बिहार SIR से चुनाव आयोग में 'महाभारत': CEC ज्ञानेश कुमार के फैसलों के खिलाफ दोनों चुनाव आयुक्तों ने उठाई थीं आपत्तियां
चुनाव आयोग में विवाद हो सकता है, लेकिन बिहार एसआईआर ने देश भर में इसे लागू करने का रास्ता साफ किया था. एसआईआर ही नहीं, कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जब बिहार ने देश को दिशा दिखाने का काम किया है.
चुनाव आयोग के अंदर पिछले 10 महीनों में मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच खींचतान चल रही थी. द इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट से देश की राजनीति गरमा गई है और बिहार सहित कई राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव पर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन इस पूरे विवाद की नींव बिहार में जो एसआईआर शुरू हुआ था, उसमें पड़ी थी. बताया जा रहा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इसकी शुरुआत भी बिहार एसआईआर भी हुई थी.
1. फॉर्म 6 के इस सवाल को चुनाव आयुक्त संधू ने गलत बताया था
जून, 2025 में बिहार में एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण लांच किया गया था. एसआईआर में डिजिटल पोर्टल पर नए मतदाताओं के जुड़ने के लिए फॉर्म 6 के बैकएंड में एक सवाल जोड़ दिया गया था:
'क्या आपका या आपके माता और पिता या दादा और दादी का नाम पिछली 2003 वाले एसआईआर सूची में दर्ज था?'
इस सवाल पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने आपत्ति जताते हुए गैर-कानूनी और अनाधिकृत करार दिया था.
अब विपक्षी दलों का कहना है कि बिहार में एक बड़ी आबादी बाहर रहती है. लाखों लोगों के पास अपने दादा और दादी के दो दशक पुराने कागजात नहीं थे. चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ के मंजूरी के बगैर इस एक सवाल ने सीमांचल और मगध के लाखों युवाओं के डिजिटल फॉर्म को पेंडिंग या रिजेक्ट कैटेगरी में डाल दिया.
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2. दिल्ली के सर्वर से ब्लॉक हुए नाम, वोटर रजिस्ट्रेशन अधिकारी के अधिकार छिने
एक अन्य चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी आपत्ति में कहा था कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की मूल ताकत विकेंद्रीकरण है. उनका कहना था कि नाम जोड़ने या हटाने का कानूनी अधिकार केवल निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के पास होता है, जिसे ईआरओ कहा जाता है और वह एसडीएम स्तर का अधिकारी होता है.
विवेक जोशी की आपत्ति इस बात को लेकर थी कि बिहार एसआईआर के दौरान आईटी सिस्टम को इस तरह रि-डिजाइन किया गया था कि राज्य के जिलाधिकारियों के अधिकार भी खत्म हो गए. आपत्ति में कहा गया है कि यदि जिलाधिकारियों को फील्ड वेरिफिकेशन की संवैधानिक स्वायत्तता छीनी गई तो यह कोर्ट में टिक नहीं पाएगा.
3. नोटिस देने की अनिवार्य शर्त का उल्लंघन
जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 22 में कहा गया है कि किसी का भी नाम अगर वोटर लिस्ट से हटाया जाता है तो सबसे पहले उसे व्यक्तिगत रूप से पक्ष रखने का मौका देना कानूनन अनिवार्य है.
बताया जा रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता वाले तकनीकी विंग ने डिजिटल समानता के आधार पर डुप्लीकेट नामों (एक ही नाम दो राज्यों या दो जिलों में अंकित) को Auto Delete करने का निर्देश दिया तो बाकी दोनों आयुक्तों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया.
दोनों चुनाव आयुक्तों का कहना था कि बिना भौतिक सत्यापन के और बिना नोटिस दिए नामों को काटना असंवैधानिक है. इस मुद्दे पर दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को लेटर भी लिखा था.
4. चुनाव आयोग: बहुमत के नियम को न मानने का आरोप
चुनाव आयोग एक्ट, 2023 की धारा 18 कहती है कि आयोग का हर नीतिगत फैसला सर्वसम्मति से होगा और मतभेद पर बहुमत का फैसला मान्य होगा.
अब सवाल उठता है कि जब बिहार एसआईआर के दौरान दोनों आयुक्त संधू और जोशी एक तरफ थे तो फैसले कैसे लिए गए?
चुनाव आयोग की सफाई
चुनाव आयोग की ओर से इस बारे में कहा गया है-
किसी भी संस्था में विचार और विमर्श के दौरान अलग अलग राय सामने आती है और अंतिम फैसला लेने से पहले यह निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी दोनों आयुक्तों के अलावा आयोग का हर अधिकारी चुनावी सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए अपना सुझाव देने के लिए पूरी तरह अधिकृत है. 10 महीनों की कुछ खास आंतरिक टिप्पणियों को सामने लाकर बड़ी संख्या में मंजूरियों, फैसलों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज करना, तस्वीर का केवल एक हिस्सा ही दिखाता है. हाल में, आयोग ने कई फैसले लिए हैं, आदेश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहलें शुरू की हैं और देश भर में SIR के संचालन समेत कई चुनावी सुधार किए हैं. ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे आयोग के सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम हैं.
भाजपा की कठपुतली बन चुका है चुनाव आयोग: तेजस्वी यादव
ये सब बातें मीडिया में आईं और उधर बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने दावा किया कि भाजपा देश के संविधान और लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है. उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग पूरी तरह भाजपा की कठपुतली बन चुका है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस पर चुप हैं. चुनाव आयोग का जो प्रेस नोट आया है, वह भी प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह का लिखवाया हुआ है. आगे उन्होंने आरोप लगाया—
चुनाव आयोग का दुरुपयोग करके भाजपा को जिताया गया है. उन्होंने कहा कि पहले वोटिंग और काउंटिंग की रिकॉर्डिंग रखने की समय सीमा 1 साल की होती थी, जिसे साजिश के तहत घटाकर 45 दिन कर दिया गया, ताकि कोई सबूत ही न बचे. चुनाव के दिन दस-दस हजार रुपये बांटे गए. मिलिट्री डिप्लॉयमेंट का गलत इस्तेमाल हुआ और फर्जीवाड़ा करके विपक्ष के वोटों को काटा गया. बिहार और बंगाल का चुनाव पूरी तरह फर्जी और अवैध था. हमारी स्पष्ट मांग है कि बिहार और बंगाल में पुनः चुनाव कराया जाए.
सुप्रीम कोर्ट जा सकता है मामला
विपक्ष ने जिस तरह से चुनाव आयोग में असहमति को हाथोंहाथ लिया है, जाहिर है कि आने वाले दिनों में यह संवैधानिक बवंडर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंचेगा.