BRICS Summit 2026: 12-13 सितंबर को पूरी दुनिया का नजर नई दिल्ली पर होगी. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ भारत में होंगे. खाड़ी युद्ध तनाव के बीच सऊदी अरब, यूएई और ईरान को एक मंच पर लाने की चुनौती भारत के सामने होगी. युद्ध, संघर्ष और आर्थिक संकट के बीच होने वाली ये समिट और खास हो जाती है. हमारे-आपके लिए ये समिट इसलिए जरूरी है, क्योंकि इस बार 18वें ब्रिक्स समिट का अध्यक्षता भारत कर रहा है.
25 शहर, 350 से अधिक बैठकों के बाद फाइनली 12-13 सितंबर को दिल्ली से भारत मंडपम में ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्ष मिलेंगे. ब्रिक्स के नाम से लेकर उसकी जरूरत, उसकी इकोनॉमी, उसकी आर्थिक और सैन्य ताकत को समझते हैं. ये भी जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस समिट से भारत को क्या हासिल होगा? क्यों अमेरिका ब्रिक्स देशों के इस समिट से घबराता है और ब्रिक्स समिट से आपको-हमें क्या मिलेगा?
सवाल: क्या है ब्रिक्स, कहां से मिला ये नाम ?
जवाब: ब्रिक्स (BRICS) पांच सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह हैं. इस एक मंच के जरिए उभरती हुई तेज आर्थिक शक्ति वाले विकासशील देशों को एक मंच पर लाने और पश्चिमी देशों के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश होती है. BRICS की नींव साल 2006 में रखी गई. शुरुआती देश ब्राजील, रूस, भारत और चीन थे, इसलिए पहले इसका नाम BRIC था. बाद में साउथ अफ्रीका के जुड़ने के बाद ये BRICS बन गया.
सवाल: कहां से मिला BRICS नाम ?
जवाब: साल 2001 में गोल्डमैन सैक्स इंवेस्टमेंट बैंक के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने 'ब्रिक' नाम दिया था. ब्रिक्स के संस्थापक देश ब्राजील, रूस, भारत और चीन की विचारधारा अलग-अलग थी, लेकिन इनके नेताओं ने साथ मिलकर एक संगठन तैयार करने का फैसला शुरू किया.
सवाल: ब्रिक्स की जरूरत क्यों पड़ी ?
जवाब: ब्रिक्स से पहले दुनिया में जितने भी ऐसे मंच और संगठन थे, उनमें अमेरिका और यूरोप के देशों का काफी प्रभाव था. चाहे 1975 में बना G7 (Group of Seven) हो या 2001 में बना SCO (Shanghai Cooperation Organisation). इन संगठनों में एशिया और अफ्रीका के देशों को ज्यादा महत्व नहीं मिल पाता था, जिसके बाद ब्रिक्स की जरूरत को समझा गया और 4 शक्तिशाली विकासशील देश एक साथ जुड़े. वर्तमान में BRICS यूरोपियन यूनियन (EU) को पीछे छोड़कर दुनिया का तीसरा ताकतवर आर्थिक संगठन बन चुका है।
सवाल: ब्रिक्स के आज कितने सदस्य हैं ?
जवाब: वर्तमान में ब्रिक्स (BRICS) संगठन के कुल 11 पूर्ण सदस्य देश हैं.इसके अलावा,ब्रिक्स में 10 पार्टनर देश भी शामिल हैं. 20 सालों में ब्रिक्स देशों की संख्या 4 से बढ़कर 21 पर पहुंच गई है.
ब्राजील
रूस
भारत
चीन
दक्षिण अफ्रीका
मिस्र
इथियोपिया
ईरान
संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
सऊदी अरब
इंडोनेशिया (जनवरी 2025 में शामिल)

सवाल: ब्रिक्स का काम क्या है ?
जवाब: ब्रिक्स का मुख्य काम वैश्विक संस्थाओं में अन्य देशों की भागीदारी बढ़ाने के लिए वकालत करना है. सदस्य देशों की आर्थिक नीतियों को देखना और उन्हें लागू करवाना है. ब्रिक्स देशों के बीच अमेरिकी डॉलर पर से निर्भरता कम करने पर भी इसका जोर है. ब्रिक्स एक अलग फाइनेंस सिस्टम बनाने की भी तैयारी कर रहा है. विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की तरह काम करने वाला न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) गठित किया गया है.
