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आरक्षण की समीक्षा को लेकर पिछले दिनों बिहार की राजनीति के दो दिग्गज नेता आपस में भिड़ गए और एक-दूसरे का इस्तीफा मांगने लगे. इसे एनडीए में एक बड़े सियासी तकरार के रूप में देखा गया. जीतन राम मांझी आरक्षण की समीक्षा में अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे तो चिराग पासवान चुनौती देते हुए कहते देखे गए कि कोई भी आरक्षण की वर्तमान स्थिति को छू भी नहीं सकता. जीतन राम मांझी का दावा था कि आरक्षण का लाभ दलितों में कुछ ही लोग ले पा रहे हैं और बाकी जातियों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है. आश्चर्य की बात यह है कि दोनों नेता ऐसे वक्त में आरक्षण को लेकर आपस में मुखर हो रहे हैं, जब बिहार में कोई दलित बचा ही नहीं. अब केवल राजनेताओं के बयानों में ही दलितों का जिक्र होता है. कागजों पर अब दलित है ही नहीं. अब आप भी सोच रहे होंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है, तो आइए हम आपको इसके पीछे की कहानी बताते हैं.
2007 में नीतीश कुमार ने चला था दांव
रामविलास पासवान की दलित राजनीति की काट के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2007 एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला था. तब की सरकार ने पासवान, रविदास, धोबी और पासी को छोड़कर शेष बची सभी दलित जातियों को महादलित कैटेगरी में डाल दिया था. इससे गैर पासवान दलित जातियों का बड़ा आधार नीतीश कुमार के पक्ष में तैयार हो गया था. यही नहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार ने खुद इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री भी बनाया था. इसका मकसद भी था कि गैर पासवान दलित जातियों को एकजुट कर अपने पक्ष में लाया जा सके. यह अलग बात है कि एक साल बाद ही जीतन राम मांझी बागी हो गए थे और उन्होंने अपना अलग दल बना लिया था. हालांकि, जब 2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन से पलटी मारकर एनडीए में आकर सरकार बनाया था, जिसमें लोजपा भी साझीदार थी, तब उन्होंने पासवान और बाकी जातियों को भी महादलित श्रेणी में शामिल कर दिया था. ऐसे में जब सभी दलित जातियां महादलित श्रेणी में शामिल कर दी गईं तो जाहिर है कि बिहार में कोई दलित बचा ही नहीं.
क्या कहता है संविधान?
हालांकि, महादलित केवल एक राजनीतिक शब्द है और इसके माध्यम से सत्ताधारी दल जातियों को लुभाने के लिए अलग अलग योजनाएं चलाती हैं. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार में जिस दलित और महादलित को लेकर राजनीति होती आ रही है, उनका संविधान में कोई उल्लेख ही नहीं है. संविधान में केवल अनुसूचित जाति का जिक्र है और उनके लिए नौकरियों, चुनाव क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था की गई है. वहीं, बिहार सरकार की ओर से महादलित विकास मिशन, विकास मित्र महाली और वास भूमि योजनाओं के स्तर पर हर अनुसूचित जाति परिवार को लाभ दिया जाता है.
संविधान का अनुच्छेद 341 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के राज्यपाल से परामर्श के बाद जातियों, मूलवंशों या जनजातियों को उस राज्य के लिए अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित करें.
संविधान का अनुच्छेद 341 (2) कहता है कि संसद कानून बनाकर इस सूची में किसी जाति को शामिल कर सकती है या बाहर कर सकती है. संविधान का यह अनुच्छेद यह भी कहता है कि इस मूल अनुसूचित जाति सूची को राज्य सरकारें नहीं बदल सकतीं. इसलिए बिहार सरकार की ओर से बनाया गया महादलित केवल एक प्रशासनिक या लोक कल्याणकारी व्यवस्था है, न कि संवैधानिक.
अनुच्छेद 366 (24) अनुसूचित जातियों को संवैधानिक परिभाषा देता है. इसके अनुसार, अनुसूचित जातियों का मतलब उन जातियों से है, जिन्हें अनुच्छेद 341 के तहत अधिसूचित किया गया है.
अनुच्छेद 335 कहता है कि संघ या राज्य सरकारें नियुक्तियों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों का ध्यान रखेगी और साथ ही प्रशासनिक दक्षता का भी ख्याल रखेगी.
अनुच्छेद 330 कहता है कि लोकसभा में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की जाएं.
अनुच्छेद 332 कहता है कि राज्य की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए.
अनुच्छेद 243D और 243T पंचायतों और नगरपालिकाओं में जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जातियों के लिए सीटों और अध्यक्ष पदों के आरक्षण की व्यवस्था करने को कहता है.
बिहार में अनुसूचित जाति की आबादी
जातीय सर्वे, 2023 के अनुसार बिहार में दलतों की आबादी कुल आबादी का 19.65 प्रतिशत है. राज्य में अनुसूचित जाति की कुल आबादी 2,56,89,820 है. इनमें 5.3 प्रतिशत पासवान यानी दुसाध जाति की आबादी है. यह संख्या और राजनीतिक प्रभाव दोनों में सबसे आगे है. शेष 14 प्रतिशत की आबादी में रविदास 5.2 प्रतिशत, मुसहर 3.08 प्रतिशत और बाकी में 19 अन्य जातियां आती हैं.