कुछ बनने की चाह में तहखानों में दम तोड़ते सपने: दिल्ली के कोचिंग हब में जान हथेली पर रखकर जीने को मजबूर बिहार के बच्चे
देश की राजधानी होने के बाद भी दिल्ली के कोचिंग हबों में मनमाने निर्माण बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो रहे हैं. हर साल कोई न कोई ऐसा हादसा होता है, जो हृदयविदारक स्मृतियां जेहन में छोड़ जाता है.
10वीं और 12वीं पास करने के बाद बिहार के अधिकांश नौजवान अपने सपनों को पूरा करने के लिए बड़े शहरों का रुख कर लेते हैं. इनमें से अधिकांश दिल्ली की ओर पलायन करते हैं. उनकी आंखों में सपना होता है अफसर बनने का, अपना जीवन संवारने का, अपने मां और बाबूजी के लिए कुछ करने का और परिवार को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने का. इन सपनों को पूरा करने के लिए वो दिल्ली आते हैं और यहां मुखर्जी नगर, जनकपुरी, द्वारका, राजेंद्र नगर, मुनीरका और लक्ष्मीनगर जैसे कोचिंग हब के आसपास की तंग गलियों में रहने लगते हैं. कुछ ही दिनों की बात है... के बहाने वो सालों तक इन गलियों में रहते हैं, जहां उनका सामना क्रूर जमीनी हकीकत से होता है. वहां जिंदा रहना ही इन बच्चों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है.
8X10 के दड़बे और बेसमेंट वाली लाइब्रेरी
दिल्ली के इन इलाकों में कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरी संचालकों ने जिस तरह नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए निर्माण कराया हुआ है, उससे छात्र और छात्राओं की जान सांसत में है. वहां न इमरजेंसी एग्जिट की व्यवस्था है और न ही वेंटिलेशन और जलभराव से निकासी का कोई इंतजाम किया गया है. ऐसे में छात्रों को 12 से 14 घंटे तक इन्हीं खतरों के बीच पढ़ाई करनी होती है.
आग का डर और असुरक्षित वायरिंग
मुखर्जी नगर सहित इन इलाकों के अधिकांश घरों में एक ही मीटर बोर्ड पर दर्जनों एयर कंडीशनर और हीटरों का लोड रहता है, जिससे स्पार्किंग का खतरा बना रहता है. लटकते नंगे तार और संकरी सीढ़ियां अकसर बड़े अग्निकांड को न्यौता देती हैं.
मनमानी सिक्योरिटी और दोगुना किराया
8X10 फीट के सीलन भरे कमरों का किराया 12 से 18 हजार रुपये तक वसूला जाता है. दलाल और मकान मालिकों के मनमाने रवैये के चलते छात्र चाहकर भी आवाज नहीं उठा पाते.
मां-बाप पेट काटकर भेजते हैं रुपये, बच्चों की जान सांसत में
बिहार के मध्यमवर्गीय किसान परिवार की आर्थिक पृष्ठभूमि को देखते हुए कहा जा सकता है कि एक बच्चे को दिल्ली में रखकर पढ़ाना सभी के बूते की बात नहीं है. एक छात्र पर महीने में कम से कम 12 से 15 हजार रुपये खर्च करने ही होते हैं. कई माता-पिता कर्ज लेकर, खेत गिरवी रखकर या जीवन भर की जमा-पूंजी लगाकर बच्चों को दिल्ली भेजते हैं, ताकि उनका जीवन संवर सके.
जहरीली हवा और सिर पर मंडराता खौफ
एक तो दिल्ली की हवा जहरीली है, जिसके चलते बिहार के लोग इसे गैस चैंबर कहकर संबोधित करते हैं. दूसरी ओर, हर वक्त बच्चों के सिर पर हादसों का अंदेशा मंडराता है, इससे परिजन भी चिंतित रहते हैं. यह बच्चों और उनके मां-बाप को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए काफी है.
सिस्टम की नाकामी और रेगुलेशन का अभाव
पिछले साल राजेंद्र नगर में जलभराव से छात्रों की मौत हो या मुखर्जी नगर में लगी भीषण आग या फिर सत्य निकेतन में हॉस्टल वाली बिल्डिंग का गिरना हो, हर हादसे के बाद कुछ जांच होती है, पड़ताल होती है, मीडिया की सुर्खियां बनती हैं और समय के साथ ये सब आम आदमी के साथ ही अधिकारियों की स्मृति से भी धुंधले होते चले जाते हैं. बाद में सब कुछ वैसे होने लगता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो. एक तरह से एक हादसे के बाद दूसरे हादसे का इंतजार किया जाता है.
हॉस्टलों या पीजी में न फायर सेफ्टी और न ही लाइसेंस
बच्चों के रहने वाली बिल्डिंगों में न तो फायर एनओसी होता है और न ही उनके पास लाइसेंस ही होते हैं. सुरक्षा मानक तो ये लोग जानते भी नहीं कि क्या होता है. दिल्ली में किराये की बिल्डिंगों या पीजी की सुरक्षा की निगरानी के लिए कोई रेगुलेशन नहीं है. इस कारण बिहार से आने वाले छात्र पूरी तरह अनियंत्रित बाजार के भरोसे है.