अमेरिका से दूरी, मंदी से मजबूरी...भारत में दिखा बड़ा बाजार, इसलिए शी हुए आने को तैयार!
BRICS SUMMIT 2026: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट में शामिल होने भारत आ रहे हैं. उनके इस दौरे के पीछे की कहानी भी समझनी जरूरी है. शी के इस दौरे से भारत और चीन को क्या हासिल होगा और क्यों अमेरिका इससे घबरा रहा है ?
BRICS Summit 2026: शी जिनपिंग भारत आएंगे या नहीं इसका सस्पेंस चीन ने ब्रिक्स समिट शुरू होने के 48 घंटे पहले खत्म कर दिया. चीन के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि कर दी है कि 12-13 सितंबर को शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं. साल 2020 में गलवान तनाव के बाद पहली बार शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 11 सितंबर को ही दिल्ली पहुंच रहे हैं. ब्रिक्स समिट में शी जिनपिंग का शामिल होना भारत के ग्लोबल लीडर के तौर पर बन रही इमेज को और मजबूत करेगा. वहीं, शी जिनपिंग का भारत में आयोजित होने वाले इस समिट में शामिल होना चीन की भी डिमांड है. चीन की अर्थव्यवस्था जिस मुहाने पर पहुंच चुकी है, जहां शी भारत जैसे बड़े बाजार को अनदेखा नहीं कर सकते हैं. अगर ये कहे कि शी जिनपिंग का भारत आना चीन की जरूरत है, तो गलत नहीं होगा.
48 घंटे पहले कन्फर्म हुआ शी जिनपिंग का टिकट
सीमा विवाद अपनी जगह है, लेकिन बीजिंग की अर्थव्यवस्था के लिए भारत ऑक्सीजन से कम नहीं है. इसे समझने के लिए पहले चीन की गिरती इकोनॉमी पर एक नजर डालते हैं. हालांकि, चीन अपने आर्थिक डेटा को सार्वजनिक नहीं करता है, लेकिन उसकी खस्ताहालत किसी से छिपी नहीं है. रियल एस्टेट की मंदी ने इसे आर्थिक अंधकार में धकेल दिया है. एक नजर चीन की अर्थव्यवस्था पर...
चीनी का GDP ग्रोथ सिर्फ 4.3% की रफ्तार से चल रहा है, भारत ने हाल ही में 7.8 फीसदी के ग्रोथ हासिल कर लिया है.
रिटेल कंज्यूमर ग्रोथ: वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के डेटा के मुताबिक अप्रैल 2026 में चीन का रिटेल कंज्यूमर ग्रोथ सिर्फ 0.2% हैं, जो 2022 के बाद से सबसे कम है.
चीन का गिरता निवेश: चीन में जनवरी-अप्रैल 2026 के दौरान कुल FDI 287.6 अरब युआन (करीब $42.5 अरब) रहा, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 10.3% कम है. पूरे 2025 में चीन का कुल FDI 747.6 अरब युआन रहा था, जो सालाना आधार पर 9.5% कम था.
चीन का गिरता रियल एस्टेट: चीन में मंदी की शुरुआत उसके रियल एस्टेट सेक्टर की बर्बादी से हुई. एवरग्रांडे जैसी चीन की बड़ी रियल एस्टेट कंपनियां दिवालिया हो गई.बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स की रिपोर्ट कहती है कि चीन का प्रॉपर्टी इंडेक्स में साल 2021 से 2025 की बीच 23% से अधिक की गिरावट आई है. इसका रियल एस्टेट इंडेक्स 1.12 % पर पहुंच चुका है. चीन का रियल एस्टेट 20 साल पीछे पहुंच चुका है.
चीन में बेरोजगारी चरम पर: जुलाई 2026 में चीन की बेरोजगारी दर बढ़कर 5.2% हो गई.
चीन के बैंकिंग सेक्टर नेट इंटरेस्ट मार्जिन वित्त वर्ष 2025-2026 में गिरकर मात्र 1.4% पर आ गया है.
ब्रिक्स ना आकर अपना नुकसान करते शी जिनपिंग
अर्थशास्त्री डॉ शरद कोहली कहते हैं कि:
भारत के बढ़ते महत्व को चीन इग्नोर नहीं कर सकता है. जिस तरह से भारत की ग्लोबल लीडर के तौर पर छवि बन रही है. चीन उसे समझ चुका है. चीन ब्रिक्स का फाउंडिंग मेंबर है. 11 पूर्ण सदस्य, 10 पार्टनर सदस्य वाले संगठन के पास दुनिया की आधी आबादी, ग्लोबल GDP का 41 % हिस्सा और ग्लोबल ट्रेड का 26% हिस्सा है. ये G20 समूह से बड़ा हो चुका है. इसे तो मिनी UN के तौर पर देखा जा रहा है . ऐसे में चीन इस समिट को इग्नोर करने की गलती नहीं करेगा. जिस तरह से जियो पॉलिटिक्ल हालात बने है, चीन का तेल आयात फंसा हुआ है, शी जिनपिंग इस समिट में उसका हल तलाशने की कोशिश करेंगे. सीधे-सीधे शब्दों में कहें, जियो पॉलिटिकल और जियो इकोनॉमिकल ग्लोबल ऑर्डर बदल रहा है और उस बीच भारत ब्रिक्स समिट का आयोजन कर रहा है. उसे जो अटेड नहीं करेगा, वो खुद अपना नुकसान करेगा.
