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RBI Repo Rate: लद गए सस्ते लोन के दिन? महंगा हो जाएगा बैंकों की EMI चुकाना; RBI तीन बार बढ़ा सकता है रेपो रेट

RBI Repo Rate: यूनियन बैंक की हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आरबीआई मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में रेपो रेट को बढ़ाकर 5.75 फीसदी से 6 फीसदी तक कर सकता है. इस दिसंबर से ब्याज दर बढ़ने की पूरी संभावना है.

RBI Repo Rate: लद गए सस्ते लोन के दिन? महंगा हो जाएगा बैंकों की EMI चुकाना; RBI तीन बार बढ़ा सकता है रेपो रेट

Union Bank Report: यदि आपने होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन ले रखा है या लेने का प्लान कर रहे हैं तो यह खबर सीधे तौर पर आपसे जुड़ी है. जी हां, सस्ते लोन का दौर खत्म होने वाला है और कर्ज लेना महंगा होने के आसार हैं. आपकी जेब से जुड़ी यह खबर इसलिए भी खास है क्योंकि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (union bank of india) की हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) आने वाले महीनों में रेपो रेट में इजाफा कर सकता है. अगर ऐसा हुआ तो बैंकों की ब्याज दर एक बार फिर से ऊपर जा सकती हैं और आपकी EMI भी महंगी हो सकती है.

देश की मजबूत आर्थिक ग्रोथ और बैंकिंग सिस्टम में अचानक लिक्विडिटी बढ़ने से महंगाई बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है. यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (UBI) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार आरबीआई (RBI) फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की दूसरी छमाही (अक्टूबर 2026 से मार्च 2027) में रेपो रेपो रेट को 5.25 फीसदी से बढ़ाकर 5.75 से 6.00 फीसदी कर सकता है. रिपोर्ट में उम्मीद जताई गई कि दिसंबर से ब्याज दर में फिर से बढ़ोतरी का नया चक्र शुरू हो सकता है.

तीन किस्त में बढ़ सकता है रेपो रेट

यूनियन बैंक की तरफ से अनुमान जताया गया कि रिजर्व बैंक 25-25 बेसिस प्वाइंट की दो से तीन किस्त में रेपो रेट बढ़ा सकता है. ऐसा हुआ तो फिलहाल 5.25 फीसदी पर चल रहा रेपो रेट बढ़कर 6 फीसदी तक पहुंच सकता है. दुनियाभर में फाइनेंशियल स्थिति कड़ी होने और क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमत के कारण महंगाई पर दबाव बढ़ रहा है. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि यूएस फेडरल रिजर्व सितंबर में दर बढ़ाता है तो आरबीआई (RBI) अक्टूबर में ही ब्याज दर बढ़ाने का फैसला कर सकता है.

136 अरब डॉलर के फ्लो से बढ़ा दबाव

आरबीआई (RBI) की स्पेशल स्वैप फैसिलिटी के तहत देश में भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा आई है. 31 अगस्त तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 136 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. इसमें से 127 अरब डॉलर FCNR(B) डिपॉजिट के रूप में आया है. इस भारी इनफ्लो के कारण बैंकिंग सिस्टम में कोर लिक्विडिटी जून के 4.82 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले बढ़कर अगस्त के मिड तक 8.05 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई है. सितंबर महीने तक इसके 14.17 लाख करोड़ रुपये पर पहुंचने का अनुमान है.

RBI के पास लिक्विडिटी कंट्रोल करने के ऑप्शन

लिक्विडिटी बढ़कर 14.17 लाख करोड़ रुपये पर पहुंचती है तो इस भारी-भरकम नकदी को संभालना आरबीआई (RBI) के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा. नकदी का बाजार में फ्लो कंट्रोल करने के लिए RBI वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) और इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो (I-CRR) जैसे अस्थायी उपायों पर काम कर सकता है. इसके अलावा बॉन्ड बिक्री और फॉरेक्स स्वैप का रास्ता भी अपनाया जा सकता है. यदि क्रूड ऑयल के दाम 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जाते हैं तो RBI को ब्याज दर बढ़ाने का फैसला जल्दी लेना पड़ सकता है.

रेपो रेट बढ़ाने का क्या होगा असर?

