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BRICS Vs Dollar: 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अगुआई भारत कर रहा है. 12-13 सितंबर को राजधानी दिल्ली में ब्रिक्स देशों के तमाम नेता जुटेंगे. रूस से राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ब्रिक्स समिट से एक दिन पहले 11 सितंबर को ही भारत पहुंच रहे हैं, जहां वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी दिल्ली आ रहे हैं. ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, UAE जैसे तमाम ब्रिक्स सदस्य देश के प्रतिनिधियों का जमावड़ा भारत में होगा. भारत में आयोजित इस ब्रिक्स समिट पर अमेरिका की निगाहें होगी. अमेरिका, जो हमेशा से ब्रिक्स विरोधी रहा है, ब्रिक्स को डॉलर के खिलाफत का मंच बताता रहा है. अमेरिका के इन आरोपों पर रूस ने खुलेतौर पर पलटवार किया है.
रूस के राष्ट्रपति राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने पत्रकारों के बात करते हुए ब्रिक्स बनाम डॉलर की लड़ाई के आरोपों पर अमेरिका को जवाब दिया. ब्रिक्स देशों के साथ 90 फीसदी व्यापार नेशनल करेंसी में करने वाले रूस ने साफ कहा कि उनका मकसद डी-डॉलराइजेशन नहीं, बल्कि भुगतान के पेमेंट के विकल्पों को बढ़ावा देना है. उन्होंने साफ शब्दों में दोहराया कि ब्रिक्स देश डॉलर या अमेरिका के खिलाफ नहीं, बल्कि सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों में फैसले लेते हैं. जहां तक डॉलर के खिलाफ वाली बात है, अमेरिकी नीतियां डॉलर को नुकसान पहुंचा रही है. अगर डॉलर के रिजर्व करेंसी बनाए रखना है, तो ये भी तय करना होगा कि उसपर भरोसा कम ना हो. अमेरिकी नीतियों खुद डॉलर पर दुनिया के देशों का भरोसा कम कर रहे हैं.
रूसी प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने आरोप लगाया कि BRICS देश नहीं, बल्कि अमेरिका खुद ‘डी-डॉलराइजेशन’ की दिशा में काम कर रहा है.रूस का कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसे डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था से दूर जाने और वैकल्पिक भुगतान माध्यमों तलाशने में बढ़ाया. अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसे लोकल करेंसी में व्यापार करने के लिए बढ़ावा दिया. आज रूस 90 फीसदी ब्रिक्स देशों के साथ लोकल करेंसी में व्यापार करता है, जिससे डॉलर बाहर हो चुका है.
अमेरिका की ओर से बार-बार आरोप लगते रहे हैं कि ब्रिक्स डॉलर के खिलाफ काम करता रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो धमकी दे दी कि अगर ब्रिक्स देशों ने डॉलर के खिलाफ करेंसी लाने की कोशिश की, तो 100 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा. ब्रिक्स और डॉलर के बीच के इस मतभेद और अमेरिका के आरोपों को समझने के लिए Zee News ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर दीप्ति तनेजा से बात की...
सवाल: ब्रिक्स पर अमेरिका की ओर से डी-डॉलराइजेशन का आरोप लगता रहा है, लेकिन क्या इसके लिए खुद अमेरिका जिम्मेदार है, जैसा की रूस भी कह रहा है?
जवाब: अमेरिका अपनी आर्थिक, सैन्य और तकनीकी ताकत का इस्तेमाल करके वैश्विक मंच पर वर्चस्व का फायदा उठाया है.अमेरिका ने रूस पर तमाम प्रतिबंध लगाए और रूस से अमेरिकी डॉलर और यूरो के इस्तेमाल का अधिकार तक छीन लिया गया.अमेरिका ने अपनी सुपरपावर ताकत का नाजायज फायदा उठाते हुए रूस के साथ कोल्ड वॉर की शुरुआत की. ऐसे में रूस के पास अपनी लोकल करेंसी रूबल में व्यापार करने के अलावा दूसरा कौन-सा विकल्प बचता है. रूस खुद में एक ताकतवर देश है. आज वो 90% ब्रिक्स देशों के साथ लोकल करेंसी में कारोबार करता है, जिसे अमेरिका डी-डॉलराइजेशन समझ रहा है, लेकिन ये उन देशों की जरूरत हैं.