अमेरिका से ट्रेड वॉर के बीच चीन के लिए भारत क्यों है जरूरी
अमेरिका और चीन के बीच का टकराव सालों से जारी है.राष्ट्रपति डोनाल्ड टंप की दूसरे कार्यकाल में ये और बढ़ चुका है. टैरिफ, ट्रेड , रेअर अर्थ, सेमीकंडक्टर के साथ-साथ ईरान और रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका और चीन के बीच ठनती रही है. ऐसे में भारत चीन के लिए संजीवनी है. भारत का बड़ा बाजार चीन की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है.ब्रिक्स में शामिल ना होकर चीन भारत के साथ सुधरते संबंधों को पीछे नहीं धकेलना चाहते हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत-चीन के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार...
- कुल व्यापार: 151.10 अरब डॉलर
- चीन से आयात: 131.63 अरब डॉलर
- चीन को निर्यात: 19.47 अरब डॉलर
क्या चीन ऐसे बाजार से दूर होना चाहेगा. यकीनन नहीं. ऐसे में ब्रिक्स आने का फैसला शी जिनपिंग के बड़ी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है. हालांकि शी जिनपिंग का ये दौरा सिर्फ चीन के लिए ही जरूरी नहीं है, भारत के पक्ष भी भी कई बड़े पहलू हैं, जिन्हें समझना जरूरी है.
ब्रिक्स 2026 में शी जिनपिंग के भारत दौरे से क्या हासिल हो सकता है?
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है, बावजूद इसके शी जिनपिंग का ये दौरा बेहद अहम है.12 सितंबर को शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच द्विपक्षीय बैठक हो सकती है. इस बैठक में दोनों देशों के नेताओं के बीच कई बड़े मुद्दों पर बातचीत और समझौते हो सकते हैं. चीन पहले भी रेयर अर्थ की सप्लाई को लेकर भारत को भरोसा दे चुका है. ऐसे में उम्मीद है कि इस बैठक में इसपर जरूरी सहमति बन सकती है. भारत और चीन के बीच भारी व्यापार असंतुलन है, जिसे कम करने पर भी बातचीत हो सकती है.
रेअर अर्थ
सेमीकंडक्टर
चीनी निवेश
चीन को निर्यात बढ़ाने पर फोकस
चीनी कंपनियों के लिए रास्ते खोलने पर विचार
दिल्ली यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर डॉ दिप्ती तनेजा कहती हैं...
सीमा विवाद पर बातचीत होने की उम्मीद नहीं है. दोनों देशों के बीच ट्रेड चर्चा का सबसे अहम मुद्दा होगा. भारत चीन के साथ व्यापार संतुलन बनाने पर जोर देगा. दोनों देशों के बीच नए कॉरिडोर पर चर्चा होगी. भारतीय मुद्रा रुपये और चीनी युआन के बीच व्यापार बढ़ाने पर समझौता हो सकता है, साझा करेंसी पर बातचीत हो सकती है.
चीनी राष्ट्रपति के दौरे से भारत क्या हासिल कर सकता है ?
एक तरफ खाड़ी युद्ध और दूसरी तरफ अमेरिका से दुनियाभर के देशों की बढ़ती नाराजगी के बीच भारत ब्रिक्स का आयोजन कर रहा है, जो उसके वैश्विक छवि को मजबूत करेगा. मार्केट एक्सपर्ट CA मुकेश जैन कहते हैं ...
चीन के साथ समझौता अगर होता है, तो भारत में निवेश बढ़ेगा. निवेश से नौकरियां बढ़ेगी. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा. जिससे शेयर बाजार को भी बूस्टर डोज मिलेगा. ब्रिक्स देशों का बाजार बहुत बड़ा है, अगर चीन चालाकी नहीं दिखाए, तो ब्रिक्स में ही कंज्मशन बढ़ेगा और पश्चिमी देशों का दबाव कम होगा.
शी जिनपिंग के ब्रिक्स समिट में भारत आने पर अमेरिका को क्यों झटका लगा सकता है ?
मुकेश जैन कहते हैं ..
ट्रंप बहुत जल्दी रिएक्शन देते हैं. ऐसे में हो सकता है कि वो भारत में रूस-चीन जैसे शक्तिशाली देशों के मिलन से बिलबिलाएं. हालांकि ,भारत की पूरी कोशिश होगी कि वो ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी ना दिखने दे.
अमेरिका के लिए रूस-चीन और भारत का त्रिशंकु बड़ा खतरा है. जिस तरह से भारत और चीन के बीच व्यापार बढ़े हैं, जो बीते एक दशक में दोगुना हो चुका है. रूस से तेल आयात की हिस्सेदारी 41 फीसदी तक पहुंच चुकी है , अमेरिका को साइडलाइन होने का खतरा सता रहा है. वहीं उसे ये भी डर सता रहा है कि अगर चीन ने रेअर अर्थ और सेमीकंडक्टर को लेकर भारत के साथ डील कर ली, तो उसके लिए संकट पैदा हो सकता है.
भारत और चीन के बीच चुनौतियां
सीमा विवाद और संबंधों में खटास के बीच भारत और चीन के बीच बिजनेस रिलेशन अभी भी भरोसे की कमी से घिरे हैं. भारत चीनी कंपनियों के निवेश और संवेदनशील सेक्टरों में उनकी मौजूदगी को सुरक्षा के लिए खतरा मानता है. वीजा, कस्टम क्लियरेंस, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दे कारोबार को प्रभावित करते हैं. मोदी-शी जिनपिंग के बीच बैठक का असली टेस्ट यही है कि कैसे दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों में भरोसा और कारोबार बढ़ाया जाए .