जब रिजर्व बैंक (RBI) की तरफ से रेपो रेट बढ़ाया जाता है तो बाजार में लिक्विडिटी (liquidity) का फ्लो कम हो जाता है और लोन महंगा हो जाता है. इसका मकसद इकोनॉमी में महंगाई (Inflation) को कंट्रोल करना होता है. लेकिन इसका असर शेयर बाजार, बैंकों और आम जनता की जेब पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है. रेपो रेट बढ़ने का असर अलग-अलग सेक्टर पर देखा जाता है. किस सेक्टर पर क्या असर होगा, आइए देखते हैं-

रेपो रेट क्यों घटाता-बढ़ाता है आरबीआई?

रिजर्व बैंक (RBI) देश की इकोनॉमी में महंगाई (Inflation) को कंट्रोल करने और इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) के बीच बैलेंस बनाए रखने के लिए रेपो रेट को घटाता या बढ़ाता है. रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर RBI देश के कमर्शियल बैंकों को शॉर्ट-टर्म लोन (short-term) देता है. जब देश में महंगाई तेजी से बढ़ती है और चीजों के दाम आम आदमी की पहुंच से बाहर होने लगते हैं तब RBI की तरफ से रेपो रेट में इजाफा किया जाता है. दूसरी तरफ जब इकोनॉमी में सुस्ती या मंदी का माहौल होता है और बिजनेस / इंडस्ट्री की रफ्तार धीमी पड़ जाती है तब RBI रेपो रेट में कटौती करता है.

महंगाई और रेपो रेट के बीच क्या है संबंध?

महंगाई (Inflation) और रेपो रेट के बीच सीधा कंट्रोल एंड बैलेंस (Control and Balance) का संबंध होता है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रेपो रेट का इस्तेमाल महंगाई को कंट्रोल करने के लिए एक अहम हथियार के तौर पर करता है. जब बाजार में चीजों और सर्विसेज के दाम तेजी से बढ़ते हैं और महंगाई दर RBI की तय लिमिट से ऊपर चली जाती है तो RBI रेपो रेट में बढ़ोतरी करता है. इसके उलट जब महंगाई कम होती है या इसमें सुस्ती आती है तो रेपो रेट को घटाया जाता है. इसका असर यह होता है कि बैंक ब्याज दर में कटौती करते हैं और लोन सस्ते हो जाते हैं.

क्या होता है रेपो रेट?

रेपो रेट (Repo Rate) वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक कमर्शियल बैंकों जैसे SBI, HDFC, ICICI को शॉर्ट टर्म लोन देता है. जब बैंकों के पास नकदी की कमी होती है तो वे अपनी सरकारी सिक्योरिटीज (Government Securities) को आरबीआई (RBI) के पास गिरवी रखकर लोन लेते हैं. बैंक एक तय समय के बाद इन सिक्योरिटीज को वापस खरीदने का समझौता करते हैं. इस लोन पर आरबीआई (RBI) जो ब्याज वसूलता है, वही रेपो रेट कहलाता है. जब रेपो रेट बढ़ता है तो बैंक नए डिपॉजिट को आकर्षित करने के लिए एफडी (FD) और सेविंग अकाउंट पर ब्याज दर बढ़ाते हैं.
 

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About the Author

Kriyanshu Saraswat

Kriyanshu Saraswat

क्रियांशु सारस्वत वरिष्ठ बिजनेस जर्नलिस्ट (Business Journalist) हैं, उन्हें डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 साल का अनुभव है. मौजूदा समय में वह Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में बतौर 'असिस्टेंट न्यूज एडिटर' कार्यरत हैं. क्रियांशु को बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, टैक्सेशन, कमोडिटी और सरकारी योजनाओं आदि से जुड़ी खबरों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में महारथ हासिल है. Zee News से पहले क्रियांशु ने टाइम्स इंटरनेट, हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला की वेबसाइट में अहम संपादकीय जिम्मेदारियां निभाई हैं. इस दौरान क्रियांशु ने ऑटो, टेक्नोलॉजी और लाइफस्‍टाइल लीड की जिम्मेदारी संभाली है. अभी क्रियांशु बिजनेस लीड हैं. यूपी से ताल्‍लुक रखने वाले क्र‍ियांशु पत्रकार‍िता में पोस्ट ग्रेजुएट हैं.
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