डॉलर की धौंस दिखाकर अमेरिका कभी भी किसी भी देश पर प्रतिबंध लगाता रहा है, कभी टैरिफ की धमकी देता रहा है, जो धीरे-धीरे डॉलर पर भरोसे को कम कर रहा है. अमेरिका का ये कदम ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच नेशनल करेंसी में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए वाजिब वजह है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. कोई भी देश वही कदम उठाएगा, जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए हित में हो. रूस और ब्रिक्स देश भी वही कर रहे हैं. जाहिर सी बात है कि ये अमेरिकी डॉलर की ताकत को कमजोर करेगा. जिसकी वजह से ट्रंप ब्रिक्स से नाराज रहते हैं.
सवाल: क्या इस बार ब्रिक्स समिट में ब्रिक्स करेंसी बन पाएगा?
जवाब: ब्रिक्स करेंसी बना पाना आसान नहीं है, इसके लिए कई चुनौतियां हैं. बीते कई सालों से इसकी पटकथा लिखी जा रही है, लेकिन इस साल 2026 के ब्रिक्स समिट में भी इसे तय कर पाना मुश्किल लग रहा है. यूरो की तरह ब्रिक्स को कॉमन करेंसी बनाना संभव तो है, लेकिन काफी लॉन्ग टर्म और चैलेंजिंग प्रोसेस है.उदाहरण के तौर पर यूरोपीय देश एक जियोग्राफिकल यूनिट वाले देश हैं, जबकि ब्रिक्स के सहयोगी देश विश्वभर में फैले हुए हैं. ब्रिक्स में चीन, भारत, रूस जैसे अलग-अलग अर्थव्यवस्था वाले देश हैं, जिन्हें एक मुद्रा में बांधना चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में एक करेंसी बनाने के बजाए ब्रिक्स देशों की करेंसी को जोड़ने की कोशिश करना बेहतर विकल्प हो सकता है. फोकस लोकल करेंसी में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर है. लोकल करेंसी जैसे रूबल-रूपये में व्यापार, टू-वे करेंसी सिस्टम, डिजिटल पेमेंट सिस्टम के विस्तार पर फोकस बढ़ाया जा सकता है.

सवाल सिर्फ ब्रिक्स करेंसी बनाने तक ही सीमित नहीं है. इससे कई परेशानियां और चुनौतियां जुड़ी हैं. जैसे ब्रिक्स करेंसी बनी, तो इसकी मौद्रिक नीति कौन चलाएगा ? ब्रिक्स की वैल्यू कैसे तय होगी? चीन जैसे देश अपनी करेंसी युआन का विस्तार चाहते हैं, जिसे भारत कभी समर्थन नहीं देगा. ऐसे में बीते कुछ सालों में ब्रिक्स करेंसी बनाने के बजाए अब संगठन के देशों का फोकस लोकल करेंसी में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर शिफ्ट हो रहा है. ब्रिक्स पे जैसे पेमेंट सिस्टम पर फोकस बढ़ाने की दिशा में विचार किया जा रहा है. ऐसे पेमेंट सिस्टम से ब्रिक्स देशों के बीच पेमेंट सिस्टम तेज और आसान हो सकेगा, जिसका फायदा अर्थव्यवस्था को होगा. आयात-निर्यात के बीच डॉलर पर निर्भरता खत्म होगी.

सवाल: ब्रिक्स से भारत के लोगों को क्या मिलने वाला है ?
जवाब: इस तरह के वैश्विक आयोजन से अचानक से कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता है. अगर आप सोच रहे हैं कि एकदम से महंगाई कम हो जाएगी या नौकरियां पैदा हो जाएगी तो ऐसा नहीं है. लॉन्ग टर्म में ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था को बू्स्ट मिलता है. ब्रिक्स जैसे आयोजनों से एक्सपोर्ट, निवेश को बढ़ावा मिलता है. MSME जैसे सेक्टर में निवेश के नए विकल्प खुलते हैं. कारोबार बढ़ता है और इन सब का मल्टीपायर इफेक्ट्स धीरे-धीरे आम नागरिकों तक पहुंचता है. निवेश आने से रोजगार के विकल्प आते हैं, नई फैक्ट्रियां लगती हैं. निर्यात बढ़ने से कमाई बढ़ती है.