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ऑस्ट्रियाई कंपनी रेड बुल (Red Bull) ने भारत में अधिक कैफीन वाले पेय पदार्थों के लिए ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने के FSSAI के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रेड बुल ने 25 सितंबर को अदालत में याचिका दायर की. ये जून में लिए गए FSSAI फैसले को औपचारिक रूप से चुनौती देने वाली पहली कंपनी है.
रेड बुल की भारतीय इकाई ने दलील दी है कि FSSAI ने ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने से पहले कंपनी को कोई चेतावनी या नोटिस जारी नहीं किया. कंपनी ने इस कदम को 'अचानक लगाया गया प्रतिबंध' बताते हुए कहा कि उत्पाद के मूल मानक में कोई बदलाव किए बिना उसके लिए इस्तेमाल होने वाले डिटेल पर रोक लगाई गई है.
कंपनी के मुताबिक, इस फैसले से भारत में उसके मौजूदा और प्रस्तावित निवेश प्रभावित हो सकते हैं. रेड बुल ने यह भी कहा कि नियामकीय कार्रवाई से कारोबार के लिए अनिश्चितता बढ़ी है और उसकी व्यावसायिक योजनाओं पर असर पड़ा है. रेड बुल का दावा है कि इस कार्रवाई के कारण उसका कारोबार प्रभावी रूप से ठहर गया है. वहीं, एक सरकारी सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि FSSAI अदालत में अपने फैसले का बचाव करेगा.
ये विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में एनर्जी ड्रिंक बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. Euromonitor के मुताबिक, भारत में एनर्जी ड्रिंक्स की खुदरा बिक्री 12.6% सालाना की दर से बढ़ रही है. ये अमेरिका और चीन की तुलना में तेज है. भारत में 2017 में पेप्सी के Sting लॉन्च के बाद इस बाजार को बड़ा बढ़ावा मिला. Euromonitor के मुताबिक, ₹20 की प्लास्टिक बोतलों वाले प्रोडक्ट खास तौर पर 15 से 19 वर्ष की उम्र के उपभोक्ताओं के बीच लोकप्रिय रहे. रेड बुल इंडिया का राजस्व 2024 में करीब 130 मिलियन डॉलर रहा. ये चार साल पहले के मुकाबले दोगुने से अधिक है. भारत का एनर्जी ड्रिंक बाजार 2028 तक 1.6 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.
‘एनर्जी ड्रिंक’ श्रेणी को लेकर रेड बुल अकेली कंपनी नहीं है. Pepsi, Monster Beverage और रिलायंस समेत कई कंपनियों ने भी इस नियामकीय कदम पर आपत्ति जताई है. कंपनियों की चिंता है कि ‘एनर्जी ड्रिंक’ जैसे स्थापित विवरण को हटाने से उन ब्रांडों पर असर पड़ सकता है.
जून में भारत के फूड रेगुलेटर ने अधिक कैफीन वाले ऐसे पेय पदार्थों को ‘एनर्जी ड्रिंक’ के रूप में बेचने या प्रचारित करने वाले निर्माताओं को इस विवरण का इस्तेमाल बंद करने को कहा था. कंपनियों ने नियामकीय कार्रवाई को टालने की मांग भी की थी. लेकिन, उनके प्रयास स्वीकार नहीं किए गए.
दुनिया के कई देशों में एनर्जी ड्रिंक्स को लेकर नियामकीय जांच बढ़ी है. इसके पीछे मुख्य वजह इन पेय पदार्थों में मौजूद कैफीन और शुगर, साथ ही टॉरिन जैसे अन्य घटकों को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं हैं. ब्रिटेन में भी अगले साल अप्रैल से 16 वर्ष से कम उम्र के लोगों को अधिक कैफीन वाले एनर्जी ड्रिंक्स की बिक्री पर रोक लगाने की योजना है.