफडीआई (FDI) जीरो के करीब क्यों है. उन्होंने यह भी सवाल किया कि बढ़ती युवा आबादी के लिए नौकरियों के अवसर क्यों नहीं बन रहे? प्राइवेट सेक्टर के कम निवेश और नौकरियों के कम अवसर होने से 6% से ज्यादा की जीडीपी ग्रोथ बनाए रखना भी मुश्किल भरा होगा. ऐसे में भारत के विकसित राष्ट्र बनने के लिए 8% या 9.25% की विकास दर हासिल करना मुश्किल है.