सदस्य देशों के बीच व्यापार, कृषि, ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करना
सदस्य देशों के बीच विकास कार्यों के लिए फंड जुटाना, वित्तीय सुरक्षा के लिए कॉन्टिजेंट रिजर्व एग्रीमेंट में मदद करना.
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच ब्रिक्स देशों की आवाज बनना.
वैश्विक मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच साझा रुख अपनानाय
पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रभुत्व के संतुलन में काम करना
सवाल: ब्रिक्स समिट क्यों आयोजित क्या जाता है ?
जवाब: ब्रिक्स समिट में साल में एक बार BRICS से सदस्य देश मिलते हैं. सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ वैश्विक हालातों की चर्चा होती है. इस बार 18वां ब्रिक्स समिट नई दिल्ली के भारत मंडपम में हो रहा है. इससे पहले साल 2012, 2016, 2016 में भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता की है.
सवाल: ब्रिक्स की इकोनॉमी कितनी है ?
जवाब: दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स की करीब 40% की हिस्सेदारी है.
दुनिया की 49.5 % आबादी ब्रिक्स देशों की है.
वैश्विक व्यापार में ब्रिक्स की हिस्सेदारी 37.3% से 40% की है.
सवाल: दुनिया पर ब्रिक्स का कितना कंट्रोल ?
जवाब: BRICS+ ग्रुप कुल इकॉनमी लगभग 31.7 ट्रिलियन डॉलर की है.
दुनिया की कुल नॉमिनल GDP में इसका 28% हिस्सा है.
परचेसिंग पावर पैरिटी के आधार इकोनॉमी नापे, तो BRICS देशों की हिस्सेदारी ग्लोबल GDP का 40% है, जो G7 से ज्यादा है.
ग्लोबल एनर्जी मार्केट में ब्रिक्स देश 30% हिस्सा रखते हैं.

सवाल: ब्रिक्स देशों के बीच सबसे ताकतवर कौन-सा देश है ?
जवाब: ब्रिक्स के कुल GDP में अकेले चीन की हिस्सेदारी 70% की है.
भारत लगभग 13% हिस्सेदारी के साथ दूसरे नंबर पर है.
रूस की हिस्सेदारी 9% की है.
ब्राजील 7% के साथ चौथे नंबर पर है.
दक्षिण अफ्रीका की हिस्सेदारी 2% की है.
सवाल: तेल के बाजार में ब्रिक्स का दबदबा कितना है?
जवाब: ग्लोबल ऊर्जा बाजार में भी ब्रिक्स देशों का दबदबा है. रूस, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे तेल के प्रमुख उत्पादक देश इस समूह का हिस्सा है. वहीं चीन और भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ता भी इसी समूह का हिस्सा है.
सवाल: ब्रिक्स से क्यों घबराता है अमेरिका ?
जवाब: भले ही पश्चिमी देशों ब्रिक्स को कमतर आंकते हो, लेकिन अमेरिका ब्रिक्स के कदम-कदम पर नजर रखता है. ब्रिक्स देश अपनी अलग करेंसी और ब्रिक्स बैंक (न्यू डेवलपमेंट बैंक) बनाने पर विचार कर रहे हैं, जो अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है. अमेरिका ने इसे लेकर कई बार आपत्ति भी जताई है. ब्रिक्स करेंसी की शुरुआत रूस के कजान में आयोजित 16वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में की गई थी. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस संगठन के देशों को अपनी-अपनी करेंसी में कारोबार पर जोर दिया था. ब्रिक्स करेंसी के जरिए अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देने की तैयारी हो रही है.
ब्रिक्स करेंसी के अलावा न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) अमेरिका की टेंशन बढ़ाने के लिए काफी है. साल 2014 में ब्रिक्स समिट में 100 अरब डॉलर की शुरुआती निवेश के साथ न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना की गई थी.

