RBI CRR Rule: रिजर्व बैंक की FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम से बैंकों में भारी नकदी हो गई थी. सितंबर में यह सरप्लस रिकॉर्ड लेवल करीब 11 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया था. इसे कंट्रोल करने के लिए आरबीआई (RBI) की तरफ से अलग-अलग कदम उठाए जा रहे हैं. वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) के बाद अब केंद्रीय बैंक ने देश के बैंकिंग सिस्टम को लेकर बेहद अहम फैसला सुनाया है. आरबीआई की तरफ से जारी किये गए आदेश के अनुसार 16 अक्टूबर से बैंकों को अपने कैश का ज्यादा हिस्सा कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) डेली बेसिस पर रिजर्व बैंक के पास जमा रखना होगा. इस नए कदम का मकसद बैंकों के पास मौजूद नकदी को कम करना है. आइए समझते हैं आखिर आरबीआई का यह आदेश है क्या और बाजार पर इसका क्या असर होने वाला है?
रिजर्व बैंक (RBI) के नियम के अनुसार हर बैंक को रोजाना के आधार पर कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) मेंटेन करना होता है. अभी तक बैंकों को अपनी तय लिमिट का 90% हिस्सा रोजाना मेंटेन करना होता था. लेकिन अब इसे बढ़ाकर 99% कर दिया गया है. नए नियम को 16 अक्टूबर से लागू किया जाएगा. इस नियम के बाद बैंकों को सीआरआर (CRR) के तौर पर पहले से ज्यादा नकदी रखनी होगी.
अभी तक कई बार बैंक किसी दिन कम कैश रखते थे. इसके बाद अगले हफ्ते वो ज्यादा पैसा रखकर 15 दिन का एवरेज 100% पूरा कर लेते थे. लेकिन अब रिजर्व बैंक के नए नियम के अनुसार बैंकों को एवरेज मेंटेन करने के लिए एक दिन कम और फिर दूसरे दिन ज्यादा पैसे रखने की छूट नहीं मिलेगी. अब उन्हें हर दिन पूरा 99% बैलेंस मेंटेन करना जरूरी होगा.
बैंकिंग सेक्टर से जुड़े जानकारों का मानना है कि नए कदम से कुल सीआरआर (CRR) की दर में किसी तरह की कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है. इसलिए इस नियम के लागू होने के बाद मार्केट से अचानक कोई बहुत बड़ा पैसा बाहर नहीं निकलेगा. हालांकि, इसका यह असर होगा कि बैंकों के पास रोजाना पैसे इस्तेमाल करने की छूट पहले के मुकाबले कम हो जाएगी. इसका मकसद मार्केट में मौजूद अतिरिक्त लिक्विडिटी (Liquidity) को कंट्रोल करना है.
आरबीआई (RBI) गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि बैंकिंग सिस्टम में जो भी सरप्लस लिक्विडिटी है, वह आने वाले समय में धीरे-धीरे कम हो जाएगी. अगस्त और सितंबर में विदेशी पूंजी आने के बाद बैंकों के पास काफी पैसा जमा हो गया था. इसे कम करने के लिए रिजर्व बैंक की तरफ से अलग-अलग कदम भी उठाए गए हैं. आरबीआई डेटा के अनुसार पिछले दिनों लिक्विडिटी सरप्लस 3.92 लाख करोड़ रुपये के आसपास दर्ज किया गया.
रिजर्व बैं के नए नियम का सीधे तौर पर आम लोगों के सेविंग अकाउंट या उनकी एफडी पर किसी तरह का असर नहीं होगा. यह पूरी तरह से बैंकों के पास मौजूद सरप्लस लिक्विडिटी से जुड़ा मामला है. हालांकि, इससे बैंकिंग सिस्टम में चीजें बेहतर होंगी और RBI को रोजाना के कैश को संभालने में ज्यादा आसानी होगी.
आरबीआई ने सरप्लस नकदी (Surplus Lquidity) को कम करने के लिए पिछले दिनों कई कदम उठाए हैं. FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम के तहत करीब 133 अरब डॉलर आने के बाद रिजर्व बैंक ने इसे कंट्रोल करने के लिए ये कदम उठाए हैं-
VRRR नीलामियां
वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) रिजर्व बैंक (RBI) का अहम लिक्विडिटी मैनेजमेंट टूल है. इसका यूज बैंकिंग सिस्टम से सरप्लस लिक्विडिटी (surplus liquidity) निकालने के लिए किया जाता है. इसके तहत जब बैंकों के पास कैश ज्यादा हो जाता है तो RBI रिवर्स रेपो के जरिये पैसा अपने पास रखता है. इसके लिए नीलामियां की जाती हैं और बैंक अपनी सरप्लस लिक्विडिटी केंद्रीय बैंक के पास जमा करके ब्याज कमाते हैं. इसका असर यह होता है कि कुछ समय के लिए नकदी सिस्टम से कम हो जाती है.
ओपन मार्केट ऑपरेशंस से बॉन्ड बिक्री
सितंबर के दौरान रिजर्व बैंक ने कई किश्तों में एक लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड की बिक्री की है. कल आरबीआई ने फिर से 25,000 करोड़ रुपये के बॉन्ड बेचने का ऐलान किया है. यह बिक्री ओपन मार्केट सेल के आधार पर की जाएगी. इस कदम से बैंकों का पैसा सीधा आरबीआई के पास चला जाता है और बैंकों के पास पैसा कम हो जाता है.
डॉलर-रुपये स्वैप
डॉलर-रुपये स्वैप (Dollar Rupee Sell Buy Swaps) में केंद्रीय बैंक अलग-अलग बैंकों को डॉलर की बिक्री करता है और बाद में वापस खरीदने का वायदा किया जाता है. इससे बैंकों के पास मौजूद कैश तुरंत सिस्टम से निकल जाता है. सितंबर के महीने में अलग-अलग स्वैप्स और स्पॉट डॉलर सेल से काफी नकदी कम हुई है.
आरबीआई की तरफ से उठाए जाने वाले इन कदम से बैंकिंग सिस्टम का सरप्लस लिक्विडिटी सितंबर रिकॉर्ड लेवल करीब 11 लाख करोड़ रुपये से घटकर चार से पांच लाख करोड़ रुपये पर आ गया है. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी इसको लेकर कहा था कि मौजूदा फाइनेंशियल ईयर 2027 के दौरान सरप्लस लिक्विडिटी को अलग-अलग कदम के जरिये कम कर जाएगा. इन कदम का इस्तेमाल करके महंगाई पर लगाम लगाई जा सकती है.