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ISI-तुर्किये का आतंकी षड्यंत्र बेनकाब! क्रिप्टो और 'म्यूल अकाउंट्स' से जम्मू-कश्मीर और यूपी को दहलाने की रची साजिश

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पाकिस्तान की ISI और तुर्किये की TIKA एजेंसी की ओर से एक नए और खतरनाक 'डिजिटल हवाला' आतंकी साजिश का पर्दाफाश किया है. इसमें क्रिप्टो और 8,000 से ज्यादा 'म्यूल अकाउंट्स' की मदद से डीएक्टिव पड़े आतंकी मॉड्यूल्स को फिर से फंड किया जा रहा है.

ISI-तुर्किये का आतंकी षड्यंत्र बेनकाब! क्रिप्टो और 'म्यूल अकाउंट्स' से जम्मू-कश्मीर और यूपी को दहलाने की रची साजिश
Image Credit: सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी साजिश का पता चला है.

खुफिया एजेंसियों का बड़ा खुलासा. ISI-TIKA का नया चुनावी आतंकी षड्यंत्र बेनकाब: क्रिप्टो और म्यूल अकाउंट्स, निष्क्रिय आतंकी नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने की साजिश का पर्दाफाश, यूपी हाई अलर्ट पर.

भारतीय खुफिया एजेंसियों ने सीमा पार से फंडिंग की एक बड़ी साजिश का खुलासा किया है. इसमें पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) तुर्किये की सरकारी विकास एजेंसी, 'टर्किश को-ऑपरेशन एंड को-ऑर्डिनेशन एजेंसी' (TIKA) के साथ मिलकर, लंबे समय से डीएक्टिव पड़े आतंकी मॉड्यूल्स में नया पैसा (फंड) पहुंचा रही है. इसका मकसद साफ है, जम्मू-कश्मीर में अपना आधार बनाकर आतंकी गतिविधियों की क्षमता को फिर से खड़ा करना, पुराने लोकल नेटवर्कों को दोबारा एक्टिव करके उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड और गुजरात तक अशांति फैलाना. इसमें मेन फोकस आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बाधा डालने पर है.

TIKA के साथ मिलकर ISI की प्लानिंग!

सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के अनुसार, ISI भारत में आतंकी गतिविधियों को फिर से जिंदा करने के लिए TIKA का इस्तेमाल फंड भेजने के मुख्य जरिये के रूप में कर रही है. पुराने हवाला या नकद पहुंचाने के तरीकों के उलट, यह नया तरीका पूरी तरह से डिजिटल है. इसके तहत ऑनलाइन एन्क्रिप्टेड पेमेंट ऐप्स का इस्तेमाल करके भारत, खासकर जम्मू-कश्मीर, में पैसा भेजा जा रहा है. इन ऐप्स के जरिए सीमा पार से बहुत तेजी से और बिना किसी की नजर में आए पैसे का ट्रांसफर किया जा सकता है.

खुफिया विभाग के एक सीनियर अधिकारी ने इस बदलाव के बारे में कहा,'पारंपरिक बैंकिंग या नकद लेनदेन के बजाय, वे अब डिजिटल वॉलेट, ई-कॉमर्स नेटवर्क और क्रिप्टो ऐप्स का सहारा ले रहे हैं. इसके जरिए वे 'डिजिटल हवाला' चैनलों से पैसा भेजते हैं. क्रिप्टो वॉलेट ऐप्स ही इनके मुख्य 'डिजिटल हवाला' टूल हैं.'

सुरक्षा एजेंसियों को क्या मिला?

सुरक्षा एजेंसियों ने पाया है कि विदेशी हैंडलर्स पारंपरिक बैंकों का इस्तेमाल करने के बजाय, VPN का इस्तेमाल करके सीधे निजी और बिना KYC वाले वॉलेट में TRX/Tron जैसे क्रिप्टो टोकन भेज देते हैं. इसके बाद, उनके गुर्गे दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े शहरों में 'पीयर-टू-पीयर' (P2P) ट्रेडर्स के जरिए इन क्रिप्टो टोकन को नकदी में बदल लेते हैं.

जिन प्लेटफॉर्म्स पर नजर रखी जा रही है, उनमें शामिल हैं, बाइनेंस (Binance) का पीयर-टू-पीयर ट्रेडिंग सिस्टम, जो सीमा पार से अवैध लेनदेन की सुविधा देता है; ट्रस्ट वॉलेट (Trust Wallet) और टोकनपॉकेट (TokenPocket), जिनका इस्तेमाल ऐसे डिजिटल वॉलेट बनाने के लिए किया जाता है. इनमें KYC की जरूरत नहीं होती और पाकिस्तान, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में बैठे हैंडलर्स से फंड आता है. साथ ही,  पाकिस्तान के मोबाइल वॉलेट ऐप्स 'ईजीपैसा' (Easypaisa) और 'सतीपे' (SatiPay) का इस्तेमाल सीमा के पास के इलाकों में फंड इकट्ठा करने और बांटने के लिए किया जा रहा है.

