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गंगा की बदलती धारा और लगातार हो रहे भीषण कटाव ने दियारा क्षेत्र के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है. पिछले पांच दशकों में करीब पांच किलोमीटर भूभाग गंगा की धारा में समा चुका है. वहीं, हाल के दो दिनों में करीब 1200 मीटर क्षेत्र में हुए कटाव ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है. स्थिति यह है कि भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले महान लोककवि भिखारी ठाकुर के पैतृक गांव कुतुबपुर के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है. दूसरे दिन भी तेज पछुआ हवा के बीच गंगा का कटाव जारी रहा और नदी किनारे की जमीन देखते ही देखते ध्वस्त होती रही.
कटाव रोकने के लिए प्रशासन और जल संसाधन विभाग की ओर से किए जा रहे उपायों की जमीनी हकीकत भी सामने आने लगी है. नदी किनारे कटाव रोकने के लिए डाले गए बालू भरे बोरे गंगा की तेज धारा में बह गए. इससे कटावरोधी कार्यों की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग की ओर से किए जा रहे कार्य महज खानापूर्ति साबित हो रहे हैं. पांच दशकों से हर साल बाढ़ के बाद सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन गंगा में समाती रही है, लेकिन अब तक कटाव रोकने के लिए कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका है.
वर्तमान में कोटवापट्टी रामपुर पंचायत के दयालचक, कुतुबपुर, चकिया, सुरतपुर, सबलपुर तथा रायपुर बिंदगावां पंचायत के बिंदगावां और बलवन टोला गांव कटाव की चपेट में हैं. स्थानीय मुखिया ने कहा कि विभागीय स्तर पर कटावरोधी कार्यों के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है. उन्होंने मांग की कि कोटवापट्टी रामपुर और रायपुर बिंदगावां दोनों पंचायतों में एक साथ बड़े पैमाने पर बल्ला पायलिंग और बोल्डर पिचिंग का कार्य कराया जाए. अलग-अलग और छोटे स्तर पर किए जा रहे कार्यों से कटाव पर प्रभावी रोक लगाना संभव नहीं है.
ग्रामीणों ने बताया कि दो दिनों में करीब 1200 मीटर भूभाग कटने से अब नदी से कटान का खतरा बस्तियों तक पहुंचने लगा है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि तत्काल आपात स्तर पर ठोस तकनीकी कार्ययोजना बनाकर कटाव रोकने का काम शुरू नहीं किया गया तो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध दियारा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा गंगा की धारा में विलीन हो सकता है. ग्रामीणों ने जल संसाधन विभाग से अविलंब प्रभावी कार्रवाई की मांग की है.
छपरा से राकेश की रिपोर्ट