अपना ही घर उजाड़ने की मजबूरी: भागलपुर के राघोपुर में गंगा का भीषण कटाव, खिड़की-दरवाजे बचाने के लिए खुद घर तोड़ रहे लोग
पहले पाई पाई जोड़कर खुद के लिए आशियाने बनाओ और जब नदी निगलने लगे तो अपने से उसे तोड़कर काम का सामान बचाने की कोशिश करो. जिंदगी कितनी मुश्किल होती है. खासतौर से जब आपका घर नदी के आसपास हो.
भागलपुर के राघोपुर में गंगा का कटाव लोगों के आशियाने निगल रहा है. तीन पक्के मकान समेत दर्जन भर से ज्यादा घर गंगा में समा चुके हैं, जबकि दर्जन भर पक्के मकान अब भी कटाव के मुहाने पर हैं. हालात ऐसे हैं कि लोगों को अपना घर और जमीन दोनों छोड़ने पड़ रहे हैं. लगातार कटावरोधी कार्य कराए जाने के बावजूद गंगा का कटाव थमने का नाम नहीं ले रहा है. गंगा के तेवर ऐसे हैं कि लोगों की सालों की मेहनत की कमाई पलभर में मिट्टी में मिल रही है.
सबसे दर्दनाक तस्वीर उन परिवारों की है, जिनके सिर से छत छिनने वाली है. गंगा में समाने के खतरे को देखते हुए लोग खुद अपने हाथों से अपने घर तोड़ रहे हैं. कोई ईंट बचा रहा है, तो कोई दरवाजे और खिड़कियां निकालने में जुटा है. जिस घर को खून-पसीना बहाकर, मजदूरी करके बनाया था, आज उसी आशियाने को अपने हाथों उजाड़ने की मजबूरी है. कई घरों में चूल्हे तक नहीं जले हैं.
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राघोपुर में कटाव की यह दास्तान सिर्फ जमीन के गंगा में समाने की नहीं, बल्कि लोगों के सपनों और वर्षों की कमाई के उजड़ने की है. पीड़ितों के आंखों से आँसू नहीं रुक रहे. यहां हर घर के साथ एक परिवार की पूरी जिंदगी उजड़ रही है. किसी ने अपनी जमा-पूंजी लगाकर आशियाना बनाया, तो किसी ने दिन-रात मजदूरी कर बच्चों के सिर पर छत का सपना सजाया, लेकिन आज वही सपने गंगा की धारा में बह रहे हैं.
जिन घरों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब उजड़ने का डर और अपनों के बिछड़ने जैसी पीड़ा है. लोग अपने ही हाथों से घर तोड़कर ईंट, दरवाजे और खिड़कियां बचाने में लगे हैं. आंखों में बेबसी है और सामने अंधकार भरा भविष्य. सवाल है कि आखिर इन परिवारों का दर्द कौन सुनेगा? लगातार कटावरोधी कार्यों के बावजूद जब घर नहीं बच पा रहे, तो इन लोगों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
आपको बता दें कि शुक्रवार रात को राघोपुर में तटबंध का 125 मीटर से ज्यादा हिस्सा गंगा में समा गया. इससे कई पक्के मकान और झोपड़ीनुमा घर भी कटाव की भेंट चढ़ गए. दहशतजदा लोग अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित ठिकानों पर जाने की मजबूर हो गए हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि तटबंध को बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी निरीक्षण करके जा चुके हैं, तब फिर इतनी बड़ी तबाही कैसे हो गई?
रिपोर्ट: अश्वनी कुमार, भागलपुर