वॉलेट से पहुंचाते हैं पैसा!

सीमा पार से फंड भेजने के लिए, ये डिजिटल वॉलेट क्षेत्रीय मोबाइल फाइनेंशियल सर्विसेज के जरिए पैसा बॉर्डर इलाकों तक पहुंचाते हैं. भारत में आने के बाद, इन फंड्स को 'म्यूल अकाउंट्स' के एक नेटवर्क के जरिए लॉन्डर किया और आगे बांटा जाता है. ये ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिन्हें बिचौलिए कंट्रोल करते हैं. वे इन खातों के जरिए छोटे-छोटे और बार-बार होने वाले ट्रांजेक्शन के जरिए पैसा उन लोगों तक पहुंचाते हैं, जिनका संबंध आतंकवाद से है या जो जमीनी स्तर पर आतंकियों की मदद करते हैं.

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने पहले भी UPI गेटवे सहित भारत के आम पेमेंट सिस्टम के जरिए कई परतों वाले ऑनलाइन फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन का पता लगाया है. ये गिरोह चोरी की गई या किराए पर ली गई पहचान का इस्तेमाल करके दर्जनों स्थानीय 'म्यूल अकाउंट' खोलते हैं. साथ ही, वे रिटेल मर्चेंट ऐप्स का इस्तेमाल करके खातों के बीच तेजी से छोटी-छोटी रकम ट्रांसफर करते हैं, जिससे बैंकों के ट्रैकिंग एल्गोरिदम को भ्रमित किया जा सके.

'म्यूल अकाउंट' नेटवर्क कैसे काम करता है?

इसमें हैंडलर और बिचौलिए सोशल मीडिया के जरिए ऐसे खाते तलाशते हैं, या फिर 'वर्क-फ्रॉम-होम', पार्ट-टाइम जॉब या ऑनलाइन ट्रेडिंग जैसे फर्जी घोटालों का जाल बिछाकर आम लोगों को फंसाते हैं और उनसे उनके बैंक क्रेडेंशियल्स (लॉगिन डिटेल्स) ले लेते हैं. कुछ मामलों में, चोरी की गई पहचान का इस्तेमाल करके या स्थानीय 'शेल कंपनियों' (फर्जी कंपनियों) के नाम पर खाते खोले जाते हैं. इन खातों में सीधे फंड जमा किया जाता है, जो वहां बहुत कम समय अक्सर 24 से 48 घंटे के लिए ही रहता है.

इसके बाद, इस रकम को तुरंत कई अन्य खातों में बांट दिया जाता है, क्रिप्टोकरेंसी में बदल दिया जाता है, या फिर बल्क पेमेंट और पेमेंट गेटवे सिस्टम के जरिए आगे भेज दिया जाता है. इस पूरे नेटवर्क को विदेश में बैठे हैंडलर कंट्रोल करते हैं.

8000 से ज्यादा म्यूल अकाउंट्स फ्रीज

पिछले साल, जम्मू-कश्मीर पुलिस के साइबर पुलिस स्टेशन और केंद्रीय सुरक्षा बलों सहित कई जांच एजेंसियों ने इस इलाके में 8,000 से ज्यादा 'म्यूल अकाउंट्स' को फ्रीज किया. जांच से पता चला कि ये नेटवर्क बड़े साइबर-फ्रॉड रैकेट से जुड़े हैं; इनमें 209 करोड़ रुपये का एक ऐसा मामला भी शामिल है, जिसे सुलझा लिया गया था. एजेंसियों ने पूरे भारत (जिसमें जम्मू-कश्मीर भी शामिल है) में लाखों 'म्यूल अकाउंट्स' की पहचान की है.

अनुमान है कि इन अवैध चैनलों के जरिए हर महीने लगभग 2,500 करोड़ रुपये का ट्रांजैक्शन होता है. डिजिटल माध्यम से 'म्यूल अकाउंट्स' तक पैसे पहुंचाने का यह जटिल सिस्टम जानबूझकर इस तरह बनाया गया है, ताकि कोई फिजिकल फुटप्रिंट न छूटे और इसे ट्रैक करना मुश्किल हो जाए.

सुरक्षा एजेंसियां हिज्बुल मुजाहिदीन (HM), लश्कर-ए-तैयबा (LeT), द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) जैसे पुराने आतंकी संगठनों के निष्क्रिय हो चुके गुटों को 'ड्राई नर्सरी' कहती हैं. TIKA से जुड़ी नई फंडिंग का मकसद इसी 'नर्सरी' को फिर से सींचना है. यानी आतंकी संगठनों के नेतृत्व ढांचे को फिर से खड़ा करना, उनकी संगठनात्मक क्षमता को बहाल करना और स्थानीय स्तर पर उनके निष्क्रिय हो चुके मददगारों को फिर से एक्टिव करना.

