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Petrol Diesel Export Duty: सरकार ने हर 15 दिन में होने वाली समीक्षा में पेट्रोल-डीजल और जेट फ्यूल (ATF) के एक्सपोर्ट पर लगने वाले टैक्स को घटा दिया है. नोटिफिकेशन के अनुसार पेट्रोल के एक्सपोर्ट पर लगने वाली ड्यूटी को 1.5 रुपये लीटर से घटाकर 0.5 रुपये लीटर कर दिया गया है. वहीं, डीजल पर एक्सपोर्ट ड्यूटी को 25 रुपये लीटर से घटाकर 20 रुपये कर दिया गया है. जेट फ्यूल के निर्यात पर लगने वाले टैक्स को 19 रुपये से घटाकर 15 रुपये लीटर कर दिया गया है. डीजल के मामले में स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) को 24 से घटाकर 20 रुपये लीटर किया गया है. इसके अलावा रोड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को खत्म कर दिया गया है. सरकार ने यह फैसला ऐसे समय में लिया है, जब इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल की सप्लाई को लेकर क्राइसिस बनी हुई है.
जब सरकार की तरफ से पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी या टैक्स घटाने का ऐलान किया जाता है तो वाहन मालिकों के मन में यही उम्मीद जागने लगती है कि अब तेल सस्ता मिलेगा. लेकिन, सवाल यह है कि क्या टैक्स में की गई हर कटौती का फायदा आम आदमी को मिलता है या इसका बड़ा हिस्सा सरकारी और प्राइवेट ऑयल कंपनियों (OMCs) के अकाउंट में चला जाता है? आइए समझते हैं इस टैक्स कटौती की पूरी कैलकुलेशन और इसका फायदा असल में किसे मिलता है.
टैक्स में की जाने वाली कटौती का असर आम ग्राहकों की जेब पर तब दिखता है, जब पेट्रोल पंपों पर रिटेल प्राइस (Retail Prices) तुरंत घटाया जाता है. पेट्रोल और डीजल सस्ता होने से वाहन चलाने का खर्च कम होने के साथ ही माल ढुलाई (Logistics) सस्ती होती है. इसका असर बाजार में सस्ते फल, सब्जियां और रोजमर्रा की चीजों पर भी देखने को मिलता है. तेल सस्ता होने से खुदरा महंगाई दर का आंकड़ा नीचे आता है और किसी भी परिवार का मंथली बजट बैलेंस्ड रहता है.
टैक्स कटौती का असली फायदा ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMC) को मिलता है. कई बार इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल (Crude Oil) के दाम काफी बढ़ जाते हैं, लेकिन कंपनियां घरेलू बाजार में दाम नहीं बढ़ा पातीं. ऐसे में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को भारी घाटा सहना पड़ता है. इस दौरान जब सरकार एक्साइज ड्यूटी या टैक्स घटाती है तो कंपनियां पेट्रोल पंपों पर दाम घटाने के बजाय उस टैक्स छूट का फायदा अपने पुराने नुकसान की भरपाई के लिए करती हैं. ऐसे हालात में सीधी राहत आम जनता को न मिलकर तेल कंपनियों को मिलती है.
कच्चा तेल महंगा होने पर टैक्स कटौती के बेस पर तेल के दाम में होने वाली बढ़ोतरी को रोकना होता है. इससे कंपनियों का घाटा कम होता है और आम जनता को अचानक लगने वाले महंगाई के झटके से बचाया जाता है. मिडिल ईस्ट में तनाव, सऊदी अरब के ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले और अमेरिका-ईरान के बीच जारी जंग से बाजार में उथल-पुथल मची हुई है. सऊदी अरब की तरफ से एशियाई रिफाइनरियों को ओमान के पोर्ट के जरिये एक्स्ट्रा क्रूड ऑयल सप्लाई करने की पेशकश किये जाने के बाद दाम में थोड़ी नरमी आई है. यदि क्रूड ऑयल के दाम सामान्य हैं और सरकार उस समय टैक्स घटाती है तो इसका ज्यादा फायदा सीधे ग्राहकों को घटती कीमत के रूप में मिलता है.
पेट्रोल-डीजल पर मिलने वाला टैक्स केंद्र और राज्य सरकार के रेवेन्यू (Tax Revenue) का बहुत बड़ा आधार होता है. जब भी टैक्स घटाया जाता है तो सरकारी खजाने को रेवेन्यू लॉस होता है. अगर यह कटौती महंगाई को काबू में रखकर मार्केट में डिमांड (Demand) बढ़ाती है तो इससे इकोनॉमी को मजबूती मिलती है. हालांकि, रेवेन्यू कम होने से बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) और ग्रोथ योजनाओं के बजट पर दबाव बनता है.
टैक्स कटौती का असली फायदा किसे मिलेगा? यह उस समय की इकोनॉमिक कंडीशन पर निर्भर करता है. जब इंटरनेशनल मार्केट में कीमत कम होती हैं तो टैक्स कटौती का सीधा फायदा 'आम आदमी' को दिया जाता है. लेकिन जब ग्लोबल उथल-पुथल या जियो-पॉलिटिकल टेंशन के कारण क्रूड ऑयल के दाम में तेजी देखी जाती तब यह कटौती 'तेल कंपनियों' के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है. इससे तेल कंपनियां घाटे से उबरकर तेल की कीमत को बेलगाम होने से रोकती हैं.