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आरक्षण को लेकर देश में एक बार फिर से बहस शुरू हो गई है. आरक्षण की समीक्षा को लेकर राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है. प्रदर्शनकारी जातिगत आरक्षण को समाप्त करके आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं. इसके अलावा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों का विरोध किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आरक्षण की बहस ने बीजेपी के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है. बीजेपी के लिए अपने परंपरागत सवर्ण वोटरों को साधे रखना बड़ा मुश्किल हो गया है. इसके साथ ही ओबीसी, एससी और एसटी मतदाताओं को अपने साथ जोड़े रखने की चुनौती है.
आरक्षण की समीक्षा की मांग क्यों उठ रही?
आरक्षण की समीक्षा किए जाने की मांग तेज हो गई है. इस मांग का समर्थन करने वालों में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और यूपी के मंत्री ओम प्रकाश राजभर भी शामिल हैं, जबकि दोनों नेताओं के आरक्षित वर्ग में आते हैं. दोनों का कहना है कि आरक्षण का अधिकतम लाभ एससी-एसटी-ओबीसी की अपेक्षाकृत समर्थ जातियां उठा रही हैं. उनका कहना है कि एससी-एसटी के साथ ओबीसी में कई जातियां ऐसी हैं, जो आरक्षण का लाभ नहीं उठा पा रही हैं. बिहार में महादलितों के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी आरक्षण की समीक्षा का समर्थन करते हुए कहा कि एक बार पूरे आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा हो ताकि यह पता चल सके कि यह अपने मकसद में कामयाब है या नहीं, यदि इसमें बदलाव जरूरी है तो वह भी होना चाहिए.
समर्थ जातियां उठा रहीं आरक्षण का लाभ?
विभिन्न रिपोर्ट्स और अध्ययनों के अनुसार, आरक्षण का सबसे अधिक लाभ कुछ चुनिंदा या अपेक्षाकृत रूप से मजबूत जातियों को मिला है, जबकि कई अति पिछड़ी और वंचित जातियां पीछे रह गई हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भीतर यादव, कुर्मी, जाट और कुछ क्षेत्रों में पाटीदार या गुर्जर जैसी जातियों ने आरक्षण का सबसे अधिक लाभ उठाया है, वहीं केवट, मल्लाह, राजभर, भर, लोहार और कुम्हार जैसी अति पिछड़ी जातियां अभी भी पीछे हैं. इसी तरह से दलितों में जाटव, पासवान इत्यादि सबल जातियों ने आरक्षण का पूरा फायदा लिया, जबकि अन्य दलित जातियों जैसे मुसहर, डोम आदि जातियों के लोगों का विकास नहीं हो सका.
रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट का क्या हुआ?
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भीतर उप-वर्गीकरण (sub-categorization) की जांच के लिए भारत सरकार ने 2 अक्टूबर 2017 को रोहिणी आयोग का गठन किया था. दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. रोहिणी की अध्यक्षता में इस आयोग ने जुलाई 2023 में अपनी अंतिम रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी. हालांकि, यह रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है, जिससे आरक्षण से मिलने वाले लाभ की सही स्थिति का आंकलन नहीं हो सका.
क्रीमी लेयर पर भिड़ गए मांझी-पासवान
ओबीसी की तरह एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर लागू करने की मांग की जा रही है, लेकिन उसका विरोध भी हो रहा है. एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने को लेकर बिहार एनडीए के दो बड़े साथी आपस में भिड़ गए हैं. यहां केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने एक-दूसरे से इस्तीफा देने की मांग की है. मांझी ने आरोप लगाया कि चिराग पासवान अति-पिछड़ों और महादलित गरीबों के हितों की परवाह नहीं करते हैं. मांझी पर पलटवार करते हुए चिराग पासवान ने कहा कि जो लोग SC आरक्षण में क्रीमी लेयर की बात कर रहे हैं, उन्हें पहले आरक्षण का फायदा छोड़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि आरक्षण में उप-कोटा या क्रीमी लेयर लागू करने से सामाजिक न्याय का मकसद कमजोर हो सकता है. इससे समाज में बंटवारा बढ़ेगा. इसका असर दलितों की एकता पर भी पड़ सकता है.
आरक्षण पर बुरी तरह फंस गई बीजेपी
इस मुद्दे पर बीजेपी फंसती जा रही है. पार्टी के सामने आगे कुआं तो पीछे खाई जैसी स्थिति बन गई है. साल 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव और 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी इसका प्रतिफल देख चुकी है. उस वक्त भी विपक्ष ने बीजेपी के खिलाफ आरक्षण का चक्रव्यूह तैयार किया था, जिसमें पार्टी बुरी तरह से फंस गई थी. एक बार फिर से विपक्ष ने बीजेपी को आरक्षण पर घेर लिया है. विपक्ष का कहना है कि बीजेपी आरक्षण को समाप्त करना चाहती है.
बीजेपी के लिए संजीवनी बने मांझी-राजभर
बीजेपी के लिए केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और यूपी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर जैसे नेता संजीवनी से कम नहीं हैं. राजभर का कहना है कि आज की तारीख में डीएसपी से लेकर मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति के बेटे तक आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं. हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जो लोग आरक्षण का फायदा उठाकर मुख्यधारा में आ चुके हैं, उन्हें अलग किया जाए. राजभर ने तो यहां तक कहा कि उनकी पार्टी 2002 से ही मांग कर रही है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए. ओबीसी समाज के नेताओं में राजभर बड़ा चेहरा हैं, वहीं दलितों-महादलितों के बड़े नेताओं में जीतन राम मांझी गिने जाते हैं. ऐसे में अगर ये दोनों नेता आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात कर रह हैं, तो यह बीजेपी को सहज करने के लिए काफी है. बीजेपी अब इन दोनों के सहारे गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को भी अपने पाले में खींच सकती है.