)
Setback for ECL Finance : एक ऐसी फाइनेंस कंपनी जो किसी दूसरी कंपनी को ना सिर्फ कर्ज देती थी. बल्कि उस कंपनी के हर छोटे-बड़े फैसलों और कामकाज में दखल तक देती थी. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर कोई कर्ज देने वाली कंपनी कर्जदार कंपनी के नीतिगत फैसलों में दखल रखती है, तो उसे सिर्फ कर्जदाता नहीं माना जा सकता. बल्कि कंपनी की रिलेटेड पार्टी है.
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है ECL फाइनेंस लिमिटेड पर. सुप्रीम कोर्ट में ECL फाइनेंस लिमिटेड की कारगुजारी कैसे उजागर हुई. कोई हाउसिंग प्रोजेक्ट किस मकसद से बनाया जाता है. ताकि लोगों को घर मिले और रियल एस्टेट कंपनी को मुनाफा हो. लेकिन, एक हाउसिंग प्रोजेक्ट को घर खरीदारों को धोखा देने और फाइनेंशियल कंपनियों से सिर्फ कर्ज लेने के मकसद शुरू किया गया था.
साहा इन्फ्राटेक नाम की कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट बना रही थी. प्रोजेक्ट का नाम था 'प्रोजेक्ट एनकोर', जिसे बाद में 'मेघदूतम एनकोर' कहा गया. इस प्रोजेक्ट के लिए 2016 में 160 करोड़ रुपये के डिबेंचर जारी करने की योजना बनी. लेकिन, जारी हुए सिर्फ 110 करोड़ रुपये और इन सभी को खरीदा ECL फाइनेंस ने. इस सौदे में पाम डेवलपर्स ने गारंटर की भूमिका निभाई यानी अगर साहा इन्फ्राटेक पैसा नहीं चुकाती, तो पाम डेवलपर्स पर जिम्मेदारी आती. साल 2017 में ECL फाइनेंस ने साहा इन्फ्राटेक को 90 करोड़ रुपये की एक और क्रेडिट सुविधा दी. इसमें भी पाम डेवलपर्स गारंटर बनी.
यहीं से पैसों की लेन-देन और हेराफेरी का खेल शुरू हुआ. सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश एक फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक, पाम डेवलपर्स, जो साहा इंफ्राटेक की कॉरपोरेट गारंटर थी, उसका इस्तेमाल एक जरिए के तौर पर किया गया, ताकि साहा इन्फ्राटेक से पैसा दो और कंपनियों में भेजा जा सके और वो कंपनियां पाम डेवलपर्स के ही प्रमोटरों की कंपनियां बताई गईं. फॉरेंसिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि उन दोनों कंपनियों पर ECL फाइनेंस का ही नियंत्रण था.
इसके बाद का कारनामा और भी हैरान करने वाला था. साल 2020 में पाम डेवलपर्स दिवालिया हो गई. ECL फाइनेंस और उसके डिबेंचर ट्रस्टी ने मिलाकर करीब 270 करोड़ रुपये का दावा पेश किया और खुद को उस समिति में शामिल कर लिया जो तय करती है कि कंपनी का भविष्य अब क्या होगा. उस समिति को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स कहा जाता है. नियम ये है कि COC में सिर्फ वही कर्जदार बैठ सकते हैं जो कंपनी के 'अपने लोग' न हों यहीं से ECL फाइनेंस लिमिटेड की कारनामों की परतें हटनी शुरू हो गईं.
सुप्रीम कोर्ट ने जब पाम डेवलपर्स की दिवालिया प्रक्रिया और ECL फाइनेंस से जुड़े दस्तावेज खंगाले, तो जो सामने आया वह चौंकाने वाला था. ईसीएल के पास सिर्फ अपना पैसा वसूलने का अधिकार नहीं था. उसके पास था कंपनी में डायरेक्टर नियुक्त करने का अधिकार, बोर्ड में किसी भी गतिरोध पर आखिरी फैसला लेने का अधिकार. हर तिमाही बजट मंजूर करने का अधिकार. किसी भी प्रबंधन अधिकारी को हटाने पर वीटो लगाने का अधिकार था. यहां तक कि कंपनी के अकाउंट पर भी सीधा नियंत्रण था.
इन्हीं दस्तावेजों को जांचने के बाद नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी NCLT ने ECL फाइनेंस लिमिटेड को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स से बाहर कर रखा था. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने NCLT के आदेश को ही बरकरार रखते हुए. ECL फाइनेंस को COC से बाहर रखने के फैसले पर मुहर लगा दी. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कंपनी के कामकाज में दखल रखने वाली कंपनी एक आम बाहरी कर्जदार नहीं बल्कि 'अपना आदमी' मानी जाएगी, इसलिए उसे उस समिति में बैठने का हक नहीं है, भले ही उसका पैसा कंपनी पर बकाया हो.
ECL फाइनेंस के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश किसी बड़े झटके से कम नहीं. सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ने ही नहीं बल्कि रिजर्व बैंक ने भी ECL फाइनेंस को पहले झटका दिया. मई 2024 में RBI ने ईसीएल फाइनेंस और उसकी ग्रुप कंपनी एडलवाइस ARC पर कारोबारी पाबंदियां लगाईं थी, क्योंकि RBI ने जांच में एडलवाइस की दोनों कंपनियों को लोन से जुड़े मामलों में कई अनियमितताओं का दोषी माना था.