सवाल: ब्रिक्स समिट में सबसे ज्यादा किस बात की चर्चा है ?
जवाब: ब्रिक्स देश में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर होगी कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत आ सकते हैं, हालांकि उनके भारत दौरे को लेकर फिलहाल बीजिंग की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. वहीं रूसी राष्ट्रपति पुतिन ब्रिक्स समिट में शामिल होने दिल्ली आ रहे हैं. भारत-रूस और चीन एक साथ फिर से पावर मंच पर होंगे. वहीं तीन सबसे बड़े तेल भंडार वाले देश ईरान, UAE और सऊदी अरब एत मंच पर होंगे. खाड़ी युद्ध और होर्मुज बंद करने के कारण वैश्विक तनाव के बीच ईरान के साथ ये दो गल्फ देश भी भारत में एक साथ एक मंच पर मौजूद होंगे.
सवाल: ब्रिक्स समिट आयोजित कर भारत को क्या फायदा हो सकता है ?
जवाब: ये चौथी बार है, जब भारत ब्रिक्स समिट की अगुवाई कर रहा है. ये समिट ऐसे वक्त में आयोजित हो रही है, जब पूरी दुनिया युद्ध और तेल-ऊर्जा संकट का सामना कर रही है. भारत के लिए इस समिट से 6 बड़े फायदे जुड़े हैं.
ऊर्जा संकट का हल: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है. खाड़ी युद्ध और होर्मुज की नाकेबंदी के चलते भारत के कच्चे तेल का का इंपोर्ट बिल 61% बढ़कर करीब 50 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि आयात की मात्रा घटी है. मार्च से अगसत के बीच भारत पर करीब 22 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ बढ़ा है.सप्लाई का नया विकल्प इस समस्या को हल कर सकता है. ब्रिक्स की टेबल पर उसे भर्जा का नया रास्ता मिल सकता है.
व्यापार का नया विकल्प, टैरिफ का इलाज: ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल को टैरिफ का पर्याय बना दिया. पिछले अगस्त में भारतीय सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया गया. हालांकि बाद में ये खिसककर 18 फीसदी पर आया, लेकिन ट्रंप को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है. ऐसे में ब्रिक्स की मेज पर भारत नए व्यापारिक साझेदारों का विकल्प तलाश सकता है. ब्रिक्स में यूपीआई,नए 'पेमेंट ब्रिज' पर भारत को जोर होगा, ताकि डॉलर पर निर्भरता कम किया जा सके.
रूस के साथ मजबूत संबंध: रूस के साथ भारत के संबंध मजबूत है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस अब भी भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का सप्लायर है. ब्रिक्स के मंच पर भारत रूस बिना पश्चिमी साझेदारी से समझौता किए खुलकर संबंधों का विस्तार कर सकते हैं.
चीन के साथ संतुलन: सीमा विवाद के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट में हिस्सा दिल्ली पहुंच रहे हैं. सीमा विवाद के बावजूद व्यापार संतुलन की कोशिश होगी. ब्रिक्स का मंच चीन के साथ सीधे संवाद का मंच बनेगा.
ब्रिक्स देशों के व्यापार को बढ़ावा: ब्रिक्स देशों का आपसी कारोबार 1.17 लाख करोड़ पर पहुंच चुका है. भारत जैसे विकासशील देश के लिए व्यापार बाजार की तलाश का ये बेहतर मौका बन सकता है.
सवाल: ब्रिक्स समिट में भारत के सामने चुनौती क्या होगी?
जवाब: ब्रिक्स समिट में भारत के विदेशी नीति की परीक्षा होगी. भारत को पश्चिमी देशों के साथ संबंधों के बीच ब्रिक्स की मेजबानी करनी है. भारत ने यूरोपीय संघ के साथ मदर ऑफ ऑल डील की है. ब्रिटेन-ओमान के साथ करार किया है. अब उसके सामने ब्रिक्स के देश हैं. खासकर चीन, जो ब्रिक्स को 'पश्चिम-विरोधी मोर्चा' बनाने पर तुला रहता है. वहीं ईरान, यूएई, सऊदी अरब को एक मंच पर लाना भी चुनौती होगा.