OGW को किया जा रहा एक्टिव

हाल ही में शोपियां में हुए एक ऑपरेशन में एक ठोस संकेत सामने आया, जिसमें इन निष्क्रिय नेटवर्कों के लिए फंड जुटाने और बांटने के आरोप में दस लोगों को गिरफ्तार किया गया. गौरतलब है कि गिरफ्तार किए गए लोगों में से कुछ जम्मू संभाग के कठुआ से थे. इससे पता चलता है कि हैंडलर जानबूझकर अपनी गतिविधियों को कश्मीर घाटी से बाहर उन इलाकों तक फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, जो पहले शांत हुआ करते थे.

पुराने 'ओवरग्राउंड वर्कर्स' (OGW) से व्यवस्थित तरीके से संपर्क किया जा रहा है और उन्हें फिर से एक्टिव किया जा रहा है, जिसके लिए मुख्य रूप से सोशल मीडिया का इस्तेमाल हो रहा है. हैंडलर्स इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए उनसे दोबारा संपर्क साधते हैं, निर्देश देते हैं और पुराने मददगारों को वापस अपने साथ जोड़ लेते हैं. इससे उन्हें आमने-सामने मिलने के जोखिम भरे काम की जरूरत नहीं पड़ती.

निशाने पर उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य

इस ऑपरेशनल प्लान का मुख्य मकसद आने वाले विधानसभा चुनावों में रुकावट डालना है, जिसमें उत्तर प्रदेश मुख्य निशाना है, जबकि उत्तराखंड और गुजरात भी इसके दायरे में हैं. गृह मंत्रालय और उत्तर प्रदेश पुलिस को मिली खुफिया जानकारी के अनुसार, एक बार फंड मिलने और फिर से सक्रिय हो जाने पर, ये मॉड्यूल चुनाव के समय अस्थिरता पैदा कर सकते हैं, सांप्रदायिक तनाव भड़का सकते हैं और सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर सकते हैं. इसके साथ ही, दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार में भी इनका विस्तार करने की योजना है, ताकि कई राज्यों में एक साथ दबाव बनाया जा सके.

क्या है साजिश का ब्लूप्रिंट?

इस साजिश में कई चीजें शामिल हैं. जैसे तुर्किये से मिलने वाली विकास निधि (जिसे कुछ देशों का समर्थन हासिल है), ISI के निर्देश, फंड ट्रांसफर के लिए डिजिटल पेमेंट ऐप्स, पैसे की आवाजाही के लिए 'म्यूल अकाउंट्स' (दूसरों के नाम पर खोले गए खाते) का नेटवर्क, और पुराने स्थानीय मददगारों को सोशल मीडिया के जरिए फिर से सक्रिय करना. इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर में फिर से तैयार किए गए बेस का इस्तेमाल चुनाव में रुकावट डालने और भारत विरोधी गतिविधियों को बड़े पैमाने पर अंजाम देने के लिए करने का साफ इरादा है. आतंकवाद विरोधी एजेंसियां ​​इस अलर्ट को एक गंभीर और बहुस्तरीय खतरे के रूप में देख रही हैं.

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About the Author

Khalid Hussain

Khalid Hussain

सैयद खालिद हुसैन जम्मू-कश्मीर के एक पुरस्कार विजेता पत्रकार हैं, जिन्हें 24 वर्षों से अधिक का अनुभव है. साल 2014 से 'ज़ी न्यूज़' में चीफ  स्पेशल कोरेस्पोंडेंट के रूप में काम कर रहे हैं.जी मीडिया से पहले हुसैन ने न्यूज़ 18 में नौ साल तक सीनियर कोरेस्पोंडेंट के रूप में काम किया. हुसैन ने अपने करियर की शुरुआत डीडी न्यूज से की थी. हुसैन ने अपनी तालीम श्रीनगर के पब्लिक स्कूल और डीएवी हाई स्कूल से हासिल की. फिर ग्रेजुएशन तक का सफ़र एस.पी हायर सेकेंडरी स्कूल और अमर सिंह कॉलेज से पूरा किया. उसके बाद मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के लिए दिल्ली के सर अरबिंदो इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पूरी की. इसके अलावा हुसैन लेखक फ़िल्म/ वीडियो कैमरा का स्पेशल कोर्स एफटीआई पुणे से कर चुके हैं.  मुंबई और दिल्ली में कई साल काम करने के बाद 2004 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर में काम करना शुरू किया. डीडी न्यूज़, डीडी कश्मीर, BAG फ़िल्म्स में फ्रीलांस काम किया. हुसैन पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय से जम्मू-कश्मीर से जुड़े कई मुद्दों को बेहतरीन तरीके से कवर कर रहे हैं. लद्दाख से लेकर मुंबई तक हुसैन भारत के कई शहरों से रिपोर्टिंग कर चुके हैं.
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